Wednesday, 2 January 2019

शूरवीर मिर्जा

शूरवीर मिर्जा
प्यार को मनुष्य की चैदह मूल प्रवृतियों में से उत्तम माना जाता है। दुनियां की बाकी भाषाओं की तरह पंजाबी जुबान में भी प्रेम कहानी को एक विशेष स्थान प्राप्त है। वैसे तो हर प्राणी की कोई न कोई अपनी प्रेम कहानी होती है लेकिन वह स्वंय (निज) तक ही सीमित होकर रह जाती है। परन्तु कुछ मनुष्यों की प्रेम कहानी आम लोगों से अलग, दिलचस्प अलौकिक और अलग होती है। इसलिए लोग उनकी कहानी सुनाते हैं और वह साहित्य का अनूठा अंग बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होती हुई सदियों तक अमर रहती हैं। ऐसी ही एक प्रेम कहानी है, मिर्ज़ा-साहिबा। जब भी मिर्ज़े का ज़िक्र होता है तो हमारे दिल में चार पात्र साक्षात आ खड़े होते हैं। एक किस्से का नायक मिर्ज़ा, दूसरी नायिका साहिबा और तीसरा सहायक पात्र मिर्ज़े की घोड़ी बक्की और चैथा वह (बूक्ष) जिसकी छाय में मिर्ज़ा मारा जाता है। किस्सा शब्द जिसका अर्थ कहानी, कथा या वृतांत होता है। चाहे यह अरबी भाषा का शब्द है, लेकिन पंजाबी में भी इसको उतनी ही मान्यता प्राप्त है, जितनी कि अरबी, फारसी या इरानी अदब में है। किसी का उद्भव विद्वानों अनुसार फारसी मनस्वी परम्परा द्वारा हुआ है। हमारे पास जिऊणा मोड़, दुल्ला भट्टी, जैमल-फत्ता, सुच्चा सूरमा, शाहणी कौल, रूप-बसन्त जैसे किस्से और पंजाबी किस्सेकारों के नामों की लम्बी सूची मौजूद है। जिनमें से दामोदर (हीर-रांझा), वारिश शाह (हीर-रांझा), हाशम कादरयार (सस्सी-पुन्नू), पीलू (मिर्ज़ा-साहिबा), हाफिज़ बरखुरदार (मिर्ज़ा-साहिबा), अहमद यार (कामरूप-कामलता), कादर यार (राजा रसालू, पूर्ण भगत), फज़ल शाह (सोहणी-महिवाल, लैला-मजनू), इमाम बख्श (शाह बहिराम), अहमद गुजर, मुकबल आदि नाम प्रमुख है।

पुरूष प्रधान समाज के होते हुए भी पंजाबी के जितने भी पुरातन (पुराने) प्रेम किस्से हैं, उनमें से नायक से पहले नायिका का नाम आता है, जैसे हीर-रांझा, सस्सी पुन्नू, मलकी-कीमा, सम्मी-ढोला, सहिती-मुराद, शीरी-फरहाद, लैला मजनू, बेगो-इंद्र, सोहणी-महिवाल, शीरी-खुसरों आदि। इसका एक मात्र कारण यह रहा है कि इन किस्सों में नायिका नायक के मुकाबले अधिक मेहनती, मजबूत, बलवान, चालाक और भरपूर कार्य करती हैं। पंजाबी का सिर्फ और सिर्फ एक ही ऐसा किस्सा है जिस में नायक का नाम नायिका से पहले आता है। वह है पीलू रचित मिर्ज़ा-साहिबा, क्योंकि किस्से में नायक का संघर्ष नायिका से अधिक होता है और वह सारे किस्से में नायिका पर भारी रहता है। नायिका का काम तो बक्की पर झूलने या तीर तोड़ने का ही होता है। पीलू ने अलग-अलग प्रकार की सामग्री और मसाले डाल कर जायकेदार किस्सा तैयार किया है।
पंजाबी कहानी काव्य का जन्मदाता या बाबा बोहड़ दामोदर ;क्ंउवकंत क्ंे ।तवतंद्ध को माना जाता है। क्योंकि उसने सब से पहले और सब से अधिक मशहूर कहानी हीर की रचना के साथ पंजाबी में कहानी काव्य का आरम्भ किया। उसके बाद अब तक ढाई सौ पंजाबी रचनाकारों ने हीर पर कलम अज़माई की है, जो किताबों के रूप में उपलब्ध है। बाकी जो अभी तक प्रकाशित नहीं हुये और भी बहुत होंगे। इस प्रकार मिर्ज़े के किस्से को सब से पहले रचनेवाला पीलू है। पीलू ने इस किस्से के साथ न सिर्फ कहानी काव्य को नया मोड़ दिया, बल्कि परम्परागत धारणाएं, शैली और विधियों को तोड़ कर नया मार्ग दिखाया। पीलू से पहले हर पंजाबी किस्से (कहानी) का अंत खुशी-खुशी हुआ करता था और कहानी के नायक कमजोर, आलसी, डरपोक और भोले पराशारिरीक शक्तियों में आस्था रखने वाले हुआ करते थे। पीलू ने पश्चिमी किस्सों की तरह किस्से का अंत दुखांत में करने की परम्परा को फिर से बांधा। पीलू ने पुरातन या श्र्व के से पहले किस्सों की हर एक बात को ग्रहण भी किया और अपने किस्से में उस लड़ी को खूब आगे बढाया। वह है किस्से में नायक और नायिका के रास्ते में आने वाला नायिका का कोई रिश्तेदार खलनायक अैर उनका मिलाप (मिलन) के लिए सहायता करने वाला कोई न कोई सहायक पात्र जो आम तौर पर नायिका के घर जाने की पहुँच (हिम्मत) रखता है। अधिकतर यह पात्र वृद्ध आयु की स्त्री हुआ करती है, जैसे हीर की सहायता मीठी नाईन, जुलेखा का साथ वृद्ध औरत और साहिबा की मदद उसकी बुआ बीबो करती हैं।
हमारे विद्वानों का मानना है कि पीलू, गांव वैरोवाल, तहसील तरनतारन, ज़िला अमृतसर का निवासी मुस्लमान जाट था। उसका जन्म पन्द्रह सौ अस्सी ई. में हुआ और 95 साल की आयु भोग कर 1675 ई. में चक्कवाल के गांव मिहरू में पीलू में उसका देहांत हुआ। वह बादशाह जहांगीर (1569-1627) के अंतिम और शाहजहां (1592-1666) के आरंभिक समय काल में हुआ और गुरू अर्जुन देव जी (1563-1606) की संगति करने का उसको सम्मान प्राप्त था।
मिर्ज़ा साहिबा के किस्से का घटनाकाल 1627-58 माना जाता है। दानाबाद (ननकाना साहब, फैसलाबाद, पाकिस्तान) में खरल गोत के वंझल खान के घर मिर्ज़े का जन्म हुआ। उसके चार भाई और एक बहन सहती (छहिती) है। मिर्ज़े की बचपन से परवरिश ननिहाल में झंग (जेहलम और झना का संगम स्थान, मौजूदा खीवा, ज़िला झंग, पाकिस्तान) में होती है। साहिबा सिआल (साहिबा का गोत्र था सिआल, जो राजा शंकर से चला, जिसका वैश (कुल) महाभारत के कौरवों से मिलता है और आगे चलकर खर्लो से मिलता है) मिर्ज़े के मामा खीवे खान की बेटी थी। बचपन में मकतब में पढ़ते हुये दोनों का प्रेम हो जाता है। दोनों की छोटी उम्र में मंगनी भी हो जाती है। दोनों जवान होते हैं तो मिर्ज़ा तीर अंदाजी में बढ़िया योद्धा और साहिबा हसीन युवती के तौर पर प्रसिद्धी प्राप्त करते हैं। किसी कारणवश मिर्ज़े से साहिबा की मंगनी तोड़कर चन्धड़ खानदान के लड़के से रिश्ता कर दिया जाता है। चन्धड़ो के वंश की उत्पत्ति उत्तर भारत के शासक अग्नपाल तोमर, महाभारत के शांतनु और अर्जुन पांडवों से होती हुई उनके बड़े चन्द्र (सोम) से हुई मानी जाती है। यह अधिकतर राजपूत या गुज्जर है।
विवाह से चार दिन पहले साहिबा अपने नौकर करमू, ब्राहमण के द्वारा मिरजे को अपने विवाह की खबर भेजती है। मिरजे की बहन को संदल बार के भटियों ने ब्याहने आना होता है। मिरजा अपनी बहन सहिती का विवाह बीच में ही छोड़कर अपनी माँ, बहन और पिता के रोकने और छींक मारने, पल्ला अटकने जैसे बदशगुनों (बुरे शगुनों) के बावजूद अपनी घोड़ी बक्की के ऊपर बैठकर झंग की तरफ चल पड़ता है।
मिरजे ने घोड़ी शिंगार ली, आसन बैठा जा।
चड़दे दा पल्ला अटकिया, छींक सामने आ।1611 (किस्सा मिरजा-साहिबा पीलू) 
घर से जाते मिरजे को जाने से रोकने के लिये टोक कर बहन का रोकना! (1) चड़दे मिरज़े खान दी सहिती करे जुआब 
(1) हट के बैठी मिरजियां, घर विच करी सलाह।
(3) पंलग ते बह के, मेरा हथी काज सवार।
भलके आऊणगे भटी संदल बार दे, साहिबा संड़े दी बार।
मिरजे का जुवाबः मेरा जाण जरूर दा, पिछे भाई चार।
अच्छी करन आपणे नाक नू, नहीं खरलां आऊ हार।
मेरा जाणा जरूर दा, जांदे नू होड़ ना पा।
मां दा रोकणाः चड़दे मिरजे खान नू, मत्ता देवे मां।
बुरे सिआला दे मामले, बुरी सिआला दी राह।
बुरीयां सिआला दीआं औरतां, लैंदियां जादू पा।
कड़ कलेजे खांदीयां, मेरे झाटे तेल ना पा।
रन्न दी खातर चलिये, आवे ना जान गवा।
आखे मेरे लग जा, अगे पैर ना पा।
मिरजे का जवाब: ब्याही होवे छड़ देवां, मँग ना छड़ी जाए
जेकर मँग छड़ देवा, लगे खरला नू लाज।
पिता का रोकनाः चड़दे मिरजे खान नू, वंझल देंदा मत
भट रन्ना की दोस्ती, खुरी जिन्ना दी मत।
हस के लांदीया यारीयां, रो के दिनदियां दस।
जिस घर लाई दोस्ती, मूल ना घतो लत।
लथी हाथ ना आंवदी, दानिशमंदा दी पत।
मिरजे का जवाबः राजा झूरे राज नू, बुद्धि नू झूरे चोर।
गोरी झूरे रूप नू, पैरां झूरे मोर।1911 (किस्सा मिरजा-साहिबा, पीलू)
नानी के गाँव में आकर मिरजा अपनी धर्म की मौसी बीबो के द्वारा साहिबा से संपर्क बनाता है। जाम लुहार से वह हज़ार कीले बनवाकर उनको दीवार में गाड़ कर साहिबा के घर के अंदर पहुँचता है और साहिबा को निकाल लाता है।
फिरोज डोगर कूकिया, सुणी खान खीवे मेरी बात।
साहिबा नू मिरजा ले गया, रोंदी संड़े दी बार।
ला गया लाज सियाला नू, गया सी दाग लगा।
घोड़े पाओ पांखरा, पैदल हो जाओ असवार।
रसते पवो पैदल, मुच्छ मलो असवार।
शावा मिरजा मारना, करके कौल करार। बंद 4।।
फिरोज डोगर इस घटना की खबर खीवे खान को देता है तो साहिबा का भाई शमीर और चंदड़ घोड़े और पैदल साथी लेकर मिरज़े साहिबा की खोज में निकल पड़ते है। झंग और दानाबाद के रास्ते में मिरजा साहिबा एक जंग (वृक्ष) के नीचे आराम करते हैं। मिरजा गहरी नींद में सोया पड़ा होता है और साहिबा का भाई और मंगेतर उनको आ कर दबोच लेते हैं। सियालों और चंदड़ो की फौज के साथ हुई जंग में अकेला हुआ लड़ता मिरजा मारा जाता है।
बावा बुद्ध सिंह के मुताबिक, हाफिज़ बरखुरदार 1676 ई. में औरंगजेब का समकालीन था। लेकिन हाफिज़ बरखुरदार ने 1090 हि. में नवाब जाफिर खां के इससार और ‘युसुफ-जुलेखा’ किस्सा लिख कर ईवज़ाने में सात बीघा जमीन, घोड़ा, और सो रूपये नकद ईनाम प्राप्त किया था।
मैं नैणा  दे नाल परोते चुण-चुण दूर यगाने।
तां ऐहे हार मरतब होया आलमगीर जमाने।
नवाब जाफिर खां फरमाईश कीती तां ऐहे किस्सा बणया।
ज़ाहिर बातन राजी होया जां ऐहे पढ़िया सुणिया
इक ज़मीन इलाईत कीती, बिधा सत पछाणी।
जोड़ा घोड़ा नकद दवाया, सो रूपया जाणी। 
(किस्सा युसूफ जुलेखा, हाफिज बरखुरदार)?
