Sunday, 14 February 2021

प्रेमियों का दिवस वेलेंटाइन डे

-बलराज सिंह सिद्धू

14 फरवरी, वेलेंटाइन डे को दुनिया भर में प्रेमियों के दिन के रूप में के रूप में मनाया जाता है। आधुनिक समय में प्रेमी-प्रेमी इस दिन अपने पार्टनर से अपने प्यार का इजहार करते हैं और उपहार और प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान करते हैं।
वेलेंटाइन शब्द लैटिन शब्द वैलेंटाइनस से लिया गया है। जिसका शाब्दिक अर्थ है मजबूत या ताकतवर। यह शब्द दूसरी और तीसरी शताब्दी के बीच अधिक लोकप्रिय हो गया। वेलेंटाइन डे का इतिहास संत वेलेंटाइन के साथ जुड़ा हुआ है।रोमन पौराणिक कथाओं और इतिहास में कई संत वैलेंटाइन रहे हैं। कुछ रोमन पॉप (Pope) और बिशप भी रहे हैं। वेलेंटाइन रोम के मूल निवासी सेंट वेलेंटाइन से संबंधित है।
रोमन सम्राट मार्कसुरलीस क्लॉडियस-2 ((Marcus Aurelius Claudius 'Gothicus' (10 May 214 – January 270), also known as Claudius II, was Roman emperor from 268 to 270. During his reign he fought successfully against the Alemanni and decisively defeated the Goths at the Battle of Naissus.) )के शासनकाल के दौरान, शाही सैनिकों को शादी करने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि राजा का मानना ​​था कि केवल जो लोग घर के बंधनों से मुक्त थे, वे उत्कृष्ट सैन्य सेवा प्रदान कर सकते थे और सेना के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। संत वेलेंटाइन ने इसे प्रकृति के नियमों के विपरीत घोषित किया और कई सैनिकों के गुप्त विवाह की व्यवस्था की।
जब शासक को इस बारे में पता चला, तो संत वेलेंटाइन को थोड़ी देर के लिए कैद कर लिया गया और फिर 269 ईस्वी में मौत की सजा सुनाई गई थी।
एक अन्य लोकप्रिय रोमन पौराणिक कथा के अनुसार, संत वेलेंटाइन न केवल एक धार्मिक नेता थे, बल्कि एक अच्छे उपचारकर्ता भी थे। वह बीमार कैदियों के इलाज के लिए जेलों में जाता था और उसने जेलों से कुछ कैदियों को रिहा किया था, जिसके लिए उसे जेल में डाल दिया गया था।
संत वेलेंटाइन ने ज़ेलर की अंधी बेटी की आंखों का इलाज किया और उसे फिर से रोशनी दी। लड़की को संत वेलेंटाइन से प्यार हो गया और वह अक्सर जेल में उससे मिलने आया करती थी। संत वेलेंटाइन ने अपनी प्रेमिका को कई प्रेम पत्र लिखे थे।
निष्पादन के दिन, संत वेलेंटाइन ने अपनी प्रेमिका को एक पत्र में लिखा, "आपके वेलेंटाइन की ओर से।"
सेंट वेलेंटाइन का शरीर रोम के कैटाकॉम्बे में दफनाया गया था। सेंट वेलेंटाइन की खोपड़ी अभी भी सांता मारिया बेसिलिका चर्च, रोम में सजी है, और बाकी कंकाल को कब्र से निकाल कर अठारहवीं शताब्दी में फिर से इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, आयरलैंड, फ्रांस और चेक गणराज्य में दफनाया गया था।
वैलेंटाइन डे लुपर्कालिया की दावत से भी रोमन काल से जुड़ा है। रोमन कृषि देवता फानूस को खुश करने के लिए लूपर्कलिया भोज उत्सव मनाया जाता था । प्राचीन रोमानियाई किसान अपनी फसल की आय के साथ बड़े पैमाने पर दावत दिया करते थे, जैसे बैसाखी कभी हमारे पंजाब में मनाई जाती थी। इस दावत में, वे दूल्हा और दुल्हन का चयन करके अपने बेटे और बहू (वर और बधु )के बीच संबंध तय करते थे ।
496 ई: में, रोमन रोमन धर्मगुरु गैलेक्टियस प्रथम ने वेलेंटाइन डे को केवल एक सामूहिक भोज के रूप में मनाने और प्रेमी दिवस के रूप में न मनाने का आदेश दिया था। वेलेंटाइन डे को प्रेमी दिवस के रूप में मनाने की प्रथा 1375 में प्रकाशित हुई जेफरी चौसर की कविता से हुई थी। इस कविता में वह बताता है कि इस दिन पक्षी अपने साथी कैसे चुनते हैं।जो इस प्रकार है, (Parliament of Foules, “For this was sent on Seynt Valentyne’s day / Whan every foul cometh ther to choose his mate.”)
1800 में इस शुभ दिन पर कार्ड जारी करने की प्रथा शुरू हुई थी और 1913 में कार्ड प्रिंटर हॉलमार्क ने इसे चरम सीमा पर पहुँचा दिया था । आप अक्सर वेलेंटाइन कार्ड पर एक बच्चे के हाथ में एक तीर और उसकी पृष्ठभूमि में एक दिल देखते हैं। वह वीनस, रोमन प्यार देवी, और कामदेव, युद्ध देवता मारज़ का बेटा है। उसके हाथ में तीर प्यार का प्रतीक है और जिसे हम दिल कहते हैं वह वास्तव में उसकी ढाल है। ग्रीक पौराणिक कथाओं ने कामदेव को ग्रीक प्रेम देवता इरोस के पुत्र, क्यूपिड के नाम से पुकारा जाता है ।
प्रेम की रोमन देवी वेनिस को गुलाबों का इतना शौक था कि स्वीडन के राजा चार्ल्स द्वितीय ने गुलाबों को प्रेम की भाषा बता कर फूल देने की प्रथा शुरू की। आजकल इस पवित्र दिन की आड़ में मनचला प्रेमियों द्वारा लड़कियों से छेड़छाड़ करने का चलन है। याद रखें यह वेलेंटाइन डे, संत वेलेंटाइन की शहादत को याद करने का दिन है, जो मानवता के लिए शहीद हुए थे।

