साहित्य, संगीत तथा कला में अशलीलता
कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति के खून में भी कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो उसे रहम दिल, दयावान और भावुक बनाने का सामर्थय रखते हैं। जब ये तत्व या ब्लड-सैल अपना असर दिखाते हैं तो मनुष्य का व्यक्तित्व एकदम बदल जाता है। दुनिया के इतिहास में इस की अनेकों मिसालें मिली हैं, जैसे लक्ष्मण दास से बना बंदा बहादुर, सम्राट अशोक का कालिंगा के युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन होना, बादशाह अकबर का जबरदस्ती से स्त्रियों को अपने हरम में रखना और दूसरी तरफ जनहित के कार्य करना आदि बहुत सही उदाहरणें है।
यही तत्व मनुष्य के भीतर प्रेम का भाव पैदा करते हैं। प्रेम मनुष्य का झुकाव सूक्ष्म कलाओं की तरफ झुकाता है। इसी कारण से दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी कला के साथ लगाव होता है। चाहे यह साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, बुत्त-तराशी, अदाकारी या कोइ अन्य हो। इन कलाओं को प्यार करने वाला व्यक्ति जब उस कला को किसी कलाकार की किसी बढ़िया रचना के सम्मुख होता है तो स्वाभाविक ही उसके मन में उस कलाकार के लिये सम्मान और श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। जैसे कि अदाकारी को प्यार करने वाले जब किसी अभिनेता या अभिनेत्री की बढ़िया एकटिंग देखते हैं तो उसके दीवाने हो जाते है। जब कलाकार को प्रशंसको की मुहब्बत मिलती है, तो वह मकबूल (मशहूर) होने लगता है जैसे-जैसे कद्रदानों की गिनती बढ़ती जाती है, वैसे-2 कलाकार प्रसिद्धी प्राप्त करता जाता है और जिसके साथ समाज में उसका रूतबा ऊँचा होता जाता है। रूतबे की बुलंदी के हिसाब से कलाकार को आर्थिक लाभ और दिमागी सकून मिलने लगता है। यही कारण है कि हर कलाकार अपनी कला के साथ न शाहकार का सृजन करने का यत्न करके हमेशा अपने आप को सर्वोत्तम सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है। कलाकृति को बढ़िया बनाने के प्रयास में कई बार कलाकार से कोई गलती भी हो जाती है। इसके साथ उसकी रचना दोषपूर्ण हो जाती है। जिसकी लोगों द्वारा आलोचना भी की जाती है। आलोचना का निशाना बनी कृति कई बार कलाकार को नुक्सान पहुँचाने की बजाय फायदा भी देती है, जो अन्य कलाकारों को वही गलती जानबूझ कर करने के लिये उकसाती है। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकारी और बुत्ततराॅशी में जानबूझ कर भरे जाते ऐसे ही एक दोष का नाम है अशलीलता जिसे उर्दू में फाहसीपन और अंगे्रजी में टंनसहंतपजल कहते हैं।