अब यहां पैदा हुये विवाद को ज़रा स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि विदवानों के अनुसार वारिस शाह 1722-1798 में हुआ है। हाफिज़ बरखुरदार 1658-1707 में और हाशिम 1735-1843 यह नोट करने वाली बात यह है कि इन तारिखों का कोई दस्तावेजी या पुखता सबूत नहीं है यह महज़ रचनाओं से अंदाजा लगा कर मानी जाती है। दूसरी बात यह भी है कि इन लेखकों की रचनाये कितनी उनकी खुद की है और उनमें दूसरों के द्वारा कितनी मिलावट है। इस बारे में भी विद्वानों में मतभेद है। इसलिये वारिस ने हाफिज़ का प्रभाव लिया यां हाफिज़ ने वारिस का यह दावे के साथ कहना मुश्किल है लेकिन यह बात पक्की है कि मिरज़ा साहिबा और हीर के किस्से में बहुत कुछ मिलता-जुलता है। बेशक कुछ विद्वानों के द्वारा मिरज़ा साहिबा पहले का लिखा हुआ माना जाता है परंतु बहुत सारे तथ्य हीर के किस्से से पहले प्रचलित होने के बारे में विचार करने योग्य हैं। हीर की कहानी अकबर के राज्यकाल के समय में घटी और मिरजे की उस के पश्चात घटि हुई मानी जाती है बेशक वह किस्सा लिखा बाद में गया हो। मिरज़ा साहिबा को पहले पीलू ने लिखा, फिर उस से चोरी करके हाफिज़ बरखुरदार ने लिख दिया। पीलू के किस्से को कापी पेस्ट करने के बाद हसी आती है। जब हाफिज़ बरखुरदार पीलू की तारीफ में आखिर में लिखता है, ‘‘यारो! पीलू के साथ बराबरी करनी शायद भूल करनी है।
पीलू ने कहानी बुनी हुई थी। इस लिये हाफिज़ बरखुरदार को ज्यादा परेशानी नहीं हुई। नकल कर के हाफिज़ बरखुरदार बना-बनाया किस्सा जैसे का तैसा, ठेठ पंजाबी बोली में तबदील करके अपनी मातृ भाषा पंजाबी में लिख देता है। हाफिज बरखुरदार की क्षेत्रिय बोली से अतिरिक्त उसके किस्से मंे पीलू के किस्से से कोई विशेष भिन्नता नहीं है। जो कुछ और कुछ उसने अपनी तरफ से लिखा भी है तो उसका कहानी से कोई सम्बन्ध नहीं है और महज बड़ी-बड़ी डींगे ही मारी हुई है। उदाहरण के लिये नीचे लिखी पंक्तियां पढ़ेंः-
पीलूः घर खीवे दे साहिबा, जंमी मंगलवार।1।।
हाफिज़ः घर खीवे दे जमी साहिबा, जिस दी हूरां रशक करन।3।।
पीलूः घर वंझल दे मिरजा, जमया करड़े वार।2।।
हाफिजः जिस दिन मिरजा जमया, चंदो चैधवीं रात।7।।
पीलूः जे देवे प्याला जहर दा, मै मिरजा लैंदा पी।7।।
हाफिजः ऐह ज़हर प्याला इश्क दा, भर भर पी निशंग।4।।
पीलूः चढ़दे मिरजे खान नू, मत्ता देवे माँ।4।।
हाफिजः चढ़ते मिरजे खान नू, अगो मादर देवे मत।26।।
पीलूः रन दी खातर चलिस, आवे जान गवा।4।।
हाफिज़ः जाये बिगानी नार नू, मूख पावे हथ।26।।
पीलूः देख के मेरी टैक्र नू, झोरे चित्त ना पा।38।।
हाफिज़ः नीली देख ना दूबली, झूरे जीया बा ताई।33।
पीलूः बकी तो डरन फरिशते, मैथो डरे खुदा।39।।
हाफिज़ः मिरजे दी नीली कटक नी, जेहदा खादे खौफ गनीम।6।।
पीलूः मन्दा कीता सुण साहिबा, मेरा तरकश टंगया जंड।?
तीन सौ कानी मिरजे जवान दी, देंदा सयाला नू वंड।
पहली मारदा वीर शमीर दे, दूजी कुले दे तंग।
तीजी मारा जोड़ के, जीहदी है तू मंग।63।।
हाफिजः बुरा कीतो ई साहिबा मेरा तरकश छडी ओई जंड।
मेरा जीवन बहुत मुहाल है पर तू वी होसी रन्ड।
इक मन्दा कीता साहिबा मेरी नीली छडी डग।
त्रे से साठ कानी मैं तरकशी देवा सालेया नौ बन्ड़।
पहले मारा खान शमीर नू, दूजे कुल्ले दे तँग।
तीजे मारां ताहन खान नू, जेहदी तू साई मंग।
चैथा मारां तेरे बाप नू कुल मुकावा कंलक।
पंजवे मारां खान अल्लाह दाद नू, सूटा बिहरों दी पंड।35।।
पीलूः मिरजा फुल्ल गुलाब दा, मेरी झोली टुट पया। बन्द 33।।
हाफिज़ः जद बुक्तां दीआं वंडीया ढेरीयां, मै मिरजा बैठी सा मंग।5।।
पीलूः  ऊठी वे मिरजया सुतिआं, क्यों पिआं बड़े गुमान।56।।
हाफिजः साहिबा नाल हरीफ दे सुतया, मिरजा मरनो बेपरवाह।1।।
पीलूः जे घर ना सी तेरे बाद दे, मँग लयाउंदो होर।37।।
हाफिजः जे घर नही साई आपणे, तां मंग लिआदो होर।31।।
यह बताना अत्यंत आवश्यक है कि पीलू द्वारा रचित किस्सा मिरजा साहिबा करता की कलम से लिखित रूप में हमारे पास उपलब्ध नहीं है और ना ही हमें हीर वारिस शाह के किस्से के जैसा संपूर्ण रूप में मिलता है। जब हम बाकी किस्सेकारों को पढ़ते हैं तो देखने में मिलता है कि वह किस्से की कहानी को जगह-जगह रोक कर अपनी कही गई बात की बडाई करने था प्रयोग किये गये मुहावरे और अलंकार से सम्बंधित मिसालें और फालतू व्याख्यायें देकर कवि उवाच के द्वारा अपनी विद्वता झाड़ने का यतन करते हैं। लेकिन पीलू के किस्से में कहानी राकेट की स्पीड से फराटे मार कर चलती है और अनेकों जगह पर विवाद हैं। जिनको पाठक अपनी बुद्धि अनुसार पूरा करता है। दूसरा सबूत हमें किस्से के अधूरे होने का यह मिलता है कि सारे बन्द एक अनुसार नहीं है और न ही तुलनात्मक मात्रायें बराबर है बन्द 59, बंद 57 से पहले चाहिए था। गौर फरमायेंः
बंद 57ः मिरजे आऊंदा वेखिया, साहिबा दा वीर शमीर।
ते मिरजे गोशे विचो कडया, करड़े नुक्के दा तीर।
कर बिस्मिलाह मारया, भोंदा वांग भंबीर।
घोड़ी ऊतो लाह लेया, साहिबा दा वीर शमीर।
बंद 59ः मिरजे विच बड़ा गुमान सी, फिर सो गया जंडूरे दे पास।
मैं वल-वल वड दियांगा सूरमें-दियू पूर खप।।
मैंनू झट कु ठोंका ला लैन दे, सुत्ते नू न जगा।
दिन चढ़दे नू चलांगे, तैनू ले चला दाना बाद।
कई जगह दो तुक वाले बंद, तीन तुक वाले बंद और अधिकतर चार तुक वाले बंद है। इस किस्से में अलग-अलग गायकांे की ओर से भी मिलावट होने की पूरी गुंजाइश है। परंतु हम इस को पीलू की सम्पूर्ण रचना ही मानते है। ‘सद’ (ऊँची आवाज में अपनी बात कहते हुए) काव्य रूप में होने सद्का इस किस्से को गायक भांड, भट, नृतक, मरासी आदि गाते थे और इस प्रकार यह मशहूर हुआ। सद् किसी की मौत के बाद जीवन के बारे में लिखे जाने को भी कहा जाता है। रामायण में राजा दशरथ की मृत्यु के बाद और महाभारत में अभिमन्यु की मौत के बाद संस्कृत में सद् काव्य के रूप में श्लोक मिलते हैं। गुरू अमरदास जी के ज्योति ज्योत समाने के बाद भाई सुन्दर जी ने रामकली राग में ‘सद्’ की रचना की, जो गुरू गं्रथ साहिब में संकलित है।
किस्सा मिरजा-साहिबा जितना और जिस रूप में भी आज हमारे पास है तो इसका श्रेय फिरंगियों को जाता है। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अफसर जौहन लौरेंस के निजी अफसर रहे सर रिर्चड टैम्पल ;ैपत त्पबींतक ज्मउचसम प्ेज ठंतवदमजए थ्त्ैए ळब्ैज्ए ब्प्म्ए च्ब्8 डंतबी 1826 . 15 डंतबी 1902द्ध ने पंजाब का चीफ कमिश्नर बनने के बाद 1864-65 में भट्ठों मरासियों से यह मौखिक किस्स सुन कर लिपीबद्ध कर दिया था।
कहानी लिखने वाले कुछ लोगों की धारणा रही है कि यदि आपकी कथा-कहानी पर सत्य होने का लेबल लगा दिया जाये तो लोगों में उसको पढ़ने या सुनने की उत्सुकता दोगुनी हो जाती है। अपनी अपनी रचना की लोकप्रियता के लिए बहुत सारे लेखक यह तरीका अपनाते भी है। लेकिन यह मेरा निजी ख्याल है कि साहित्य तो साहित्य होता है लेकिन उसके अच्छे बुरे की परख साहित्य की कसौटी पर ही की जाती है। कहानी के सच्ची होने के साथ उसमें गुण नहीं पैदा हो जाते और काल्पनिक होने से दोष नहीं आते। यह तो लिखने वाली की प्रतिभा, मेहनत और कला पर निर्भर करता है कि वह अपनी रचना को किस बुलन्दी पर लेकर जाता है। हमारे बहुत सारे पंजाबी के विद्वान मिर्ज़ा साहिबा के किस्से को एक सत्य कहानी मानते हैं। झंग में सियाला के कबीले का वास करना (रहना) और दानाबाद में खरला का होना, इस किस्से के सत्य होने का कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए अपने अध्ययन के आधार पर मैं इस को पूरी तरह से काल्पनिक किस्सा मानता हूँ। यह अर्धकल्पित भी हो सकता है। हां, यह जरूर माना जा सकता है कि किस्से के बीच के कुछ-अंश अलग-अलग जगहों पर घटित हुए होंगे। मेरे जांचे गए किस्से का मूल स्त्रोत हिन्दुस्तान के शहंशाह जलाल-उद-दीन अकबर (14 अक्तूबर 1542 - 27 अक्तूबर 1605) के राज्यकाल के समय घटी एक बहुत ही मशहूर घटना से लिया गया है। अकबर-ए-आज़म ने अपने शासन काल के समय अपना नया मज़हब दीन-ए-इलाही चलाने का प्रयास किया था। उसने अपने नये धर्म में गैर-मुसलमानों से लिया जाने वाला ‘ज़जीया’ (ज्ंग) और जानवरों की ईद के मौके पर ली जाने वाली कुर्बानी पर पाबन्दी लगाने जैसे अनेकों अच्छे काम किये। यह बात अलग है कि कट्टड़ पंथियों ने दीन-ए-इलाही को चलने नहीं दिया।
खैर, पुराने समय में राजा, महाराज और अमीर व्यक्ति अपने जवान हो रहे लड़कों को वेश्याओं के कोठियों पर भेजा करते थे ताकि उनको औरत के साथ बातचीत और प्यार करने का सलीका आ जाये। इसी तरह ही एक अमीरज़ादा था। जो वेश्याओं की संगत में रहकर इस कदर बिगड़ जाता है कि उसका पिता उसको घर में हर समय कैद रखने का अपने नौकरों को हुक्म दे देता है। उस अमीरज़ादे ने खुला माहौल देखा होता है। उसको अपने पिता की कैद में रहना बड़ा मुश्किल लगता है। दिन रात वेश्याओं के साथ मनायी रंग रलियों के बारे मंे सोच-सोचकर काम वासना उसके अंदर भड़कती रहती है और जिसका परिणाम यह होता है कि उसके अपनी ही सगी बहन के साथ शारीरिक सम्बन्ध बन जाते हैं। मामला अकबर के दरबार में चला जाता है। मौलवी अकबर से पूछता है कि आपके दीन-ए-इलाही के मुताबिक इसको क्या सज़ा देनी चाहिए तो अकबर कहता है कि मैं इन दोनों की शादी और कहीं करवा दूंगा। मौलवी यह सुनकर भड़क उठते हैं और कहते है कि इनका जुर्म बहुत संगीन है और इनको गुनाह मुताबिक सख्त सजा दी जानी चाहिए। इनके कर्मों से समाज में अनैतिकता फैलती है। अगर इनको बख्श दिया गया तो कल को कोई ओर यही गुनाह करेगा।
अकबर मामला मौलवियों के हवाले कर देता है। उस अमीरज़ादे और उसकी बहन को शरेआम आवाम के सामने मौत के घाट उतारे जाने का फतवा दे देते हैं। लोगों के हुक्म के तौर पर चैराहे में एक जंड (बुक्ष) के नीचे उन दोनों बहन-भाईयों के टुकड़े-टुकड़े करके काट दिये जाते हैं। सारे हिन्दुस्तान में इस अमीरजादे की घटना दंत-कथा बनकर फैल जाती है। वर्णनयोग्य है कि मिर्ज़ा, अमीरजादे शब्द का ही संक्षेप रूप है। मिर्ज़ा नाम नहीं था यह मिर्ज़े का पड़ा हुआ नाम था। जैसे नम्बरदार या थानेदार आदि विशेषण व्यक्तियों से नाम की जगह पर प्रयोग किये जाते हैं। मुगलों के राज्य के समय हिन्दु कर्मचारियों को मुसलमानों के अधीन ‘मिर्ज़े’ की उपाधि भी दी जाती थी। जैसे मिर्ज़ा गालिब और उमराव जान जैसे शाहकार का रचेयिता मिर्ज़ा हादी रूसवा आदि को सरकार की ओर से मिर्ज़े की पद्धवी देकर सम्मानित किया गया था।
उपर्युक्त वर्णित घटना वाली सारी बातें पीलू के मिर्ज़े में भी बिल्कुल उसी तरह ही दर्ज हैं, फर्क सिर्फ इतना ही है कि पीलू को समाज की ओर से प्रवानित करने हित मिर्ज़ा साहिबा को चचेरे भाई-बहन यानि मामा बुआ के लड़का लड़की बता देता है। मुसलमानों में यह रिश्ता जायज़ है, क्योंकि इस्लाम का मत है कि सगी माँ और सगी बहन छोड़कर दुनिया की बाकी सब औरतें भोगने योग्य हैं।
यह पूर्व ब्यान अमीरज़ादे वाली घटना से इंजन उठा, (ब्ींेेपे) तला मिथिहास और इतिहास की आड लेकर पीलू ने (ढांचा) हीर के किस्से की फिट करके अपने किस्से की गाड़ी तैयार करके चला दी जैसे लगती है। अर्थात मिर्ज़ा-सहिबा हीर से प्रेरित होकर लिखा गया है। (यदि हीर को अकबर के काल में घटित माने तो हीर मिर्ज़े से प्रेरित होकर लिखी मानी जायेगी पर सबूत न होने के कारण कौन सा पहले घटित हुआ या रचा गया था, यह बात दावे से कहना मुश्किल है।) इस तथ्य के किस्से में अनेकों सबूत और संकेत मिलते हैं, जैसे कि ‘‘मिर्ज़ा सिआलां को चला, खेड़े शीश निवा 11611’’ खेड़े हीर का ससुराल था जैसे अब हमारे लंदन या लाहौर की लड़कियां शिखर वाला बेर समझी जाती हैं, वैसे ही उन समयों में सिआलों की लड़कियां हुस्नाक (खुबसुरत) मानी जाती थी। इसी लिये रांझे की भाभीयाँ ताना मारते हुए कहती हैंः-
साडा हुसन पंसद न लियावणा ए
जा हीर सिआल वियाह लियावीं
वाह वंझली प्रेम दी पा जाली
काई नड्डी सिआला दी फाह लियावीं।
(पृष्ठ 9 हीर वारिश शाह, संपादक डा. बख्शीश सिंह निझ्झर)
पीलू भी अपनी नायिका को सिआलों की लड़की ही नहीं बनाता, बल्कि हीर की तरह साहिबा को झंग की ही बना देता है। सिआलों की लड़कियों के हुस्न का डंका किस कदर बजा हुआ था, इस बात का अंदाजा मिर्ज़े की मां की ओर से मिर्ज़े को दी गई मतों (चेतावनियों) में से लगाया जा सकता हैः-
बुरे सियाला दे मामले, बुरी सियाला दी राह।
बुरीयाँ सियाला दियां औरता लैंदीया जादू पा।
(बंद 14, किस्सा मिर्जा साहिबा, पीलू)
हीर की नन्द का नाम सेहती था। अजीब इतफाक देखो मिर्ज़े की बहन यानि साहिबा की नन्द का नाम भी सेहती था। वारिश शाह के अनुसार हीर रांझा दोनों खूबसूरत थे। वह रांझे का सुंदरता हीर के मोहित होने के साथ ब्यान करता हैः-
सूरत वेखदिया हीर नू खुशी होई
अक्ल भूल गई सर गरदान होई।
रूप जट दा देख के जाग लध्दी
हीर वार द्यत्ती सद के जान होई।
(पृष्ठ नं. 22, हीर-वारिस शाह, संपादक डा. बख्शीश सिंह निझर)
फिर हीर की तारीफ करने लगता तो वारिश शाह तोपे ही तोड़ देता (हद तोड देता) और सिर से पैरों तक हीर के हर एक अंग की तारीफ तशबीहें देकर करता है तो ऐसे लगता जैसे वह हीर का जिस्मानी सर्वेक्षण (डमकपबंस म्गंउपदंजपवद) या पोस्ट मारटम कर रहा हो। इसी तरह ही पीलू भी मिर्ज़े और साहिबा के हुस्न की बार-बार तारीफ करता हैः-
1. जन्म दिया माई बाप ने रूप दिता करतार
मिर्ज़ा ऐसा सूरमा, खली दा सरदार।2।।
2. होरां हथ्थी बर्छियां, मिर्जे दी सबज़ कमान।
धहिने कन्नी आऊंदा मेरा, मिर्ज़ा शेर जवान। बंद 30।।
3. चीरे वाला छोकरा, बीबो अंदर कौन खड़ा?
