लंबी धार - बलराज सिंह सिद्धू
चौधरी इलियास मुद्दत बाद अपने बचपन के लंगोटिये यार फिराज़ मुहम्मद को मिलने उसके घर पहली बार आया। फिराज़ मुहम्मद ने अपनी बेगम के साथ उसका परिचय करवाते हुए बताया, “बेगम, चौधरी और मैं बचपन में इकट्ठे बहुत शरारतें किया करते थे। हम ज़मीन पर एक लकीर खींचकर बराबर खड़े हो जाते और पेशाब करते हुए मुकाबला करते कि कौन लंबी धार मारता है और मैं हमेशा चौधरी से जीत जाता। हा…हा…हा… !”
यह सुन फिराज़ मुहम्मद की बेगम शरमाकर रसोई में चाय बनाने चली जाती है।
फिराज़ मुहम्मद चौधरी से हालचाल पूछता है, “और बता, बीवी-बच्चों का क्या हाल है ?”
“मुहम्मद साहब, अल्लाह की बड़ी मेहर है। सुख से बारह बच्चों का अब्बा हूँ।”
“अच्छा ? चौधरी बड़ी लंबी धार मारने लग पड़ा है !”
“तुम्हारे बच्चे कहीं नज़र नहीं आ रहे ?”
“यार, क्या बताऊँ। मेरी बीबी बांझ है।” कहकर फिराज़ मुहम्मद चुप हो जाता है।
रसोई में बातें सुन रही फिराज़ की बेगम के सीने में ‘बांझ’ शब्द गोली की तरह बजता है।
रात में खाने के उपरांत फिराज़ की बेगम सोने चली जाती है और वे दोनों गप्प-शप मारते बैठे रहते हैं।
जब देर रात गई फिराज़ मुहम्मद अपने कमरे में आता है तो अपनी बेगम को जागता देखकर पूछता है, “सोई नहीं अभी तक ?”
“नींद नहीं आई… चौधरी साहिब के बारह बच्चे सुनकर मुझे तो बड़ी हैरानी हुई। इनकी बीवी धन्य है। …चौधरी साहब बड़ी लंबी धार मारते है…सोचती हूँ, एक रात से क्या फर्क़ पड़ता है। अगर आज की रात मैं चौधरी…।”
अपनी पत्नी के मुँह से यह बात सुनकर फिराज़ मुहम्मद शर्मिन्दा-सा हो, गर्दन झुकाकर सोचने लग जाता है, “बेगम, वो भी कोई वक़्त था जब हम लंबी धार मारा करते थे।”
No comments:
Post a Comment