Wednesday, 2 January 2019

साहित्य, संगीत तथा कला में अशलीलता

साहित्य, संगीत तथा कला में अशलीलता
कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति के खून में भी कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो उसे रहम दिल, दयावान और भावुक बनाने का सामर्थय रखते हैं। जब ये तत्व या ब्लड-सैल अपना असर दिखाते हैं तो मनुष्य का व्यक्तित्व एकदम बदल जाता है। दुनिया के इतिहास में इस की अनेकों मिसालें मिली हैं, जैसे लक्ष्मण दास से बना बंदा बहादुर, सम्राट अशोक का कालिंगा के युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन होना, बादशाह अकबर का जबरदस्ती से स्त्रियों को अपने हरम में रखना और दूसरी तरफ जनहित के कार्य करना आदि बहुत सही उदाहरणें है।
यही तत्व मनुष्य के भीतर प्रेम का भाव पैदा करते हैं। प्रेम मनुष्य का झुकाव सूक्ष्म कलाओं की तरफ झुकाता है। इसी कारण से दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी कला के साथ लगाव होता है। चाहे यह साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, बुत्त-तराशी, अदाकारी या कोइ अन्य हो। इन कलाओं को प्यार करने वाला व्यक्ति जब उस कला को किसी कलाकार की किसी बढ़िया रचना के सम्मुख होता है तो स्वाभाविक ही उसके मन में उस कलाकार के लिये सम्मान और श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। जैसे कि अदाकारी को प्यार करने वाले जब किसी अभिनेता या अभिनेत्री की बढ़िया एकटिंग देखते हैं तो उसके दीवाने हो जाते है। जब कलाकार को प्रशंसको की मुहब्बत मिलती है, तो वह मकबूल (मशहूर) होने लगता है जैसे-जैसे कद्रदानों की गिनती बढ़ती जाती है, वैसे-2 कलाकार प्रसिद्धी प्राप्त करता जाता है और जिसके साथ समाज में उसका रूतबा ऊँचा होता जाता है। रूतबे की बुलंदी के हिसाब से कलाकार को आर्थिक लाभ और दिमागी सकून मिलने लगता है। यही कारण है कि हर कलाकार अपनी कला के साथ न शाहकार का सृजन करने का यत्न करके हमेशा अपने आप को सर्वोत्तम सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है। कलाकृति को बढ़िया बनाने के प्रयास में कई बार कलाकार से कोई गलती भी हो जाती है। इसके साथ उसकी रचना दोषपूर्ण हो जाती है। जिसकी लोगों द्वारा आलोचना भी की जाती है। आलोचना का निशाना बनी कृति कई बार कलाकार को नुक्सान पहुँचाने की बजाय फायदा भी देती है, जो अन्य कलाकारों को वही गलती जानबूझ कर करने के लिये उकसाती है। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकारी और बुत्ततराॅशी में जानबूझ कर भरे जाते ऐसे ही एक दोष का नाम है अशलीलता जिसे उर्दू में फाहसीपन और अंगे्रजी में टंनसहंतपजल कहते हैं।

शूरवीर मिर्जा

शूरवीर मिर्जा
प्यार को मनुष्य की चैदह मूल प्रवृतियों में से उत्तम माना जाता है। दुनियां की बाकी भाषाओं की तरह पंजाबी जुबान में भी प्रेम कहानी को एक विशेष स्थान प्राप्त है। वैसे तो हर प्राणी की कोई न कोई अपनी प्रेम कहानी होती है लेकिन वह स्वंय (निज) तक ही सीमित होकर रह जाती है। परन्तु कुछ मनुष्यों की प्रेम कहानी आम लोगों से अलग, दिलचस्प अलौकिक और अलग होती है। इसलिए लोग उनकी कहानी सुनाते हैं और वह साहित्य का अनूठा अंग बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होती हुई सदियों तक अमर रहती हैं। ऐसी ही एक प्रेम कहानी है, मिर्ज़ा-साहिबा। जब भी मिर्ज़े का ज़िक्र होता है तो हमारे दिल में चार पात्र साक्षात आ खड़े होते हैं। एक किस्से का नायक मिर्ज़ा, दूसरी नायिका साहिबा और तीसरा सहायक पात्र मिर्ज़े की घोड़ी बक्की और चैथा वह (बूक्ष) जिसकी छाय में मिर्ज़ा मारा जाता है। किस्सा शब्द जिसका अर्थ कहानी, कथा या वृतांत होता है। चाहे यह अरबी भाषा का शब्द है, लेकिन पंजाबी में भी इसको उतनी ही मान्यता प्राप्त है, जितनी कि अरबी, फारसी या इरानी अदब में है। किसी का उद्भव विद्वानों अनुसार फारसी मनस्वी परम्परा द्वारा हुआ है। हमारे पास जिऊणा मोड़, दुल्ला भट्टी, जैमल-फत्ता, सुच्चा सूरमा, शाहणी कौल, रूप-बसन्त जैसे किस्से और पंजाबी किस्सेकारों के नामों की लम्बी सूची मौजूद है। जिनमें से दामोदर (हीर-रांझा), वारिश शाह (हीर-रांझा), हाशम कादरयार (सस्सी-पुन्नू), पीलू (मिर्ज़ा-साहिबा), हाफिज़ बरखुरदार (मिर्ज़ा-साहिबा), अहमद यार (कामरूप-कामलता), कादर यार (राजा रसालू, पूर्ण भगत), फज़ल शाह (सोहणी-महिवाल, लैला-मजनू), इमाम बख्श (शाह बहिराम), अहमद गुजर, मुकबल आदि नाम प्रमुख है।