मिर्ज़ा फुल गुलाब का मेरी झोली टुट पिया। बंद 33।।
(किस्सा मिर्ज़ा-साहिबा, पीलू)
हीर की तारीफ करने के लिए तो वारिश शाह के पास उसकी प्रेमिका भाग्यभरी या मीठी नाईन जैसे जीते जागते पात्र थे। उसने उनको बेपर्दा करके सामने बिठा लिया होगा और उनके शरीर की तस्वीर बनाकर हीर वाले रंग भर दिये होंगे। लेकिन पीलू उतना खुशकिस्मत नहीं था शायद। मजबूरन उसको साहिबा के हुस्न को ब्यान करने के लिए ओर विधि अपनानी पड़ी। पीलू ने साहिबा के हुस्न का वर्णन करते बहुत ही संकोच और संयम का प्रयोग किया है और उसने साहिबा के हुस्न के प्रभाव द्वारा उसकी खूबसूरती को प्रकट किया है पर इस कार्य के लिए पीलू ने दृष्टांत अलंकार का प्रयोग भी किया है। पीलू पक्का जन्म से कुंवारे होंगे क्योंकि वह उसी प्रकार अपने अंदाजे और नजरिये से साहिबा की सुन्दरता का चित्रण करता हैः-
1. साहिबा गई तेल नू, गई पसारी दी हट
फड़ ना जाने तकड़ी, हाड़ न जाणे वट।
तेल भुलावे भुला बाणिया, बलद गंवा ले जट। 
कड कलेजा ले गई, खान खीवे जो धी। 
(बंद पांच, किस्सा मिर्ज़ा-साहिबा, पीलू)
गज गज लंमीया मीड्डिया, रंग नो गोरा सी।
(बंद सात, किस्सा मिर्जा-साहिबा, पीलू)
कमाल है जरवाणे वीर शमीर, चैधरी बाप खींवे खान और करमू ब्राहमण जैसे नौकरों के होते हुए पीलू साहिबा को तेल लेने के लिए भेजता है। बहरहाल, पीलू साहिबा के हुस्न के प्रभावों को निहारता है, पर पीलू का चेला हाफिज़ बर्खुदार मिर्ज़ा लिखने के वक्त सारी कसरें ही निकाल देता है। वारिस शाह, हीर के बारे में ब्यान करता हुआ जो लिखता है, वही हाफिज़ बर्खुदार लिख देता है। वारिश शाह की शैली और उपमाओं का प्रयोग हू ब हू हाफिज ने किया। नमूना देखोः-
घर खीवे दे जम्मी साहिबा, जिसकी हूरा रशक करंन।
अते परीया वेख लुड जांदीआं, कै नारी फखर करन।
साहिबा रंग मजीठ दा, ज्यों-ज्यों धरत रंगंन।
ओहदी छाती दे दो वालीयां, दो बतखां चोग चुगंन।
उस दा कद सकीम तन, विच्च त्रिकल वट पवंन।
अते नाक कुंडी दा पिपला, तुलफा नाल पलमन।
भार जंगल दे पौण अगली जिथ्थे पदम न वजंन।
झाड़ी बीजे आम जो, जंड़ों अम करंन।
ओह दीयां सुरख लबां दंद उजले, ज्यो मोती लाल भखंन।
जा गल करदी हंस के, मुखहूं फल झडंन।
साहिबा दे तीखे नैन कटारीयां, दुसर घाऊ करंन।
ज्यांे तेजी सूरज साहमणे, लाटा नैण मचंन
ओह फारग सूरमे कजलो, एैमे खून करंन।
जा शहर चड़ीवे ज़हर ते, आशिक किवें जीवन।
ओहदे पट चंदन दीया गेलियां, चंगे मुशक छडंन।
उस दी धुनि तुंग शराब दी, आशिक घुट पीवन।
उसदे सीने ते दो डब्बिया ‘आशक मस्त करंन।
ऊपर भौछन काडवा, विच तिलीयर चोग-चुगन
(बंद तीसरा, मिर्जा साहिबा, हाफिज बर्खुदार)
साकी आओ साहमने मथ्थे ते खरल कदीम।
तवंगर साक तवंगरा, सकीम साक सकीम।
साहिबा हाजत नहीं शिंगार दी, लख शिंगार करन।
पर आशक मिसल पतंग दे जल के खाक थीवन।
(बंद चतुर्थ, मिर्जा-साहिबा, हाफिज बर्खुदार)
‘धुनि बहशत दे हौज दा मुश्क कुपा’, ‘नक अलफ हुसैनी दा पिपला’, ‘छाती ठेठ दी उभरी पट खेनु’ और हूर निकली चंन अनवार दी गार’ आदि ये सब बातें वारिश शाह भी लिख चुका है। हाफिज़ बस उपमाओं को तोड़ मरोड़कर कर पेश कर रहा है।
हाफिज़ अपने कलाम में फेर बदल करते बहुत (ज्यादा) सुचेत नहीं होता। हाफिज़ लिखता है, ओहदे पट चंदन दी गेलियां, चंगे मुशक छडन। मुझे समझ नहीं आता कि वह साहिबा की तारीफ कर रहा है या बेइज्ज़ती। खुशबू और बदबू के बीच के अंतर के बारे में उसको ज्ञान ही नहीं?
हीर और मिर्ज़ा, दोनों किस्मों में एक ओर समानता है कि नायिका खुद प्यार के लिए खतरा बनने वाले मर्द को गुस्से मंे आकर धमकाती है। जब कैदो भेष बदल कर छापा मरता है और हीर की चूरी बरामद कर लेता है तो हीर धमकाती हैः-
हीर ढाह के आखिया मीआं चाचा
चूरी देह जे जीवणा लोड़ना ऐ
नहीं ता मारके जिंद गंवा देसा
मैनू किसे न हटकणा होड़ना ऐ।
बन हाथ ते पैर लटका देसा
मैनूं किसे न रोकणा मोड़ना ऐ।
(पृष्ट नं. 35, हीर-वारिस शाह, डा. बख्शीश सिंह निझर)
जब करमू ब्राहमण साहिबा को मिर्ज़े को छोड़ने के बारे में नेक सलाह देता है तो साहिबा कहती हैः-
अग्गो साहिबा बोलदी, तेरे मुँह दे विच्च सुआह।
मारा चपेड़ तेरे गजबदी, दिया अक्ल गवा।
जे खबर हो जाये वीर शमीर नू, तैनू करहि मार।
जे खबर हो जाये पिण्ड देआं मुण्डियाँ, करन ढीमा दी मार।।
(बंद 9, किस्सा मिर्ज़ा-साहिबा, पीलू)
कहानीकार के अनुसार दोनों प्रेमियांे के इश्क का भेद सारे जग में जाहिर होता हैः-
आम गल जहान ते नशट होई, हीर राझे नाल वंझा पड़ी ऐ।
(पृष्ठ नं. 35, हीर-वारिस शाह, संपादक डा. बख्शीश सिंह निझर)
हैरानी की बात तो यह है कि सारे जहान को तो पता होता है लेकिन खीवे खान और शमीर इससे बेखबर होते हैं।
विच्च मसीत ते लगीया जाणे कुल जहान (बंद तीसरा, किस्सा मिर्जा-साहिबा, पीलू)
इस प्रकार और बहुत सी बातें दोनों किस्सों में एक जैसी है। पीलू की रचना के ऊपर वारिस शाह के पड़े सीधे और स्पष्ट प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता।
हमारा पुरातन साहित्य अधिकतर अतिकथनियों से भरपूर है। हीर के किस्से में वारिस शाह ने हीर की साठ और दमोदर ने तीन सौ साठ सहेलियां बताई हैं, जो हज़म करना कठिन लगता है। इसी तरह पीलू ने भी मिर्ज़े के तर्कश में तीन सौ तीर बताये हैं, जो असंभव है। तीन सौ कानी मिर्ज़े जवान दी, देदा सियाला नू वंड। 631’ भले मानुषों! 300 तीरों वाला कोई तरकश नहीं होता। गप्पें मारने की भी कोई सीमा होती है। हाफिज़ बरखुदार ने अपने करैडिट कार्ड के साथ तीरों के पैसे नहीं देने थे, इसलिए वह तीन सौ में साठ और जोड़कर लिखता हैं, त्रै सैं सठ कानी मैं तरकशी देवा सालियां नो वंड। 35।।
मंजूरी ले लई आपणी, किलियां देई हजारा।
(बंद पैंतीस, मिर्जा-साहिबा, पीलू)
साहिबा के बाप की हवेली के ऊपर चढ़ने के लिए मिर्ज़ा जाम लुहार से हजार कीलें बनवाता है। यदि मिर्ज़ा एक फीट के फासले से भी एक कील गाड़ता है, तो ऊँचाई कम से कम 1002 फुट बनती है। इस का मतलब खीवे खान की हवेली न हुई, वह तो इम्पाइर स्टेट बिल्डिंग ही हो गई। मिर्ज़ा जट नहीं मिस्त्रियों का या मोची का लड़का हो, जिसको कील ठोक कर उसका अच्छा अभ्यास हुआ हो। जटों के लड़के आँखे बंद करके फसल सीधे निकाल सकते हैं पर आँखे खोलकर भी हजार कीलें सीधी नहीं गाड़ सकते। हैरानी की बात है कि जब मिर्ज़ा हजार कीलें गाड़ रहा होगा तो क्या उनका शोर नहीं हुआ होगा?