Saturday, 30 January 2021

लंबी धार

लंबी धार - बलराज सिंह सिद्धू

चौधरी इलियास मुद्दत बाद अपने बचपन के लंगोटिये यार फिराज़ मुहम्मद को मिलने उसके घर पहली बार आया। फिराज़ मुहम्मद ने अपनी बेगम के साथ उसका परिचय करवाते हुए बताया, “बेगम, चौधरी और मैं बचपन में इकट्ठे बहुत शरारतें किया करते थे। हम ज़मीन पर एक लकीर खींचकर बराबर खड़े हो जाते और पेशाब करते हुए मुकाबला करते कि कौन लंबी धार मारता है और मैं हमेशा चौधरी से जीत जाता। हा…हा…हा… !”
यह सुन फिराज़ मुहम्मद की बेगम शरमाकर रसोई में चाय बनाने चली जाती है।
फिराज़ मुहम्मद चौधरी से हालचाल पूछता है, “और बता, बीवी-बच्चों का क्या हाल है ?”
“मुहम्मद साहब, अल्लाह की बड़ी मेहर है। सुख से बारह बच्चों का अब्बा हूँ।”
“अच्छा ? चौधरी बड़ी लंबी धार मारने लग पड़ा है !”
“तुम्हारे बच्चे कहीं नज़र नहीं आ रहे ?”
“यार, क्या बताऊँ। मेरी बीबी बांझ है।” कहकर फिराज़ मुहम्मद चुप हो जाता है।
रसोई में बातें सुन रही फिराज़ की बेगम के सीने में ‘बांझ’ शब्द गोली की तरह बजता है।
रात में खाने के उपरांत फिराज़ की बेगम सोने चली जाती है और वे दोनों गप्प-शप मारते बैठे रहते हैं।
जब देर रात गई फिराज़ मुहम्मद अपने कमरे में आता है तो अपनी बेगम को जागता देखकर पूछता है, “सोई नहीं अभी तक ?”
“नींद नहीं आई… चौधरी साहिब के बारह बच्चे सुनकर मुझे तो बड़ी हैरानी हुई। इनकी बीवी धन्य है। …चौधरी साहब बड़ी लंबी धार मारते है…सोचती हूँ, एक रात से क्या फर्क़ पड़ता है। अगर आज की रात मैं चौधरी…।”
अपनी पत्नी के मुँह से यह बात सुनकर फिराज़ मुहम्मद शर्मिन्दा-सा हो, गर्दन झुकाकर सोचने लग जाता है, “बेगम, वो भी कोई वक़्त था जब हम लंबी धार मारा करते थे।”