तुझे पियेंगे नसीबों वाले!

तुझे पियेंगे नसीबों वाले!
‘‘एक सवाल मेरे मन में आता है, वह यह कि हमारे हीरों जैसे लेखक.... गायक.... शराब पी-पी कर क्यों अपनी जान गँवा रहे हैं? क्या शराब... जिंदगी और सेहत से... ज्यादा अच्छी है?’’
पंजाबी आरसी की फेसबुक वाल पर कुलदीप माणक की मृत्यु का इज़हार करते हुये तनदीप तमन्ना जी ने यह उर्पयुक्त विचार लिखा था। सवाल वाक्य ही गौर की माँग करता है। पहले सुरजीत बिंदरखीआ, फिर काका भैणीवाला मेजर राजस्थानी और फिर माणक।
शिव कुमार बटालवी के अतिरिक्त एक दर्जन से भी अधिक पंजाबी के साहित्यकार हैं, जो मनहूस शराब की भेंट चढ़े। बात यह नहीं है कि केवल गायक, एक्टर, साहित्यकार ही शराब पीकर मरते हैं। बहुत सारे आम लोग भी शराब की भेंट चढ़ते रहते हैं। लेकिन उनको मीडिया कवरेज नहीं मिलती। प्रसिद्ध लोगों के बारे में वह खबर बन जाती है और जंगल की आग की भांति फैल जाती है। जब कोई आम व्यक्ति शराब सेवन से मरता है तो उसके अनेकों कारण होते हैं, जैसे आर्थिक तंगी, असफलता, कर्ज़ा, बेरोज़गारी, घरेलू रिश्तों में उत्पन्न हुआ तनाव, मजबूरी या अय्याशी। लेकिन प्रसिद्ध व्यक्तियों की मृत्यु का केवल एक कारण होता है, वह है उनका प्रसिद्ध होना।

नंगे सागर की सैर

नंगे सागर की सैर
दिनांक एक सितंबर 2013 को पंजाब टैलीग्राफ की तरफ से पंजाब टूरज़ के बैनर तले इंग्लैंड के एक मशहूर समुद्री तट ब्र्राईटन के टूर पर ले जाया गया। वैसे तो लीमोसोल (साईप्रस), उसटैंड (बैल्ज़ियम) आदि अर्थात् दुनियां के अन्य अनेकों देशों के समुद्र देखे हैं। इंग्लैंड के भी ब्लैकपूल, साऊथएण्ड औन सी एंव वैस्टरन-सुपरमेअर आदि को तो ननिहाल जाने जैसे जब दिल करे चले जाते हैं। ब्राईटन के इस सागर की सैर का भी यह कोई पहला अवसर नहीं था। काॅलेज के दिनों में तो लगभग हरेक दूसरे तीसरे सप्ताह के आखिर में यहाँ जाकर बोतल के ढक्कन खोलते थे। लेकिन ब्राईटन की मेरी इस यात्रा में पूर्व यात्राओं से भिन्नता थी। पहले एक आशिक मिज़ाज युवक यहाँ आया जाया करता था और अब एक संजीद और साहित्य को समर्पित लेखक जा रहा था।
ब्राईटन, पूर्वी ससैक्स काऊँटी के अधीन पड़ता गे्रट ब्रिटेन की दक्षिणी बंदरगाह वाला शहर है। इसके बसने का इतिहास 1080 से भी पहले का है। पहले इसे ब्रिसटैलमसटिऊन कहा जाता था। पुरानी अंगे्रजी के इस शब्द का अर्थ है, पत्थर का चमकीला टोप। यह सिल टोप समुद्री हमलावरों का सामना करने वाले सैनिक अपनी सुरक्षा के लिये पहना करते थे। अर्थात् ब्राईटन को इंग्लैंड का सुरक्षा टोप माना जाता था, क्योंकि समुद्री रास्ते से होने वाले हमले अधिकतर इसी मार्ग से होते थे और सबसे पहले ब्राईटन वासी ही दुश्मन का सामना करते थे। बारहवीं-तेरहवीं सदी में यह नाम बिगड़ कर ब्राईटहलमस्टोन बन गया था, जिस का अर्थ भी वही था। उसके पश्चात् ब्राईटहलमस्टोन का मौजूदा संक्षेप रूप ब्राईटन प्रचलित हो गया था।