साहिबा के जन्म के समय पीलू खीवे खान को
बधाई दिलाता है और जश्न मनाये जाने का जिक्र करता है।
डू सोहले गांवदे, खान खीवे दे बार।
रज दुआई दित्तीया, सोहणे परिवार।
पता नहीं क्यों यह बात मेरे हलक के नीचे नहीं उतरती। नहीं। लड़कों के होते हुए खीवा खान लड़की के जन्म पर क्या इस लिए खुशी मनाता है कि बड़ी होकर वह ऐसा मनहुस दिन दिखाएगी? वह भी उस समय जब लड़कियों के जन्म के उपरांत लोग जीवित लडकी को ही धरती में दबा देते थे। यदि खीवा खान ज्यादा ही आगे बढने वालों की विचारधारा वाला व्यक्ति होता तो साहिबा के प्रेम विवाह पर भी उसको ऐतराज नहीं होना चाहिए था।
तीन सै नागा पिड़ रिहा, हो गये चैड़ चुप्पट।
(बंद पांचवां, मिर्जा-साहिबा, पीलू)
यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि झंग उस समय कितना बड़ा शहर या गांव होगा। जहां का तीन सौ नागा आवारागर्दी करती घूमती साहिबा मजाक कर देती हैं।
पीलू के किस्से में कई जगह पर विरोधाभास भी है।
घर मिर्जे होर स्त्री सुणीदी बुरी बला।।8।। और
काज विहूणा मैं फिरा, मैनू की किसे दे काजां नाल।।13।।
यह बात स्पष्ट नहीं होती कि मिर्जा शादीशुदा था या कुंवारा। अगर करमू ब्राहमण झूठ बोलता है तो उसके स्पष्टीकरण के लिये कोई वर्णन व्याख्या नहीं है। और कई लेखक एक दूसरे की नकल कर कर लिखे जा रहे हैं कि करमू ने साहिबा से झूठ बोला था। यह बात बिल्कुल मानने योग्य नहीं है। मिर्जा, साहिबा का महबूब ही नहीं रिश्तेदार भी था और वह बचपन से उसको जानती है। फिर करमू के झूठ बोलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मिर्ज़े के मैरिटल स्टेटस जैसी महत्वपूर्ण जानकारी से साहिबा कैसे वंचित रह गई होगी? हर कार्य भगवान का नाम लेकर करने वाला मिर्जा एकदम भगवान की मौजूदगी से इंकारी भी हो जाता हैः-
1. मिर्ज़ा पढ़े कुरान।बंद3।।
2. मिर्जे किलीयां गड्डियां पंजे पीर मना।बंद 36।।
3. ते मिर्ज़े ने गोशे विच्चो कड्डिया करडे नुके दा तीर।
कर बिसमिल्लाह मारिया, भौंदा वांग भंबीर। बंद 57।
इसके बाद पीलू मिर्ज़े की शख्सीयत में आये परिवर्तन को प्रस्तुत करने के लिए आस्तिक से मिर्जे की नास्तिक सोच बनाता पीलू मिर्जे के मुंह से निकलवाता हैः-
बक्की तो डरन फरिश्ते, मैथों डरे खुदा। बंद 39।।
कुछ लोगों के मन में यह वहम होता है कि यदि झूठ को सच साबत करना है तो उसको उठाये रखने के लिए कुछ यथार्थक स्तंभ खडे कर दो। ऐसे ही हमारे कहानीकार मन घड़त कहानियों को असलीयत मंे धटित साबित करने के लिए अनेकों प्रसंग उससे जोड़ने के आदी रहे हैं। किस्सा मिर्जा साहिबा में भी अनेकों इस प्रकार के हवाले आते हैं। मिसाल के तौर पर क्रमवार बंद एक और दो की पंक्तियांः-
घर खीवे खान दे साहिबा जम्मी मंगलवार।
(बंद पहला, किस्सा मिर्जा-साहिबा, पीलू)
घर वंझल दे मिर्ज़ा, जमिया करड़ेवार।
(बंद दूसरा, किस्सा मिर्ज़ा-साहिबा)
पीलू उनके जन्म दिन के बारे में ऐसे दावे से लिखता है, जैसे कि उसने मिर्ज़ा साहिबा की जन्म-पत्री देखी होती है। पीलू के अनुसार एक तरफ साहिबा पैदा होती है और दूसरी तरफ मिर्ज़ा और वह दोनों हमउम्र हैं और इकट्ठे जवान होने लगते हैं। लेकिन आगे जाकर तीसरे बंद में वर्णन आता है,
‘‘साहिबा पढ़े पटियां, मिर्ज़ा पढ़े कुरान।’’
अगर साहिबा अभी वर्णमाला ही पढ़ रही थी, तो उस समय के हिसाब से उसकी आयु कम से कम पांच छः साल होगी, मिर्जा कुरान पढ़ने लग पढ़ा है तो उसकी आयु तकरीबन पन्द्रह-सोलह साल होनी चाहिए। इस हिसाब से उनकी आयु में दस-बारह साल का अंतर बनता है। किस्से के आठवें बंद में इस बात का और सबूत भी मिलता है, जब करमू साहिबा को कहता हैः-
घर मिर्ज़े दे होर स्त्री, सुणिदी बुरी बला।
(बंद 8, किस्सा मिर्जा-साहिबा, पीलू)
पहले ज़माने में लोग लड़के के विवाह के मामले में तो ढील कर लिया करते थे, लेकिन लड़की की शादी करने के लिए आलसी कभी नहीं होते थे। मिर्ज़ा शादीशुदा होता है पर साहिबा कुंवारी होती है, जोकि उनके बीच के आयु में अंतर की पुष्टि करता है।
न मार काज़ी छमका, न दे तती न ताई।
पढ़ना साडा रह गया, ले आये इश्क लिखाई।
(बंद 4, किस्सा मिर्जा साहिबा, पीलू)
मिर्जा ऐसा सूरमा, खरलां दा सरदार।
(बंद 2, किस्सा मिर्जा-साहिबा, पीलू)
‘पंजाबी’ किस्सा काव्य और दुखांत परम्परा’ पुस्तक के पृष्ठ 121 पर विक्रम सिंह घूमण लिखते हैं, मिर्जा साहिबा का किस्सा इश्किय किस्सा है। ‘इश्क की प्रकृति’ में ही दुखांत का तत्व समाया हुआ है। इश्क शब्दकोश के अनुसार अर्थ हैः- मोहब्बत, उल्फत, चाहत, किसी चीज की ख्वाहिश करना या किसी चीज से हद से ज्यादा प्यार होना। हिकमत या तिब में यह एक किस्म का रोग है, जिसको ‘जनून’ या ‘पागलपन’ भी कहते हैं, जोकि किसी सुन्दर सूरत को देखकर पैदा होता है। अर्थात किसी हसीन सूरत को देखकर पागल हो जाने को ‘इश्क’ कहते हैं। इश्क शब्द को ‘इश्का’ में से निकला भी बताया जाता है। जो कि एक बुटी (पौधे) का नाम है, जिसको ‘लबलाब’ या अमरबेल भी कहते हैं। जब वह बेल किसी वृक्ष के साथ चिपकती या लिपटती है तो उस को सुखा देती है। यही हालत इश्क की है। यह जिस दिल पर छा जाता है, उसके मालिक को सुखा देती है और उसको पीला कर देता है।
पीलू के अनुसार साहिबां का इश्क मदरसे से बहुत छोटी आयु में ही शुरू हो जाता है। इतनी छोटी आयु में इश्क के जज़बे के बारे में पता ही क्या होता है। हां, वह महज़ अलहड उम्र का आकषर्ण (ज्ममदंहम ब्तनेी) जरूर हो सकता है।
मिर्ज़ा साहिबा के किस्से की कहानी इतनी बदकिस्मत है कि इसमें कलमकार से लेकर सारे पात्रों के साथ बेंइंसाफी होती है। पीलू का किस्सा अधूरा और लिखित रूप में संभाले न जाना, पीलू के साथ अन्याय करता है। मिर्ज़ा की कुर्बानी बेकार जाती है। वह साहिबा का साथ प्राप्त करने के लिए सब रिश्ते नाते तोड़ कर आता है और अपने मकसद में खास कामयाबी हासिल नहीं करता। इतनी मुश्कत करने के बाद भी साहिबा को दिल भरकर भोगने से पहले ही वह मर जाता है। यहां मिर्ज़े के साथ इंसाफ नहीं होता। साहिबा की हालत मिर्ज़े से उलझने के बाद धोबी के कुत्ते जैसी होती है। वह न घर की रहती है न घाट की। बक्की साहिबा की फरारी की शतरंज का महज़ मोहरा होती है और बड़े चाव से मिर्जे का सहयोग देती है। किन्तु बक्की, सहिबा से अपनी बेइज्जती करवा लेती है। मिर्ज़े को ताने देती साहिबा बक्की के विषय में अपशब्द प्रयोग करके उसको (बक्की को) ‘कावां खादी कंगरोड़ टैरकी कह कर उसकी बेइज्जती करके रख देती है। बक्की दस महीनों से दूध घी चासने वाले अपने शाहसवार से बिछड़ जाती है। जंड (वृक्ष) को दानी और देवता के रूप में देखा जाता है। मनोकामना पूरी करने और प्रतिफल देने वाला जंड मिर्जे की जान लेने का चश्मदीद गवाह बन जाता है। जंड मिर्ज़ा और साहिबा की मोहब्बत को प्राप्त करने के महत्व को असफल नहीं होने देता। यदि जंड साथ होता तो शायद मिर्ज़ा न रूकता और किस्से का कलइमैक्स (चरमोत्कर्ष) कुछ और ही होता। साहिबा के परिवार के सामाजिक रूतबे को भारी चोट लगती है। साहिबा की एक गलती से सिआलों की सब पीढ़ियों के ऊपर कलंक लग जाता है। मिर्ज़े के मां-बाप अपना बेटा गंवा बैठते हैं।
पीलू वे किस्से में की गई टिप्पणियों और अनेक स्थानों पर औरत विरोधी स्वर भी उभरते हैं, जो किस्से में किस्साकार (कहानीकार) के व्यक्तिगत तुजुर्बे और स्बंय-सहभागिता की निशानदेही करती है। मिसाल के तौर पर, 
भट् रन्ना दी दोस्ती, खुरी जिन्ना दी मत्त।10।।
आम तौर पर प्रेम कहानियों में नायक-नायिका एक दूसरे के प्यार में ज़माने से लड़ते हुए अपनी जान दे देते हैं। लेकिन मिर्ज़ा साहिबा सिर्फ एक ही ऐसा किस्सा है, जिसमेें प्रेमी की मौत का इल्जाम प्रेमिका के सिर जाता है। वैसे साहिबा उतने की हकदार नहीं जितने इल्जामों का भार उसके सिर पर रख दिया जाता है। धोखेबाज़ साहिबा नहीं, बल्कि धोखा तो मिर्ज़ा करता है। साहिबा को घर बसाने का सपना दिखाकर रास्ते में ही उसको शोर होने का आभास लग जाता है। कसूर मिर्ज़े का था। एक ट्रांसपोर्ट बुरा ले आया। दूसरा कोहड़ी लाल दुशाला तान कर सो जाता है। साहिबा तो जितना करने के लायक थी उसने किया। वह सिर्फ न मिर्ज़े के साथ भागती है बल्कि मिर्जे को उसने संदेश भी भेजा कि जब चंदड़ व्याह कर के ले गये तो बक्की की पूंछ पकड़कर चीखें मारेगा। अब वक्त है आजा। इस काम के लिए वह करमू को इनामों का लालच भी देती हैः-
तू सुण करमू ब्राहमणा, कदी न आइयों काम।
घोड़ी दिया तेरे चरण नू काठी सणे लगाम।
हाथ दिया दे दिया चूड़िया, सोना करदी दान
झोटी दिया दुध पीण नू, हल दी जिम्मी इनाम।
जब लग जीवे साहिबा, रखे तेरा एहसान।7।।
इश्क के मामले में जब जान को खतरा हो उस समय तो मुर्दे भी कब्रों में से उठकर भाग लेते हैं और मिजेऱ् को नींद चढ़ी हुई थी। वह लम्बे पांव तान कर सोता रहता है। साहिबा बल्कि उसको जगाती रही,
जंड दे हेठ जट्टा! सों रहियो, उठ, सुरत संभाल। बंद 43।। और
उठी मिरज़िया सुत्तिया, खब्बे आये असवार।
हथ्थी तेगां रंगलिया, करदे मारो मार।
मेरे बाबल वरगीया घोड़िया, वीर मेरे असवार। बंद46।।
पीलू ने अपने किस्से में मिर्ज़े की मौत के बाद साहिबा के साथ क्या हुआ नहीं लिखा। इसलिए यह किस्सा औरत-मर्द सम्बन्धों की अनेकों परते खोलता है, जिनको विचार करने के लिए मजबूरन हमें मानवीय मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखना पड़ता है। ऐसे यह औरत मर्द सम्बन्धों की नियमावली पर आधारित किस्सा बन जाता है, जिसका आधार सैक्स सम्बन्धों और उसके पश्चात निकलने वाले नतीजों पर नजर डलवाता है। यह पात्रों के शारीरिक, मानसिक और मानवीय सम्बन्धों को बिखेर कर हमारे सामने रख देता है।
हाफिज साहिबा से रावी में छलांग मरवा देता है,
‘‘यारो लगी आग बुझाउणी, साहिबा रावी मल्ली जान।40।।
कुछ लेखकों ने लिखा है कि साहिबा शमीर का खंजर छीनकर अपने आप को मार लेती है। कुछ ने लिखा है कि मिर्ज़े के साथ ही साहिबा को भी मार दिया गया था, आदि-इत्यादि।
खैर, एक बात तो पक्की है कि चंदड़ों और सियालों ने जब मिर्ज़े को मारा होगा, साहिबा को कैसे छोड़ा होगा?