वो दोनों

 वो दोनों -बलराज सिंह सिद्धू

जब वो दोनों मित्र खेलने जाने के लिए अपने अपने घरवालों से इजाज़त मांगते, तो उनको मार पड़ती।
इधर जट्ट लड़के के माता-पिता गुस्सा होकर कहते, “भैंसों की पूछें मरोड़ने लायक रह जायेगा। पढ़ ले, पढ़ ! जिसकी देखादेखी करता है, उस बढ़ई का क्या है ? न पढ़ा तो हट्टी पर बैठ कर रन्दा चला लेगा। बेटा, तू क्या करेगा ?”
उधर मिस्त्री (रामगढ़िये) लड़के के माँ-बाप फटकार लगाते हुए कहते, “उस लंडे जट्ट का पीछा छोड़। अगर वो न पढ़ा तो हल की मूँठ पकड़ खेत जोत लेगा। बेटा, हमें तो पढ़ना ही पड़ेगा।”
मार खाकर दोनों यार किताबें उठाकर पढ़ने का ढोंग करते बैठ जाते। उनकी माँओं के मिलकर बाज़ार जाने की देर होती कि पीछे से वे खेल के मैदान में खिसक जाते।
शाम ढले खेल-कूद कर जब वापस आ रहे होते तो वे रास्ते में देखते कि अहाते के अंदर बैठकर उनके बाप शराब पी रहे होते।

Wednesday, 2 January 2019

साहित्य, संगीत तथा कला में अशलीलता

साहित्य, संगीत तथा कला में अशलीलता
कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति के खून में भी कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो उसे रहम दिल, दयावान और भावुक बनाने का सामर्थय रखते हैं। जब ये तत्व या ब्लड-सैल अपना असर दिखाते हैं तो मनुष्य का व्यक्तित्व एकदम बदल जाता है। दुनिया के इतिहास में इस की अनेकों मिसालें मिली हैं, जैसे लक्ष्मण दास से बना बंदा बहादुर, सम्राट अशोक का कालिंगा के युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन होना, बादशाह अकबर का जबरदस्ती से स्त्रियों को अपने हरम में रखना और दूसरी तरफ जनहित के कार्य करना आदि बहुत सही उदाहरणें है।
यही तत्व मनुष्य के भीतर प्रेम का भाव पैदा करते हैं। प्रेम मनुष्य का झुकाव सूक्ष्म कलाओं की तरफ झुकाता है। इसी कारण से दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी कला के साथ लगाव होता है। चाहे यह साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, बुत्त-तराशी, अदाकारी या कोइ अन्य हो। इन कलाओं को प्यार करने वाला व्यक्ति जब उस कला को किसी कलाकार की किसी बढ़िया रचना के सम्मुख होता है तो स्वाभाविक ही उसके मन में उस कलाकार के लिये सम्मान और श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। जैसे कि अदाकारी को प्यार करने वाले जब किसी अभिनेता या अभिनेत्री की बढ़िया एकटिंग देखते हैं तो उसके दीवाने हो जाते है। जब कलाकार को प्रशंसको की मुहब्बत मिलती है, तो वह मकबूल (मशहूर) होने लगता है जैसे-जैसे कद्रदानों की गिनती बढ़ती जाती है, वैसे-2 कलाकार प्रसिद्धी प्राप्त करता जाता है और जिसके साथ समाज में उसका रूतबा ऊँचा होता जाता है। रूतबे की बुलंदी के हिसाब से कलाकार को आर्थिक लाभ और दिमागी सकून मिलने लगता है। यही कारण है कि हर कलाकार अपनी कला के साथ न शाहकार का सृजन करने का यत्न करके हमेशा अपने आप को सर्वोत्तम सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है। कलाकृति को बढ़िया बनाने के प्रयास में कई बार कलाकार से कोई गलती भी हो जाती है। इसके साथ उसकी रचना दोषपूर्ण हो जाती है। जिसकी लोगों द्वारा आलोचना भी की जाती है। आलोचना का निशाना बनी कृति कई बार कलाकार को नुक्सान पहुँचाने की बजाय फायदा भी देती है, जो अन्य कलाकारों को वही गलती जानबूझ कर करने के लिये उकसाती है। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकारी और बुत्ततराॅशी में जानबूझ कर भरे जाते ऐसे ही एक दोष का नाम है अशलीलता जिसे उर्दू में फाहसीपन और अंगे्रजी में टंनसहंतपजल कहते हैं।

