Wednesday, 27 July 2016

प्रथा

प्रथा 
-बलराज सिंह सिद्धू 

इस कहानी के पात्रों की कर्मभूमि यूँ तो इस संसार में कहीं भी हो सकती है। किसी भी देश का कोई भी शहर या गांव। मगर यहाँ मैं सुविधा के लिए एशिया महाद्वीप के देश भारत के एक महानगर मुम्बई का प्रयोग कर लेता हूँ। जहाँ तक मैं जानता हूँए यह कहानी अभी तक कहीं भी घटित नहीं हुई। लेकिन इतना मेरा निश्चय है कि काफ़ी वर्षों बाद घटेगी अवश्य। यह भी हो सकता हैए थोड़े से समय के बाद ही घट जाए या हो सकता हैए घटनी प्रारंभ भी हो गई हो।

औरत...औरत...औरत...

औरत...औरत...औरत...

घर से जाते हुए  भोली के डैडी की पीठ  को  मैं देखती रह गई थी। ये गए... वो गए। पल में ही पता नहीं कहाँ गायब हो गए। 

कहानी परमो धर्मा (प्रथम भगौती सिमर कै)


परमो धर्मा 

-बलराज सिंह सिद्धू

नितनेम का पाठ जपते, ध्यान मग्न बैठे जत्थेदार भाग सिंह ने निगाह ऊपर उठा आकाश की ओर घुमाई। चारों तरफ से आसमान साफ़ है। उसने मुँह ऊपर उठाकर भवें ऊपर चढ़ाईं ताकि आँखें कुछ अधिक खुल जाने पर जितनी दूर तक देखा जा सकता था, देखा जा सके। परंतु उसको कहीं भी धूल उड़ती नज़र नहीं आई। दूर से अपनी ओर आने वाले व्यक्ति का पता लगाने का जत्थेदार भाग सिंह का यह अपना ही निराला ढंग है। क्योंकि इधर-उधर रेतीले उजाड़ों में जब भी घोड़े दौड़ते हैं तो उनके खुरों से उखड़ी मिट्टी हवा में मिलकर अम्बर में फैल जाती है। इस उड़ती मिट्टी और उसकी मात्रा को देखकर जत्थेदार कई मील दूर खड़ा होकर अंदाज़ा लगा लेता है कि कहाँ से, किधर से और कितने व्यक्ति आ रहे हैं।

मदहोश


मदहोश
-बलराज सिंह सिद्धू 

नित्य की तरह आज भी चन्नी समय से कालेज से पढ़कर लौटी थी। रोज़ की तरह ही वह नहाई-धोई थी। पहले की तरह ही उसने कपड़े बदले थे और रोज़ाना की भाँति ही वह रसोई में रोटी खाने बैठ गई थी। पर आज जबसे वह कालेज से लौटी है, स्वाभाविक तौर पर हँसने-खेलने की अपेक्षा गंभीर और गुमसुम-सी है। अभी तक उसने रोटी की पहली बुरकी ही तोड़ी है और वह भी मुँह में नहीं डाली है। ऐसा लगता है मानो किसी गहरी सोच में डूबी हो। वह इतना मग्न होकर सोच रही है कि उसने एक बार भी आँखें नहीं झपकाईं।

कहानी -प्रथा

प्रथा 
-बलराज सिंह सिद्धू 

इस कहानी के पात्रों की कर्मभूमि यूँ तो इस संसार में कहीं भी हो सकती है। किसी भी देश का कोई भी शहर या गांव। मगर यहाँ मैं सुविधा के लिए एशिया महाद्वीप के देश भारत के एक महानगर मुम्बई का प्रयोग कर लेता हूँ। जहाँ तक मैं जानता हूँ, यह कहानी अभी तक कहीं भी घटित नहीं हुई। लेकिन इतना मेरा निश्चय है कि काफ़ी वर्षों बाद घटेगी अवश्य। यह भी हो सकता है, थोड़े से समय के बाद ही घट जाए या हो सकता है, घटनी प्रारंभ भी हो गई हो।