पीलू द्वारा साहिबा की पैदायश का दिन मंगलवार बताया गया है और यदि इसको सच मानकर चले तो मंगलवार को पैदा होने वाले व्यक्तियों के लक्षणों के बारे में जिक्र करता हुआ रणधीर सिंह बेदी ‘भारतीय ज्योतिष’ पुस्तक के पृष्ठ नम्बर 9 और 10 पर लिखता है, ‘‘मंगलवार का मालिक ग्रह मंगल है। यह अग्नि ग्रह है। आग और गर्मी की प्रतिनिधता करता है। यह जल्लाद भी है और सेनापति भी है। मंगलवार को पैदा होने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध बनते बिगड़ते रहते है। छोटी-छोटी बातों पर इनको गुस्सा आने लगता है और अक्सर लड़ाई झगड़ों में फंसे रहते हैं। इनकी अपने मां-बाप और भाइयों से नहीं बनती। ऐसे लोग समाज के गलत लोगों को मिलने वाले होते हैं, अर्थात बुरी संगति में बैठने लगते हैं और कई बार समाज के बुरे असर को कबूल भी कर लेते हैं। वैसे बुरी संगत के साथ मेल रखने से यह अपने अंदर एक खुशी भी महसूस करते हैं। इनसे भलाई बुराई की आशा रखना व्यर्थ है। इनकी एक खूबी अवश्य है कि यह अपने मित्रों के लिए जान भी कुर्बान कर सकते हैं और उनके लिए बड़े से बड़ा खतरा भी मोल ले सकते हैं। लकिन अकड वाले स्वभाव के कारण डर बना रहता है कि पता नहीं किस समय अपने करीबी मित्र से भी बिगाड़ पैदा कर ले। कई बार मामूली सी बात पर मित्र के वैरी (विरोधी) बन जाते हैं। यदि कुंडली में अशुभ ग्रह आसार अंदाज हो रहे हों और लग्न के ऊपर भी शुभ असर न होते हों मृत्यु जल्दी या जवानी में हो जाती है।
झंग से साहिबा को लेकर फरार हुआ मिर्ज़ा जंड के नीचे सो जाता है। असल में यहीं से साहिबा के किरदार का उभार होता है। यह बहु-परती स्थिति उत्पन्न हो जाती है और बहु शाखी उलझनों का साहिबा को सामना करना पड़ता है। उस समय साहिबा के मानसिक सोच की नब्ज़ पकड़ने के लिए मैं साहिबा को तीन अलग-अलग रूपों में देखता हूँ। एक मासूम लड़की साहिबा, दूसरी प्रेमिका साहिबा और तीसरी विलासी औरत साहिबा। यही कारण है कि मुझे मिर्ज़े की मृत्यु के लिये साहिबा की जिम्मेदारी के तीन कारण दिखाई देते हैंः-
मासूम लड़कीः झंग के हाकिम खीवा खान की बेटी, जो बड़ी हवेली में रहती है। उसका बाप कचहरी लगाता है। भाई शमीर के इलाके में असर रसूख और दहशत है। बचपन में मिर्ज़े के साथ मंगनी होने के कारण उसके ख्यालों में मिर्ज़ा बसा हुआ है। खरलों से मंगनी तोड़कर उसका रिश्ता चंदड़ों से कर दिया जाता है। मुंह बोली बुआ बीबो के चुगली करने के कारण वह बहकावे में आ जाती है और मिर्ज़े के साथ घर से भाग जाती है। गर्मा-गर्मी में लिये गये फैसले के बारे में वह ठंडे दिमाग से सोचती है पर उसको आगे जाकर पीछे कोई सहायता मिलती नज़र नहीं आती। साहिबा अपने आप को गंभीर स्थिति के चक्रव्यूह जिसको अंगे्रजी में हम ब्ंजबी ैपजनंजपवद कहते हैं, में घिरा महसूस करती है। अजीब विडम्बना मिर्ज़े, साहिबा, साहिबा के मंगेतर, मिर्ज़े के मां-बाप और साहिबा के परिवार, पांचों के लिए होती है। किन्तु सब से अधिक दयनीय स्थिति और चिन्ताजनक हालत साहिबा की बनती है। मां-बाप का दरवाज़ा वह बंद करके आ चुकी होती है और ससुराल का उस के लिए अभी खुला नहीं होता। इस जटिल समस्या से जूझती हुई वह मिर्ज़े को जगाती है। भाई मरे या प्रेमी दोनों सूरतों में साहिबा शोक की भागीदार बनती है। संभव है कि साहिबा के अंदर भाईयों का मोह भी जागा होगा। लेकिन साहिबा यह भी जानती है कि एक ही माँ के कोख से जने हुए उसके भाई अब उसके दुश्मन और खून के प्यासे हैं। इस कश्मकश में वह मिर्ज़े के साथ घटी घटना का शिकार हो जाती है।
होणी मिर्ज़े ते कुद पई, रली सिआलां दे नाल।60।।
प्रेमिका: हसीन युवती की यह खासीयत होती है कि जब हर कोई उन पर आशिक हुआ हो तो उनका दिल किसी एक पर आकर अटकना होता है। यह हकीकत है कि जब सुन्दर लड़कियां गिरने पर आये तो मिग22 जहाज़ की तरह बुरी जगह पर जाकर ही गिरती है। यही हाल साहिबा का भी हुआ है। मिर्ज़े के इश्क में गिरफ्तार साहिबा अपने प्यार की प्राप्ति की ख्वाहिश दिल में लेकर मिर्ज़े के साथ आ जाती है। वूक्ष के नीचे मिर्ज़ा साहिबा के पास इकरार करता है कि उसने सिर्फ सियालों और चंदड़ों को धूल चटाने के लिए साहिबा को उठाया हैः-
अचछी करन अपने नाक नू, नहीं खरलां नू आऊ हार।13।
साहिबा आई न छड के, सिर न रहू साडी पत।18।
ब्याही हेवे छड देवा, मंग न छडी जा।
जेकर मंग मैं छड देवा, लगे खरला नू लाज।21।
यह सुनकर साहिबा को अपनी गलती का एहसास होता है और प्रेम का ज़ज़बा पलट कर नफरत में बदल जाता है। उसको मिर्ज़े ने हथियार बनाकर प्रयोग किया है और इसका इल्म होते ही साहिबा का मन मिर्ज़े के प्रति घृणा से भर जाता है। साहिबा सोती नहीं बल्कि जान-बूझकर जागती रहती है। गुस्से में उसके तीर तोड़ देती है और उसका तरकश वृक्ष पर टांग देती है। इस प्रकार अपने प्यार में हुई हार को वह मिर्ज़े से बदला लेकर जीत में तबदील कर देना सोचती है। साहिबा के दिल में आता है कि मैंने तो मरन ही है क्यों न तुझे (मिर्ज़ा) भी साथ लेकर मरूं।
विलासी औरत: हमारे शास्त्रों ने औरतों की पांच किस्में दर्शायी हैं, देवी, अप्सरा, पद्दमिनी, लक्ष्मी अैर कामिनी। इनमें से सब से खतरनाक किस्म की औरत को ‘कामिनी’ कहा जाता है। कामासूत्र में लिखा है, ऐसी किस्म की औरतें यौन सुख के लिए तडपती हैं। वह सुन्दर, चालाक, चालबाज, फरेबी और दिल की काली होती हैं।
अक्सर यह कामिनी किस्म मर्द की तबाही और मौत का कारण भी बनती है। इनके हत्थे अगर बन्दा चढ़ जाये तो एक बार तो यह बठिंडे वाला किला दिखा देती है। पुलिस वालों की तरह इनकी दोस्ती भी बुरी और दुश्मनी भी बुरी साबित होती है।
को शास्त्र के अनुसार, ‘‘ऐसी औरतें तेज़ाबी इश्क करती हैं। लावे के झर-झर बहते दरिया के जैसा इनका मन कब किधर मुड़ जाये, इसका कोई पता नहीं लगता।
पीलू साहिबा को सुन्दर और फैशनप्रस्त युवती के तौर पर प्रस्तुत करने के लिए लिखता है, ‘‘गज-गज लम्बी या मीड्डियां, रंग जो गोरा सी। बंद।‘‘7 और जब मिर्ज़ा साहिबा को बाँह से पकड़ता है तो उससे हाथ छुड़वाती हुई साहिबा कहती है,
न फड़ बाहीयां घुट के, वंगा जांदीया टूट
कल चीर चढाईयां, पहिन न देखियां रॅज।बंद 33।।
साहिबा एक शैकीन युवती है, जिसके हुस्न के लड़के ही नहीं, बुढ्ढे भ्ी आशिक है। यहां तक कि साहिबा का नौकर करमू ब्राहमण भी, जोकि उसके दादा की आयु का है। जब साहिबा मिर्ज़े को अपने साहे का संदेश देने के लिए करमू को भेजती है तो करमू भी साहिबा पर अपनी टराई मारने लग पड़ता है और साहिबा को कहता हैः-
अग्गों करमू’ बोलदा सच्ची दियां सुणा
चाली कोहां दा पैंडा है कौन जा।
घर मिजेऱ् दे होर स्त्री, सुणीदी बुरी बला।
शैंकण उत्ते शौंकण पए, लेवे अध वंडा।।
छड दे पुराणी जट दी दोस्ती, नवीं करमू वल ला।
घर विच्च ला ले दोस्ती, बह के इश्क कमा। बंद 81
करमू साहिबा के इश्क का राज़दार होता है और मिर्ज़े तक उसका संदेश भी लेकर जाता है। इसका मतलब साहिबा अपनी बाप की आयु के अपने नौकर के साथ काफी खुली हुई होगी। यह बात यह सिद्ध करती है कि साहिबा काफी विलासी रूचिये की रही होगी।
झंग से बाहर आकर मिर्ज़े को खतरा टल गया लगता है। वह साहिबा को निकालकर लाने की खुशी में मदहोश हुआ होता है। घोड़े पर जाते हुए दोनों के शरीरों पर रगड़ होती है और जिसके फलस्वरूप उत्तेजना पैदा हो जाती है। पागल हुआ मिर्ज़ा सुरक्षित जगह देखकर व्रक्ष के नीचे रूकता है। ओछेपन में जंड (व्रक्ष) के नीचे साहिबा और मिर्ज़े के जिस्मानी सम्बन्ध बनते हैं। मिर्ज़े के अंदर साहिबां का रूप निहारने की तीव्र इच्छा और बेशर्म पना होता है। चरमसीमा पर पहुँचे मिर्ज़े की हवस का पारा जिस रफ्तार से ऊपर चढ़ता है, उसी गति से नीचे भी आ जाता है। मिर्ज़े की आत्म संतुष्टि जल्दी ही हो जाती है। शीघ्र पत्न के ;च्तमउंजनतम म्रंबनसंजपवदद्ध पशचात साहिबा का साथ भोग विलास कर मिर्ज़ा अपनी प्यास बुझाकर सरूर में चूर होकर सुख की नींद सो जाता है। साहिबा की मिजेऱ् से ज्यादा संभावनाएं होती हैं। मिर्ज़ा साहिबा को संतुष्ट करने में असफल रहता है और अतृप्त साहिबां के मन के अंदर बना मिजेऱ् की मर्दानगी का बिम्ब टूट कर ढेरी-ढेरी हो जाता है। तीर चलाना और विद्या है और स्त्री को सेज सुख प्रदान करना एक अन्य कला है। युद्ध विद्या में कुश्लता और कार्य कुशलता तरो-ताजा स्त्री-पुरूष के जिस्मानी सम्बन्धों की सफलता की कुंजी नहीं है।
सहवास के समय पर यदि पुरूष, स्त्री को तृप्त कर दे तो वह ओर भी अजीज (प्यारा) हो जाता है और यदि औरत को तृप्त न कर सके तो औरत को उस मर्द से नफरत हो जाती है। मर्द उसके दिल से उतर जाता है। कामवासना की आग में जलती हुई साहिबा तरकश वृक्ष पर टंाग देती है और गुस्से में तीर कमान को तोड़ती है। मिर्ज़े के ये हथियार उसको अपनी सौतन प्रतीत होते हैं। वह मिजेऱ् को अपनी भूख मिटाने के मक्सद से उठाती है। परंतु मिर्ज़ा लाल दोशाला लिये मरे कुत्ते की तरह हारा (थका) हुआ पड़ा रहता है,
मुठ्ठिया भर जगाउंदी यार नू, जागीये रब दे नाम।
धुर न अपड़ी रन साहिबा, मेरी विचालियो टूटी ला।
जे न सी तोड़ निभाऊणी, तेरी काहनु पकड़ी बाह।
बचाअ करेदे आशिका न आगे मिलणा तैनू थां।47।।
साहिबा मिजेऱ् की नपुंस्कता के विषय में सोचती है कि कहाँ मरा सांप गले डाल लिया है, इससे पीछा छुडाऊँ।
सियालों और चंदड़ों के साथ हुई लडाई में मिर्ज़ा मारा जाता है। इसके पश्चात यकीनन साहिबा की भी दुर्गति हुई होगी, क्योंकि उसके रोशन मुस्तक बिल की तो कोई संभावना ही न रहती। कहानी को इस पहलू से देखें तो मिर्ज़ा नामर्द और साहिबा बच्चलन (बेशर्म) सिद्ध होती है। वैसे सीधी तो किसी नज़रीये से भी नहीं दिखाई देती।
मिजेऱ् का सोना और साहिबा का जागना इस किस्से का सब से महत्वपूर्ण पहलू है। साहिबा की मिर्जे के साथ मंगनी हुई होती है और उसकी मंगनी तोड़ कर चंधड़ों के साथ रिश्ता कर दिया जाता है। इस बात की मिर्ज़े को शर्मिंदगी महसूस होती है। मिरज़ा अपने अहंकार को कायम रखने और अहम को पाने के लिए साहिबा को घर से भगाने का फैसला लेता है। साहिबा को उठाने के पीछे केवल यही उसका मकसद होता है। इस महत्व की पूर्ति के लिए वह साहिबा को दानाबाद ले जाने की बजाये वृक्ष के नीचे ठहराता है। मिर्ज़े की प्राथमिता साहिबा को भोगने की होती है। साहिबा यदि उस की नहीं बनती तो वह किसी ओर की होने देना नहीं चाहता। उसके मन में होता है कि एक बार साहिबा को चरित्रहीन कर दे, फिर जैसा होगा देखा जायेगा। मिर्ज़े के भीतर जहां हवस होती है, वहां साहिबा के भीतर अन्नत प्रेम का संक्लप होता है। साहिबा के लिए जड़ के नीचे मिजेऱ् के साथ बने सम्बन्ध आरोग्य नहीं होते, इसलिए उसको नींद नहीं आती। पर वही क्रीड़ा मिजेऱ् के लिए सेहतमंद होती है और वह सो जाता है। सैक्स एक प्रकार की मानसिक और शारीरिक कसरत है, जो मनुष्य को तन-मन से थका देती है और जिस के पश्चात् शरीर नवीन उर्जा पैदा करने के लिए मनुष्य को नींद ला देता है। डा. देव जिंक कैको अपनी पुस्तक डमदए स्वअम ंदक ैमग ज्ीम ब्वउचसमजम नेमत ळनत वित ॅवउमद के पृष्ठ 83 पर लिखता है जिसका पंजाबी अनुवाद इस प्रकार होगा च्वेपजपवद म्उपेेपवद ज्वउवहतंचील ;च्म्ज्द्ध द्वारा यह साबित हो चुका है कि निरोग सैक्स मांसपेशियां को ढीली करने के पश्चात् मनुष्य को फिक्र से निजात दिलाकर सुख की नींद सुलाने में सहायक सिद्ध होता है। संभोग शिखर के पड़ाव पर पहुँचकर शुक्राणुओं साथ मानवीय शरीर में से हमारा ज़हन (दिमाग) अनेकों प्रकार के रसायण द्रव्यों और सैलों का निष्कासन भी करता है, जैसे कि छमतमचपदमचीतपदमए ेमतवजवदपदए वगलजवबपदए तंेवचतमेेपदए दपजतपबए वगपकम ;छव्द्ध ंदक जीम ीवतउवदम चतवसंबजपद इनमें से प्रोलैक्टिन का सीधा सम्बन्ध कामुक सन्तुष्टि से होता है।’’?