शांती के पुंज: बाबा शेख फरीद जी

शांती के पुंज: बाबा शेख फरीद जी
इतिहास गवाह है जब कभी भी अत्याचार, कुकर्म, पाप, जुल्म बढ़े हैं, बुराईयां भलाई पर भारी पड़ी हैं, शांति भंग होकर अशांति बढ़ने फूलने लगी है। परमात्मा ने किसी न किसी पीर, पैगम्बर, संत, फ़कीर, आलौकिक अर्थात किसी महान शख़्सीयत को शांति दूत बनाकर अमन की स्थापना करने और मार्ग दर्शन करने के लिए धरती पर भेजा है। बाबा शेख फ़रीद जी भी एक ऐसी ही महान आत्मा थे, जो शांति का पैगाम बांटने इस दुनिया पर आये। इसलिए श्री जगमोहन सिंह बराड़ ने फरीद जी को ‘‘प्रेम और एकता की रोशनी’’ कहा है।
जिस काल (युग) में वह उन्होंने विचरण किया समय भी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हालात अधिक अच्छे नहीं थे। शेख फरीद जी ने बारहवीं शताब्दी में विचरण किया जब मौलवी और काज़ियों का बोलबाला और कट्टरपंथियों का जोर-जुल्म चलता था। हिन्दुस्तान में मुसलमानों का राज्य अभी स्थापित ही हुआ था। मुसलमानों में अपने मज़हब की शाखाओं को फैलाने की भूख थी। वह अपने धर्म को दूसरे धर्मों की तुलना में सर्वोत्तम समझते थे। वह चहते थे कि सारे संत-फकीर अपने प्रचार के द्वारा इस्लाम को सर्व-श्रेष्ठ धर्म सिद्ध करें ताकि हिन्दुस्तान में बाकी धर्म लुप्त हो जाये। जो मौलवी (फकीर) मानवीय एकता और सांझीदारी की बात करते थे। वे इस्लामी अधिकारियांे से नफरत पाते थे और उनको सख्त सज़ा दी जाती थी।

हीर की गाथा


हीर की गाथा
पंजाबी की सब से अधिक पढ़ी लिखी, सुनी और गायी जाने वाली प्रसिद्ध प्रेम कथा है हीर। हीर का किस्सा लिखने में दो नाम ज्यादा मशहूर हैं, एक दामोदर और दूसरा वारिस शाह। पंजाबी के लेखकों को इतनी मुसीबत पड़ गई कि ढाई सौ से अधिक लेखकों ने हीर लिख दी। वारिस शाह या दामोदर के साथ उनकी तसल्ली नहीं हुई। अभी भी यह प्रचलन जारी है।
दामोदर, वारिस से बहुत पहले हुआ है। वारिस अपनी रचना में हीर के किस्से के उपर अपनी मौलिकता का दाव नहीं करता, वह यह स्पष्ट कर देता है कि उसके समय हीर गाथा लोगों की जुबान के ऊपर आम रहती थीः-
यारां असां नू आण सवाल कीता, इश्क हीर दा नवां बनाईयेजी ऐस प्रेम की झोक दा सब किस्सा, ती भा सोहणी नाल सुणाईये जी रज़मा माअनियां विच्च खुशबू होवे, इश्क मूश्क नू खोल विखाई नाल अजब बहार दे शेयर कहके, रांझे हीर दा मेल मलाईये जी। वारिस शाह रल नाल प्यारियां दे, नवीं इश्क की बात हिलाईये जी। और हुक्म मन के सजणा प्यारियां दा किस्स अजब बहार दा जोड़िया ई।
फिकरा जोड़ के खूब दरूस्त कीता, नवा फूल गुलाब दा तोड़िया ई। वारिस शाह फरमाया प्यारियां दा, असां मंनिया मूल न मोड़िया ई।(5) या लेकिन दूसरी तरफ दामोदर अपने किस्से में आरम्भ से लेकर अंत तक यह ढिंडोरा पीटता है कि यह इसकी अपनी रचना है और वह सारी कथा का चश्मदीद गवाह है। दामोदर गांव वलारा, तहसील चनिओट का गुलाटी जाति का अरोड़ा हिन्दू क्षत्रिय था और उसके अनुसार उस ने चूचकाने (झंग (पेड़) उस समय अस्तित्व में नहीं आया था और झंग की नींव चूचक के भतीजे ने मल खान ने चूचक की मौत (1462 ई.) के बाद 1464 ई. में रखी थी और 1466 ई. में लाहौर दरबार से पट्टा भी लिखवाया था।) हीर के गांव में हाट (दुकान) कीथीः-