शूरवीर मिर्जा

शूरवीर मिर्जा
प्यार को मनुष्य की चैदह मूल प्रवृतियों में से उत्तम माना जाता है। दुनियां की बाकी भाषाओं की तरह पंजाबी जुबान में भी प्रेम कहानी को एक विशेष स्थान प्राप्त है। वैसे तो हर प्राणी की कोई न कोई अपनी प्रेम कहानी होती है लेकिन वह स्वंय (निज) तक ही सीमित होकर रह जाती है। परन्तु कुछ मनुष्यों की प्रेम कहानी आम लोगों से अलग, दिलचस्प अलौकिक और अलग होती है। इसलिए लोग उनकी कहानी सुनाते हैं और वह साहित्य का अनूठा अंग बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होती हुई सदियों तक अमर रहती हैं। ऐसी ही एक प्रेम कहानी है, मिर्ज़ा-साहिबा। जब भी मिर्ज़े का ज़िक्र होता है तो हमारे दिल में चार पात्र साक्षात आ खड़े होते हैं। एक किस्से का नायक मिर्ज़ा, दूसरी नायिका साहिबा और तीसरा सहायक पात्र मिर्ज़े की घोड़ी बक्की और चैथा वह (बूक्ष) जिसकी छाय में मिर्ज़ा मारा जाता है। किस्सा शब्द जिसका अर्थ कहानी, कथा या वृतांत होता है। चाहे यह अरबी भाषा का शब्द है, लेकिन पंजाबी में भी इसको उतनी ही मान्यता प्राप्त है, जितनी कि अरबी, फारसी या इरानी अदब में है। किसी का उद्भव विद्वानों अनुसार फारसी मनस्वी परम्परा द्वारा हुआ है। हमारे पास जिऊणा मोड़, दुल्ला भट्टी, जैमल-फत्ता, सुच्चा सूरमा, शाहणी कौल, रूप-बसन्त जैसे किस्से और पंजाबी किस्सेकारों के नामों की लम्बी सूची मौजूद है। जिनमें से दामोदर (हीर-रांझा), वारिश शाह (हीर-रांझा), हाशम कादरयार (सस्सी-पुन्नू), पीलू (मिर्ज़ा-साहिबा), हाफिज़ बरखुरदार (मिर्ज़ा-साहिबा), अहमद यार (कामरूप-कामलता), कादर यार (राजा रसालू, पूर्ण भगत), फज़ल शाह (सोहणी-महिवाल, लैला-मजनू), इमाम बख्श (शाह बहिराम), अहमद गुजर, मुकबल आदि नाम प्रमुख है।

तुझे पियेंगे नसीबों वाले!