ज्ीमद जीमतम पे जीम इपवबीमउपेजतल व िजीम वतहंेउ पजेमसण् ित्मेमंतबी ेीवूे जींज कनतपदह मरंबनसंजपवदए उमद तमसमंेम ं बवबाजंपस व िइतंपद बीमउपबंसेए पदबसनकपदह उवतमचपदमचीतपदमए ेमतवजवदपदए वगलजवबपदए अंेवचतमेेपदए दपजतपब वगपकम ;छव्द्धए ंदक जीम वितउवदम चतवसंबजपदण् ज्ीम तमसमंेम व िचतवसंबजपद पे सपदामक जव जीम मिमसपदह व िेमगनंस ेंजपेंिबजपवदए ंदक पज ंसेव उमकपंजमे जीम तमबवअमतल जपउमष् जींज उमद ंतम ूमसस ंूंतम व िजीम जपउम ं हील उनेज ूंपज इमवितम हपअपह पज ंदवजीमत हवष् ेजनकपमे ींअम ंसेव ेीवूद जींज उमद कमपिबपमदज पद चतवसंबजपद ींअम ंिेजमत तमबवअमतल जपउमेण् ;डमदए स्वअम ंदक ैमगय ज्ीम ब्वउचसमजम न्ेमत ळनपकम वित ॅवउंद इल क्तव क्ंअर्म पदब्रमदावद्ध
इससे यह सिद्ध होता है कि मिर्ज़े को नींद आ जाना एक कुदरती बात है। किसी का ढंग से मूल्यांकन न किये होने के कारण लेखकों द्वारा प्रचारित बात कि साहिबा को भाईयों का मोह आ गया था निराधार है और बहुत वास्तविक नहीं। यदि साहिबा के दिल में भाईयों या मां-बाप का इतना ही स्नेह होता तो उसने घर से ही नहीं था भागना। दूसरी बात यह है कि यदि यह घटना साहिबा के घर से भागने के बाद कुछ देर का फांसला पड़ कर घटती तो साहिबा का हृदय परिवर्तन संभव था और यह दलील मानी भी जा सकती थी। परंतु एक पल में वह घर से भागती है और दूसरे पल झटके से उसके विचार कैसे बदल सकते है? एक पल मिरज़े के साथ निकलने के बाद अगले पल साहिबा की सोच का पलड़ा भाईयों की ओर पलटता यथार्थक नहीं लगता। किसी भी इन्सान के दिमाग में कितनी भी उथल पुथल क्यों न हो रही हो, उसकी सोच में इतनी जल्दी तबदीली नहीं आती। विचार बदलने को समय लगता है। उस समय साहिबा के लिए उसके भाई सब से बड़े जानी दुश्मन होते हैं और जान का सब से अधिक खतरा उनसे होता है।
बचपन से तस्वीरें देखता आया हूं। मिर्ज़ा साहिबा के पैरों का तकीया लिये जड़ के नीचे पड़ा है और पास में बक्की खड़ी है। इस लिए जब भी मिजेऱ् के बारे सोचता हूं तो अपने आप आँखों के सामने जड़ वाला दृश्य आ जाता है। जड़ के नीचे घटित हुए के अद्भुत नज़ारे का चित्र पीलू ऐसे करता हैः-
चंघड़ सियाल चढ़ पए, राही घत्त वहीर।
फौजा घेरा घत्तिया करके बड़ी तदबीर।
कड़ कड़ चलण गोलीयां, मिर्जे नू पैंदे तीर।
ओह सुत्ता नहीं जागदा, कायम नहीं हुंदा शरीर। बंद 55
महाभारत के युद्ध में करण और उसके नौ पुत्रों में से आठ पुत्रों को कृष्ण और पांडव छल-कपट से मारते हैं। करण के कुंडल और कवच उससे अलग कर दिये जाते हैं। इसी चीज को पीलू दोहराता हुआ साहिबा से तर्कश वृक्ष पर तंगवाता लटकवाता है और तीर तुड़वाता है और मिजेऱ् को चंधड़ों और सियालों की अनगिनत सेना से मरवाता है।
होणी मिजेऱ् ते कुद पई, रली सियाला दे संग।
छुट्टी कानी गजब दी ले गई मिजेऱ् नू नाल।
रूह मिजेऱ् दी नकल गई, लग्गी जंडूरे नाल।
मंदा कीता साहिबा तू रल गई सियालां दे नाल।60।।
इस प्रकार मिर्ज़ा अपनी मृत्यु के पीछे साहिबा का हाथ बताता है। पीलू मिजेऱ् की मौत का कारण उसका अहंकार बताता है, ‘‘मिर्ज़ा मारिया मलकुल मौत दा, कुछ मारिया ओहनु गुमान।64।। मिर्ज़ा साहिबा की मौत का भांडा ‘होनी’ के ऊपर फोड़ता है, ‘‘होणी वरती पैगम्बरां, होणी मिर्ज़े ते गई आ।62।।’’ परन्तु मैं मिर्ज़े की मौत के लिए उसकी मूर्खता और आलसीपन को मानता हूं। बिना दिमाग से सोचे और किसी योजना के बिना वह जल्दबाजी में भागा जिस का नुकसान उस को भुगतना पड़ा।
हमारे इतिहासकारों ने मिजेऱ् को शूरवीर का खिताब देकर उसकी मौत को शहीदी का रूतबा दे रखा है। मिर्ज़ा से सूरमा (शूरवीर), खरला दा सरदार।2। किस्से में नायक नायिका को चोरी से घर से भगा कर ले जाता है और नायिका के मंगेतर और भाईयों के हाथों मारा जाता है। मिर्ज़ा उनकी इज्जत के साथ खेला और उन्होंने उसका बदला लिया और मिर्ज़े को रात की रोटी घर जाकर नहीं खाने दी। मिर्ज़े की मौत शहीदी नहीं बल्कि भ्ववत ज्ञपससपदह (इज्जत के लिए किया गया कत्ल) था। सदियों से इस बात को ताबीज़ की तरह पहने हुए घूमते पंजाबी संस्कृति के मुद्दई मिजेऱ् को शूरवीर क्यों समझ कर बैठे हैं? बहादुर और योद्धा तो चंधड़ और साहिबा के भाई थे। जो अपनी इज्जत और खुद्दारी के लिए जंग लड़ते हैं। मिर्ज़ा कहीं से भी सूरमों (शूरवीरों) की प्रतिनिधता करता नहीं मिलता।
किसी की लड़की को भगा कर ले जाना बहादुरी नहीं बल्कि कलंक और चरित्रहीनता है। यही वजह है कि कोई भी मिरज़े का साथ नहीं देता। बहादुरी के प्रतीक किस्से तो जिउणा मोड़, जग्गा डाकू, जैमल फत्ता, सच्चा सूरमा हैं, जिनके नायक इज्जत आबरू की रक्षा के लिए लड़े और हक सच की रक्षा के लिए लड़े। इस कार्य के लिए यह पात्र पूरे किस्से में संघर्षशील रहते हैं। न कि मिजेऱ् की तरह अचानक हरकत में आते हैं। पंजाबी समाज मिजेऱ् के द्वारा उठाए कदम को हरगिज़ नैतिक कदम नहीं मानता। जिन लोगों की नज़र में मिर्ज़ा बहादुर है तो उनको मेरा सवाल है कि अगर कोई आपकी इज्जत के साथ वैसे खेले जैसे मिर्जा ने किया तो क्या आप उस व्यक्ति को बहादुरी का इनाम दोगे?
मैं हमेशा इस बात पर जोर देता हूं कि हर कलमकार तब लिखता है जब उसको समाज में कुछ गलत घटित हुए दिखाई देता है।
साहिबा नो मिलिया खारे लाहने गल पटकार।
वत्त तेगां तीरां हथियारा दाज दिता परिवार।
(बंद 2, किस्सा मिर्ज़ा साहिबा, हाफिज बर्खुदार)
पीलू ने यह किस्सा भी इसलिए लिखा कि जो उसके किस्से के नायक और नायिका ने किया, वैसा करके कोई अन्य मृत्यु को प्राप्त न हो। परंतु लोग साहित्य से कुछ समझते और सीखते नहीं हैं। आज भी अनेकों भ्वदवत ज्ञपससपदहे होती हैं। शहजादी डायना और डोडी अलफायद भी इस लिहाज़ से मिर्ज़ा-साहिबा का मार्डन रूप सिद्ध होते हैं।
रावण राम की पत्नी सीता का हरण करके ले जाता है। राम चंद्र रावण और उसके परिवार का ही नाश नहीं करता, बल्कि उसकी सोने की लंका को भी तबाह करके अपनी वीरता का सबूत देता है। चाहे उसके इस काम के लिए कपट या अन्यों का सहारा भी लिया। लेकिन उसमे अपनी मर्दानगी का सबूत भी दिया। रावण से सीता प्राप्त करके वह मर्दों वाला घमण्ड (अकड़) भी निभाता है और सीता को अग्नि परीक्षा देने के बावजूद भी अस्वीकार कर देता है। उधर मिर्ज़ा साहिबा को बिना लड़े चोरी से भगा कर ले आता है। बताओ वह बहादुर कैसे हुआ? बहादुर और योद्धा होता तो युद्ध करके साहिबा को उठाकर ले जाता। न कि चोरी भगा कर मिर्ज़ा बहादुरी और मर्दानगी नहीं बल्कि कायरता, नपुंसकता और नार्मदी का प्रतीक है।
तीसरा अहम पहलू यह है कि साहिबा जानती थी है कि मौत का डर मिजेऱ् को है, न कि सिआलों या चंधड़ों को क्योंकि वह बार-बार मिजेऱ् को चेतावनी देकर आगाह करती हैः-
1. घोड़े खीवे खान दे बड़े मुरातब्खोर।
भज्जिया नू जान न देणगे, उधल गईया दे चोर।
विच्च उजाड़ दे मार के, तेरी सुटण धौण मरोड़।
2. घर बगाने मार के, सो रहा विच्च मैदान।
तेरे सिर सागां वगदीयां, जियू लोहे पड़े धमान।
चंधड़ ढके जन बन के मारे तैनू बाझ न जान।53।
3. वेख जंडूरे दी छतरी, सिर पर बोले का।
टांगु वज्जे मलकुल मौत दे, किते नहीं देदे जाण।
चंधड़ सिआल मारनगे, बड़े सूरमे जवान।
उठी वे मिरजिया सुत्तिया, क्यों पिया बड़े गुमान
घोड़ी आउंदी वीर शमीर दी, आउंदी ही बड़े तान।
सुत्ता ऐ तू उठ खड़, जे रब रखे सिदक इमान।56।
4. अग्गो साहिबा बोलदी, मन मिरज़िया! मेरी सलाह
छेड बक्की न तू राह खरला दे ले चल दानाबाद।
सियाल दीया घोड़िया आदम खाणीयां नित्त रोक लेंदिया राह।
जे तू मिर्ज़ा सूरमा। मेरी साहिबा दी ओड़ निभाह।58।
घर से चलते समय मिर्ज़ा भी अपनी जान के खतरे को भलीभांति जानता है, जब वह अपनी मां को कहता है, ‘‘जिउंदा रिहा ता आमिला मत छोड़िओ। आस।23।।’’ और ‘‘आपणी मौत मैं मरां मेरे नाल तुहानु की।17।।
किस्से का केंद्रीय पात्र मिर्ज़ा होने के कारण पीलू ने अपनी रचना में मिजेऱ् की शख्सीयत को ऊंचा उठाने पर बल दिया है, परंतु साहिबा के भाई शमीर के जंगजू, योद्धा और रोहबदार (रूआबदार) व्यक्ति होने के संकेत भी किस्से में दर्ज हैं। लोग शमीर का भय मानते हैं। वह घोड़े और पाखर अर्थात लोहे का जालीदार सुरक्षा कवच डालकर रखता है, यानि कि लड़ने के लिए सदा तैयार-बर-तैयार रहता हैः-
1. ते खबर हो जाये वीर शमीर नू तैनू करि मार।9।
2. खबर होवे खान शमीर नू लहू पीवेगा रज।
ले चल दानाबाद नू, जे सिर हैगी पग।
तैनू मार मकाऊणगे तू रख खरला दी लज।34।।
घोड़ी आउंदी वीर शमीर दी, आउंदी ही बड़े तान।56।।
दरअसल किस्से में भी मिजेऱ् का अक्स सूरमे शूरवीर वाला नहीं प्रकट होता, बल्कि साहिबा मिन्नतें करती हैं परंतु मिर्ज़े को दिये गये जवाबों में से उसका फुकरे बंदे वाला प्रतिबिम्ब बनता है। उदाहरण के तौर पर नीचे लिखे शेखचीली की तरह मिजेऱ् की बातें देखोः-
1. मेरे ऊपर नं कोई दीहदा सूरमा, जिहड़ा मेरे पुर वार करे।
मार कोहा तेरे जिन्ने ने पास, तेरे वीर खड़े।
झूठ क झूटा जंट हेठ लैण दे, मुड़ जिहड़ी रब करे।
आज दी घड़ी सो लैण दे, दूजी घड़ी बड़ा दानाबाद।44।।
सिर सियाला दे वड के, देवा जंड चड़ा।50।।
2. मिर्ज़ा आंखे कोई न दीहदा सूरमा, जिहड़ा मैनू हथ करे।
कटक भिड़ा दिया टक्करी, मैथों भी राठ डरे।
वल वल वड देऊं सूरमे, जिओं खेती नू पैण गड़े।
सिर सियाला दे वड के, सुटांगा विच रड़े।52।।
पंजाबी लड़कों की टोली में जब कोई किसी आशिक मिज़ाज को पूछ ले, ‘‘कैसे हो रांझे? तो आगे से वह हंस कर जवाब देता है, ‘‘रांझा तो वैसे ही पागल था भैंसे ही चराता रहा। रांझा नहीं, मैं तो मिर्ज़ा हूँ मिर्ज़ा।’