तुझे पियेंगे नसीबों वाले!
‘‘एक सवाल मेरे मन में आता है, वह यह कि हमारे हीरों जैसे लेखक.... गायक.... शराब पी-पी कर क्यों अपनी जान गँवा रहे हैं? क्या शराब... जिंदगी और सेहत से... ज्यादा अच्छी है?’’
पंजाबी आरसी की फेसबुक वाल पर कुलदीप माणक की मृत्यु का इज़हार करते हुये तनदीप तमन्ना जी ने यह उर्पयुक्त विचार लिखा था। सवाल वाक्य ही गौर की माँग करता है। पहले सुरजीत बिंदरखीआ, फिर काका भैणीवाला मेजर राजस्थानी और फिर माणक।
शिव कुमार बटालवी के अतिरिक्त एक दर्जन से भी अधिक पंजाबी के साहित्यकार हैं, जो मनहूस शराब की भेंट चढ़े। बात यह नहीं है कि केवल गायक, एक्टर, साहित्यकार ही शराब पीकर मरते हैं। बहुत सारे आम लोग भी शराब की भेंट चढ़ते रहते हैं। लेकिन उनको मीडिया कवरेज नहीं मिलती। प्रसिद्ध लोगों के बारे में वह खबर बन जाती है और जंगल की आग की भांति फैल जाती है। जब कोई आम व्यक्ति शराब सेवन से मरता है तो उसके अनेकों कारण होते हैं, जैसे आर्थिक तंगी, असफलता, कर्ज़ा, बेरोज़गारी, घरेलू रिश्तों में उत्पन्न हुआ तनाव, मजबूरी या अय्याशी। लेकिन प्रसिद्ध व्यक्तियों की मृत्यु का केवल एक कारण होता है, वह है उनका प्रसिद्ध होना।

नंगे सागर की सैर

नंगे सागर की सैर
दिनांक एक सितंबर 2013 को पंजाब टैलीग्राफ की तरफ से पंजाब टूरज़ के बैनर तले इंग्लैंड के एक मशहूर समुद्री तट ब्र्राईटन के टूर पर ले जाया गया। वैसे तो लीमोसोल (साईप्रस), उसटैंड (बैल्ज़ियम) आदि अर्थात् दुनियां के अन्य अनेकों देशों के समुद्र देखे हैं। इंग्लैंड के भी ब्लैकपूल, साऊथएण्ड औन सी एंव वैस्टरन-सुपरमेअर आदि को तो ननिहाल जाने जैसे जब दिल करे चले जाते हैं। ब्राईटन के इस सागर की सैर का भी यह कोई पहला अवसर नहीं था। काॅलेज के दिनों में तो लगभग हरेक दूसरे तीसरे सप्ताह के आखिर में यहाँ जाकर बोतल के ढक्कन खोलते थे। लेकिन ब्राईटन की मेरी इस यात्रा में पूर्व यात्राओं से भिन्नता थी। पहले एक आशिक मिज़ाज युवक यहाँ आया जाया करता था और अब एक संजीद और साहित्य को समर्पित लेखक जा रहा था।
ब्राईटन, पूर्वी ससैक्स काऊँटी के अधीन पड़ता गे्रट ब्रिटेन की दक्षिणी बंदरगाह वाला शहर है। इसके बसने का इतिहास 1080 से भी पहले का है। पहले इसे ब्रिसटैलमसटिऊन कहा जाता था। पुरानी अंगे्रजी के इस शब्द का अर्थ है, पत्थर का चमकीला टोप। यह सिल टोप समुद्री हमलावरों का सामना करने वाले सैनिक अपनी सुरक्षा के लिये पहना करते थे। अर्थात् ब्राईटन को इंग्लैंड का सुरक्षा टोप माना जाता था, क्योंकि समुद्री रास्ते से होने वाले हमले अधिकतर इसी मार्ग से होते थे और सबसे पहले ब्राईटन वासी ही दुश्मन का सामना करते थे। बारहवीं-तेरहवीं सदी में यह नाम बिगड़ कर ब्राईटहलमस्टोन बन गया था, जिस का अर्थ भी वही था। उसके पश्चात् ब्राईटहलमस्टोन का मौजूदा संक्षेप रूप ब्राईटन प्रचलित हो गया था।