मेरा यह लेख दिमाग में पड़ गया तो सोच कर अपने आप ही फैसला कर लेना भाई किस-किसने मिर्ज़ा बनना है? मिर्ज़े के पास तो साहिबा एक रात न टिकी। मिर्ज़ा वैसा शूरवीर नहीं था जैसा तुम समझे बैठे हो, मिरज़ा ऐसा सूरमा शूरवीर था जिसका मैंने ऊपर विश्लेषण किया है।
पीलू ने किस्से में मिर्ज़ा, साहिबा, मिर्ज़े का बाप वंझल, बहन सहिती, साहिबा का बाप खीवा खान, भाई शमीर, साहिबा का नौकर करमू ब्राहमण, जाम लुहार, मिर्ज़े की धर्म-मासी बीबो, खीवे खान का कर्मचारी, फरोज़ डोगर (डोगर, राजपूत) से मुसलमान बने लोगों की एक जाति है, जो ज्यादातर गुजरों की तरह पशु पालन का काम करते हैं और वंझल का नौकर अथवा मिजेऱ् का दोस्त भाई डोगर (जो बक्की को पालता है) के नाम दिये हैं। इसके बिना उसने कोई ओर नाम नहीं दिया। मिजेऱ् की मां और साहिबा के मंगेतर का जिक्र आता है और शमीर के बिना साहिबा के और भाई होने का संकेत जरूर आता है, लेकिन उनके नाम किस्से में दर्ज नहीं हैं। साहिबा के भाईयों के नाम, मंगेतर का नाम ताहिर खान आदि बाकी पात्र और उनके नाम के पीछे दूसरे लेखकों के दिमाग की उपज है। लगभग सारी प्रेम कथाओं के साथ कोई न कोई जीव पात्र जुड़ा होता है, चाहे वह कोई जानवर, वस्तु या स्थान हो जब हम तपती जगहों या ऊंट को याद करते है तो हमें सस्सी की याद आ जाती है घड़े को याद करते हुये सोहणी। बेले या बांसुरी की बात छिड़े तो रांझे की तस्वीर अपने आप ज़हन में उभर आती है। ऐसे ही जब जंड और घोड़ी का ख्याल आता है तो हमारे मन मस्तिषक में मिजेऱ् के किस्से की पुस्तक खुल जाती है। वैसे तो बहुत सारे घोड़े और घुड़सवार मशहूर हुए हैं, जैसे झांसी की रानी का घोड़ा पवन जो लक्ष्मी बाई और उसके लड़के सहित झोसी के किले से कूद पड़ा था। परंतु कुल दुनिया के इतिहास में इतिहासिक और मिथिहासिक सात महापुरूष ऐसे हुए हैं, जो अपनी तकदीर खुद लिखते थे और उनके जीवन संघर्ष के उनके घोड़ों का भी बराबर का योगदान रहा है। उनकी सूची इस प्रकार हैः-
1. हज़रत मुहम्मद और उसकी घोड़ी दलदल
2. गुरू हरगोबिन्द और घोड़ा दान (जो विधीचंद छुड़वाकर लाया था)
3. गुरू गोबिन्द सिंह और नीला घोड़ा
4. राणा प्रताप और चेतक घोड़ा
5. महाराजा रणजीत सिंह और लैला घोड़ा
6. गुगा चैहान और जावदिया
7. मिरज़ा खान और बक्की
किस्से की कहनी को मुख्य रखते हुए यह पीलू की जरूरत थी कि वह मिरज़े की घोड़ी स्वबाीमंक ैत्.71 श्ठसंबाइपतकश् जहाज की तरह गतिमान और आम घोड़ों से उत्तम दिखाये। इस बात के लिए उसने मिथिहास और इतिहास का सहारा लिया और सर्वश्रेष्ठ घोड़ी के लिए बक्की की स्टार कास्टिंग कर दी।
हिन्दु मिथिहास में देवतों और राक्षकों की ओर से खीर समुद्र को मंथने की घटना आती है। खीर समुद्र में से चैदह अद्भुत पदार्थ निकले। जिस में से श्रवा घोड़ा भी एक था। समय पाकर वह श्रवा घोड़ा स्वर्गलोक को चला जाता है। महाभारत के युद्ध के समय कुंती पुत्र करण की सवारी के लिए वही घोड़ा आसमान से उतर कर आता है। पीलू ने हिन्दु मिथिहास की यह बात उठाकर अपने किस्से में अंकित करते हुए लिखता है कि बक्की और उसके छः भाई बहन आसमान से उतरे। पीलू ने अपनी गल्प रचना पर वास्तविकता की मोहर लगाने के लिए कुछ ऐतिहासिक पात्र उठा लिएः
अर्शो उतरे छः जणे, छीवे भैण भरा।
‘दुल दुल’ लई शाह अली ने, पाई काबे दी राह।
इक लिया गुगे चैहान ने, बागड़ां दितीया डाह।
नीला लिया राजे रसलू ने, राणियां लई छुडा
गराड़ा जैमल फत्ते संदल बार, बेटी न दित्ती विआह।
लख्खी ले लई दुल्ले जवान ने, मारी अकबर दी शह।
‘कक्की’ घर सुलतान दे, चारे कूंटा लईया निवा।
सबनातो छोटी है बक्की, चल के आई मिर्ज़े के पास।49।।
पीलू के अनुसार ‘दुलदुल’ को शाह अली ले गया। दुलदुल खच्चर मिसर के बादशाह ने हज़रत मुहम्मद को दे दी थी, जिस के ऊपर वह सवा हुआ करते थे। बाद में उन्होंने यह अपने चचेरे भाई के जमाई हज़रत शाह अली को दे दी थी, जो मुसलमानों के चैथे खलीफे थे।
रंग बिरंगा गुगा चैहान ने ले लिया। गुगा चैहान बीकानेर रियासत के गांव ऊडेरे में ग्यारहवीं शताब्दी में पैदा हुआ योद्धा था, जिसने राजपूतों का नायक (अगवाई करके) बनकर महमूद गज़नवी के साथ लड़ाई की थी। वाछल नाम की राजपूत कन्या को गोरखनाथ ने संतान की गुग्गल दी थी, जिसके कारण गुगे का जन्म होता है। बाद में इसने इस्लाम धर्म अपनाया और धार्मिक ख्यालों वाला व्यक्ति बन गया। इसमें सांप का ज़हर मारने की विशेष शक्ति थी। लोग इसको शेषनाग का अवतार मानते हैं और पूजते हैं। गुगे पीर की ओर से प्रसिद्ध होने के बाद इसके नाम पर हर साल भादों के महीने लुधियाना ज़िले में छपार का मेला लगता है। जो मालवे के मकबूल मेलों में से एक है, क्योंकि इस मेले पर सालों से लुचीआं (अश्लील गीत) बोली पाने की रीत है। गुगे की कब्र तैहर नगर में है।
नीला, राजे रसालू के हिस्से आया। सियालकोट के राजा सलवान और राणी लूणा का बेटा राजा रसालू राजा सिर्कप की बेटी कोकला के साथ विवाह हुआ था। कोकला व्यभिचारन था। राजा रसालू कोकला के प्रेमी राजा होडी को मार देता है और कोकला महल से छलांग लगा मार के मर जाती है।
गराड़ा, जैमल-फत्ता संभाल लेते हैं। जैमल सिंह और फतह सिंह 1567-68 में अकबर को बेटी की डोली (रिश्ता) देने की गुजारिश करते हुए राणा उदय सिंह की रहनुमाई में चितौड़ से लड़ने वाले राजपूत थे। इनके पास यह बहुरंगी घोड़ा था।
लक्खी घोड़ी दुल्ला संभालता है। दुल्ला भट्टी लाहौर से 12 किलोमीटर दूर गांव का रहने वाला था और अकबर के साथ उसने लोहा लिया। वह अमीरों को लूट कर गरीबों को दान करता था। उसको पंजाबी का रौबिन हुड कहा जाये तो कोई अतिकथनी (अतिश्योक्ति) नहीं होगी।
कक्की को सुलतान अपने घर ले जाता है। सुल्तान का असल नाम सैयद अहमद सुल्तान था। इसको सखी सर्वर और रोहियां वाला पीर भी कहा जाता है। वह हठी और घोर तपस्या करने वाला था। कहते हैं उसके मुंह से निकली हर बात पूरी होती थी। और सब से छोटी बक्की मिर्ज़े की ओर आ जाती है। वर्णनयोग्य है कि बक्की घोड़ी की नस्ल थी, न कि नाम ‘बक्क’ (रंगहीन भाव सफैद) राक्षस भगवान् कृष्ण को मारने के लिए घोड़ा बन कर आता है, पर कामयाब नहीं होता। इससे पहले कि कृष्ण उसको पकड़ सकता। वह अपनी तेज़ रफ्तार के कारण दौड़ जाता है। फिर वह बगुला बनकर आता है और बलराम के हाथों मारा जाता है। उसी बक्क राक्षस से तेज रफ्तार घोड़ों की नस्ल चली जो सिर्फ बक्क यानि सफैद रंग की ही होती है। महाभारत में युद्ध में सारथी बने कृष्ण के अर्जुन के हाथ से सारे बक्की घोड़े जोड़े थे। बाबर अपने पुत्र हुमायुं को पहली जंग जीतने पर इनाम के तौर पर बक्की घोड़ा देता था जो सफेद था। शायद पीलू को इस बात का ज्ञान नहीं था। पीलू बक्की का रंग काला बताता है। नीला, कुल्ला और लक्खी आदि घोड़ों की नस्ले हैं। गज़ब की बात तो यह है कि अलग-अलग नस्लों के घोड़े-घोड़ियों को पीलू बहन भाई बना देता है। हज़रत मुहम्मद और जैमल सिंह और फतह सिंह के पैदा होने में सालों नहीं, सदियों का अंतर है। घोड़ियों की इतनी ज्यादा लम्बी आयु नहीं होती। पांच सालों में घोड़ा यौवन पर होता है और औसत घोड़े की आयु 25-30 साल की होती है। घोड़े के संदर्भ में सही जानकारी की कमी के कारण हमारे चित्रकार गुरू गोबिन्द सिंह का घोड़ा के उपर नीला रंग चिपका देते हैं। गुरू गोबिन्द सिंह का घो़ा नीला नस्ल का था न कि रंग का। नीले रंग का कोई घोड़ा नहीं होता। नीले घोड़े की नस्ल का नामकरण नील देवता से हुआ था। कसूर चित्रकारों का भी नहीं, बेअकल सिक्ख बुद्धिजीवी लोगों को नीला घोड़ा लिख बुद्धु बनाए जा रहे हैं। साखिआं की एक ऐसी किताब भी मैंने पढ़ी है जिस का लेखक गुरू गोबिन्द सिंह जी के घोड़े के पंख भी लगाये जाते हैं। यदि एक व्यक्ति बुद्धु हो तो एक मोहल्ला समझा ले, यदि मूरा मोहल्ला ही बुद्धु हो तो कौन किसे समझाये? गुरू गोबिन्द सिंह ने सारी उम्र संघर्ष करते हुए और जूझते हुए उत्तम पुरूष की परिभाषा बताने पर लगा दी, यह श्रद्धावान लोग उनको करामाती बनाकर पेश करने लगे हैं।
अंगे्रजी का साहित्यकार जब बुढ्ढा हो जाता है तो आत्म कथा लिखकर लिखने से सन्यास ले लेता है क्योंकि बढ़िया लिखने के लिए उसके पास मसाला खत्म हो जाता है। बाकी तमाम उम्र वह आलोचक बन कर नये लेखकों को लिखने के ढंग सिखाते रहते हैं। पंजाबी का लेखक पिछली उम्र में जाकर आत्म-निरीक्षण करता हुआ सोचने लग जाता है कि उसकी काबलीयत और मेहनत का सही मूल्य नहीं पड़ा और वह इस ख्याल को लेकर पागल हो जाता है। आस-पड़ौस या किसी जानकर रिटायर्ड फौजी को पैसे देकर वह फौजी कंटीन से सस्ती और खालिस रंग मंगवा फिर रोज शाम को उसमें से एक चम्मच पीकर बोतल को महीना या कम से कम हफ्ते में पीता हुआ धार्मिक साहित्य लिखने में व्यस्त रहने लगता है। अब ऐसी अवस्था में वह अंधी के श्रद्धा के चलते ऐसे ही रंग लगाता है।
पंजाबी के तकरीबन सारे पाठक, लेखक और विद्वान मिरजे की घोड़ी का नाम बक्की समझे जाते हैं। इसके लिए हाफिज़ बर्खुदार कसूरवार है। वह मिर्ज़े की घोड़ी नीला नस्ल की लिखे जा रहा है। जिस कारण लोग घोड़ी का नाम बक्की मान बैठे हैं।
दूसरा कारण बक्की को आसमान से उतारने का कारण है कि पांडव के साथ विवाह होने से पहले सूर्य के सुमेल से कुंवारी कुंती को जन्मे केशापुर नरेश कर्ण के नौ पुत्रों मंे से महाभारत के युद्ध में से अकेला जीवित बचने वाला करण बेटा का वरिषाकेधु अपने पिता का राज्यक्षेत्र अंगा (मौजूदा भागलपुर और भूगर, बिहार, यू.पी) छोड़कर पंचाल (पंजाब) के इलाके में चिनाब और रावी के बीच शाढिलय ऋषि की आबाद की संडे की बार, जिसको दुल्ले भट्टी के समय उसके दादा सांदल के नाम के कारण संदल बार (फैसलाबाद, झंग और टोबा टेक सिंह, पाकिस्तान का इलाका) कहा जाने लंग पड़ा, आ बसता है। बार जंगल वाले आबादी के इलाके को कहा जाता है। हिमालय के क्षेत्रीय करन (हरियाणा के जिने करनाल का नामकरण भी इसी कारण से हुआ है) का पोता खर्ल उच्च शरीफ में रहते मोहकमद्दीन जलाल-उद्द-द्दीन जहानियां के प्रभाव के अधीन इस्लाम कबूल कर लेता है। खर्ल से खर्ल गौत्र चलता है और खल के बारह पुत्र थे। अग्निवंश पनवर राजपूत और जट सिक्ख परमार भी खरल की औलाद हैं। अर्जुन के साथ टक्कर लेने वाला करण, उसका पुत्र वरिशाकेधु और पोता खरल बढ़िया तीर अंदाज थे, इस लिये मिजेऱ् को भी करण की औलाद सिद्ध करके पीलू तीर अंदाजी का बढ़िया योद्धा बना देता है और पूर्वज कर्ण की तरह उसके लिए घोड़ी आसमान से उतारता है।
मिर्ज़े के किस्से को पढ़ा और विचार न किया होने के कारण पंजाबियों के मन में बक्की की ऐसी छवि बनी हुई है कि बड़े कद की, निरोग और तेज़ भागने वाली हृष्ट-पुष्ट घोड़ी होगी। पीलू भी इस बात को हवा देता है, जब वह मिर्ज़े के मुंह से कहलवाता हैः-
सुम बक्की दे खडकदे, जिुयों लोहे पैण धिगाण।
दुम बक्की दी इंज फिरे, जियूं चैरी करे गुलाम। बंद 28।
कान लम्बे खुर पतले, दुम बक्की दी सिआल।
देख के मेरी टैर नू, झोरि चित्त न पा।।
बाई डोगर जिनां दे बहिण पुआंदी आ।
मुंह नाल लाहे पगडीयां, वेखी न किसे दी लाज।
नाई मेरा मारिया, शरबत दित्ता डोल
बाप दे खतिया चार के बक्की नूं लिया बना।
दस महीआं दे घीओ दित्ता, बक्की पे ढिहु पा।
बक्की तो डरन फरिश्ते, मैथों डरे खुदा।
चुभे विच्च पताल, उड़ के चढ़े अकाश।
चढ़ना आपणे शौंक नू, बक्की नू लाज न ला। बंद 39।
लेकिन अपने आप ही पीलू अपने किस्से में इस का खुद ही खंडन करता है, जब खच्चर देखकर साहिबा मिजेऱ् को तानहा मारती हुई कहती है कि यदि घर में घोड़े था नहीं था तो किसी से मांग कर ही ले आता,
माड़ी तेरी टैरकी, मिरज़िया, लिआया किधरो टोर।
सुक्का इहदा चैखटा, कांवा खादी कंगरोड़।
जे घर न सी तेरे बाप दे, मंग लियाउंदों होर।
घोड़े खीवे खान दे बड़े मुरातिब खोर।
भजिया नू जाण न देणगे उधल गईयां दे चोर।
विच्च उजाड़ दे मार के, तेरी सुटण धौण मरोड़। बंद 37।।
या मिर्ज़ा कहता हैः-
तुहाडे बार घोड़ियां, मेरी बक्की का पतला लक्क। बंद 28।
घोड़े अपने सवार के प्रति बहुत वफादार होते हैं। पर जब किसी आदमी की किस्मत साथ छोड़ दे बाकी सारे उसको छोड़ जाते हैं। मिर्ज़े पर जब हमला होता है तो बक्की भी उसको तसल्ली देकर भाग जाती है और साहिबा तानहा मारती हैः-
जंड दे हेठा जट्टा। सो रहियो, उठ सुरत संभाल।
‘बक्की’ तैनू छड के उठ गई, जिस दे उत्ते बड़ा ऐतबार।
नारर छड के उठ गया, तेरा मुड-कदीमा दा यार। बंद 43।।
जहां तक दानाबाद में मिर्ज़ा, साहिबा और बक्की की कब्रों का सवाल है, यह कैसे संभव हो सकता है कि चंदड़ और सियाल मिर्ज़ा साहिबा इकटठों का कब्र बर्दाशत कर लेते। उन्होंने तो साथ में चैथी कब्र, बनाने वाले की भी बना देनी थी। हां, उनकी याद में बनी वह समाधि मानी जा सकती है। दरअसल मुसलमानों का एक खास तरीका है जिनकी रोज़ी रोटी कब्रों की निगरानी रखने से चलती है। इनके परिवार कब्रों के ऊपर चढ़े-चढ़ावे से पलते हैं। इसलिए यह लोग अपने अधिकांश क्षेत्र में आती कब्रों की महानता बढ़ाने के लिए कब्रों के साथ झूठी बाते जोड़ देते हैं। जैसे माई हीर की कब्र पर गोल गुंबद बना कर उसका मुंह खुला रखकर यह प्रचार कर दिया गया कि हीर की कब्र पर बारिश नहीं पड़ती। चारों तरफ से वर्षा की बूंदों को गुंबद रोक लेने के कारण हल्की बारिश अंदर नहीं जाती। पर जब भारी वर्षा होती है तो वह अवश्य ही हीर की कब्र पर पड़ती है।
आदम और हवा की कब्र श्रीलंका में है, जहां आदम के पैर का 5’7 ग 2’6’’ बड़ा निशान आकर्षण का केन्द्र है। आदम के पुत्र अबील की जार्डन में स्थित कब्र को दुनिया की पहली कब्र बता कर प्रचारित किया जाता है। ओमान के धोफर इलाके में नबी इमरान (यीशू मसीह का नाना) की 40 फुट लम्बी कब्र, हज़रत आदिम के पुत्र हज़रत कानबीत की 70 फुट लम्बी, बर्फीला शरीफ, गुजरात (पाकिस्तान) है। इन कब्रों का बड़ा अकार सेलानियों को आकर्षित करने के मकसद के साथ बनाई गया है।
शेख फरीद ने एक दोहा लिखा था,
रोटी मेरी काठ दी की लावणु मेरी भुख,
जिनहा खादी चोपड़ी घणे सहनगे दुख।
फरीद को बाबा शेख फरीद जी की याद में बने रोज़े कहते हैं पेड़ के टुकड़े के विषय में कहा जाता है कि उसके साथ फरीद जी ने मिट्टी के साथ सने हाथ साफ किये थे। यहीं पड़ा हुआ एक लकड़ी का गोलाकार टुकड़ा भी था।21।। शायद अब भी हो। उसके एक सिरा औज़ार से तराशा हुआ था। लोग उसके विषय में कहते हैं कि फरीद जी ने लकड़ी की रोटी का टुक खाया था। मूर्ख जनता को कौन बताये कि दोहे में फरीद जी ने काठ की ‘रोटी’ निशानी के तौर पर प्रयोग किया है। उसके दिमाग में नुक्स नहीं था पड़ा कि लकड़ी को दांत मारता फिरे। लेखकों और पत्रकारों ने भी इस बात को पूरी हवा दी है। ‘पंजाबी साहित्य का इतिहास’ भाषा विभाग, पंजाब पुस्तक के पृष्ठ 377 और जिला बठिण्डा का पंजाबी साहित्य एक अध्ययन (1972 तक)’ पुस्तक में डा. महेन्द्र सिंह बिरदी इसका ज़िक्र करते हैं। मिर्ज़ा, साहिबा और बक्की की कब्रें भी कमाई का साधन बनाने के लिए ही बनाई गई हैं और यर्थाथ नहीं है। न ही उनके पीछे कोई ठोस सबूत है।
इतिहासकार दानाबाद के निकट खड़े एक जड़ को मिर्ज़े की कत्लगाह वाला स्थान बताकर लोगों को बुद्धु बनाये जाते हैं। इनसे पूछो कि क्या इनको वहां मिर्ज़े का डी.एन.ए मिला था, जो यह उस वृक्ष के बारे में दावे से कह रहे हैं। झंग से दानाबाद के रास्ते में सैंकड़ों ही वृक्ष होंगे। क्या सबूत है कि दानाबाद के बाहर खड़ा वृक्ष वही है?
चाली कोहा दा पैंडा है, कौन आते, कौन जा।8।।
पीलू झंग से दानाबाद की दूरी 40 कोस बताता है। 1 कोस पुराने माप के अनुसार 4000 गज़ का बनता है। इस समय पक्की सड़क बन जाने के कारण झंग से दानाबाद 129 किलोमीटर अर्थात 80 मील बनता है। पीलू का मापना काफी हद तक सही आभास होता है, क्योंकि एक कोस - दो मील$ दो फरलांग $ चालीस गज बनता है। इस मतलब 40 कोस 90.8 मील बनते हैं, जो उस समय के लिहाज से ठीक दूरी मानी जा सकती है। पीलू के मुताबिक उस समय दानाबाद से झंग जाने के लिए 4 दिन लगते थे, यानि कि दिन मंे कम से कम 10 कोस या अधिक से अधिक 20 कोस का फांसला तय किया जाता था। साहिबा के घर से भागने के तुरन्त बाद ही सियाला और चंदड़ां को खबर हो जाती है। ज्यादा से ज्यादा मिर्ज़ा दस या बीस कोस दूर निकल आया होगा। यह मुमकिन ही नहीं लगता कि शमीर की फौज पर ‘मुरातबखोर’ ‘आदम खानी’ फुर्तीली घोड़ियों ने मिर्ज़े ने उसकी टैरकी (खच्चर) बक्की को भागने के लिए चालीस कोस या चार दिन का समय दे दिया होगा। यह जंग झंग से दस बीस मील दूरी पर होता तो माना भी जा सकता था। इसलिए यह जंड वाली बात भी महज गप्पों से अधिक कुछ नहीं है।
मिर्ज़ा चाहे या नहीं इस विवाद को एक तरफ रख कर सोचें तो मिर्ज़े की पंजाबी साहित्य को कहानी के रूप में और पंजाबी संगीत को विशेष सुर प्रदान करने की देन है। कोई भी गीत एक से अधिक कंपोजीशन में गाया जा सकता है। लेकिन हीर, ढोला, माहिया की तरह भी मिजेऱ् की भी एक विशेष तर्ज़ (सुर है और मिर्ज़ा सिर्फ उस सुर में ही अच्छा लगता है।) छाती के ज़ोर से गाया जाने वाला मिर्ज़ा किसी आम गायक के बस का रोग भी नहीं है। इसे वीर-रस का गायन करने वालों द्वारा ऊँचे स्वर में गाया जाता है।
और इसका आरम्भ अक्सर लम्बे आलाप से किया जाता है। पहले मिर्ज़े को गाने की रफ्तार धीमी होती थी। अब हम अपने संगीत मंे पश्चिमी साज और बीटों का प्रयोग करते हैं इसलिए मिजेऱ् के शब्दों को गाने की रफ्तार, जिस को संगीत की तकनीकी भाषा में हम टैंपो कहते हैं भी काफी तेज़ होती है। इस लिहाज़ से बनाने वाले भी उसी तीव्रता और गति से साज बनाते हैं। मिर्ज़े को प्रत्येक तत्काली अपने-अपने सामथ्र्य के अनुसार अपने हिसाब से गाते हैं, पर ज्यादातर यह आहीर भैरवी राग में गाया जाता है। मिजेऱ् पर अनेकों फिल्में भी बनी हैं। अनेकों गायिकों ने मिर्ज़ा गाया है, पर अब तक सब से बढ़िया मिर्ज़ा मैंेनें जगमोहन कौर का सुना है। मिर्ज़ा पहली बार किताबी रूप में 1884 में छपी आर.सी. टैपल की श्ज्ीम स्महमदके व िजीम च्नदरंइश् पुस्तक में छपा, भले ही कि गजटीयर में उसने इसको पहले ही लिख दिया था। उर्दू में मिर्ज़ा 1951 पंजाब शिक्षा विभाग, लाहौर की ओर से प्रकाशित किया गया।
यदि मिर्ज़ा हकीकत था तो सिआलां और चंधड़ों के हाथों मारा गया है। यदि नहीं था तो पीलू ने कहानी (किस्से) में उसको मार दिया है;
विच्च कब्रां दे खप्प गया, मिर्ज़ा सोहणा जवान।
ऐह किस्सा मिर्ज़ा साहिबा दा जोड़िया।
पीलू शायर ने, जिहनू जाणे कुल जहान।64।।
लेकिन मिर्ज़ा रहती दुनिया मंे तब तक अमर रहेगा, जब तक हमारे गायक गाते रहेंगेः- (ंपंजाबी लोक गीत)।
हुजरे ज़ाह मुकीम दे, इक जट्टी अर्ज़ करे।
में बकरा देनीआं पीर मेरे सिर दा साईं मरे।
पंज सत मरन गवांढण, सहिंदीआं नू ताप चढ़े।
हट्टी ढहे कराड़ दी, जित्थे दीवा नित्त बले।
कुत्ती मरे फकीर दी, जिहड़ी चऊं चऊं नित्त करे।
गलियां होवण सुंनीआं, विच्च मिर्ज़ा यार फिरे।

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