Wednesday, 2 January 2019

नंगे सागर की सैर

नंगे सागर की सैर
दिनांक एक सितंबर 2013 को पंजाब टैलीग्राफ की तरफ से पंजाब टूरज़ के बैनर तले इंग्लैंड के एक मशहूर समुद्री तट ब्र्राईटन के टूर पर ले जाया गया। वैसे तो लीमोसोल (साईप्रस), उसटैंड (बैल्ज़ियम) आदि अर्थात् दुनियां के अन्य अनेकों देशों के समुद्र देखे हैं। इंग्लैंड के भी ब्लैकपूल, साऊथएण्ड औन सी एंव वैस्टरन-सुपरमेअर आदि को तो ननिहाल जाने जैसे जब दिल करे चले जाते हैं। ब्राईटन के इस सागर की सैर का भी यह कोई पहला अवसर नहीं था। काॅलेज के दिनों में तो लगभग हरेक दूसरे तीसरे सप्ताह के आखिर में यहाँ जाकर बोतल के ढक्कन खोलते थे। लेकिन ब्राईटन की मेरी इस यात्रा में पूर्व यात्राओं से भिन्नता थी। पहले एक आशिक मिज़ाज युवक यहाँ आया जाया करता था और अब एक संजीद और साहित्य को समर्पित लेखक जा रहा था।
ब्राईटन, पूर्वी ससैक्स काऊँटी के अधीन पड़ता गे्रट ब्रिटेन की दक्षिणी बंदरगाह वाला शहर है। इसके बसने का इतिहास 1080 से भी पहले का है। पहले इसे ब्रिसटैलमसटिऊन कहा जाता था। पुरानी अंगे्रजी के इस शब्द का अर्थ है, पत्थर का चमकीला टोप। यह सिल टोप समुद्री हमलावरों का सामना करने वाले सैनिक अपनी सुरक्षा के लिये पहना करते थे। अर्थात् ब्राईटन को इंग्लैंड का सुरक्षा टोप माना जाता था, क्योंकि समुद्री रास्ते से होने वाले हमले अधिकतर इसी मार्ग से होते थे और सबसे पहले ब्राईटन वासी ही दुश्मन का सामना करते थे। बारहवीं-तेरहवीं सदी में यह नाम बिगड़ कर ब्राईटहलमस्टोन बन गया था, जिस का अर्थ भी वही था। उसके पश्चात् ब्राईटहलमस्टोन का मौजूदा संक्षेप रूप ब्राईटन प्रचलित हो गया था।
1514 ई. में फ्रांस और इंग्लैंड के युद्ध में यह सारा ब्राईटहलमस्टोन शहर आग से जल कर राख हो गया था। केवल एक सेंट निकोलस चर्च ही आग की लपटों से बचा था। गिरिजाघर के आस-पास नष्ट हुई इमारतों के मलबे उठाये खड़ी गलियों और रास्तों पर पुनः निर्माण करके फ्रांस के हमले की बेदर्द यादों को संभाल लिया गया था। उस समय जल कर राख हुये उन पुरातन रास्तों को आज भी लेनज़ कह कर फिरंगियों ने अपने इतिहास को संभालने का यत्न किया हुआ है। 1740-1750 ब्राईटन को आकर्षण का केद्र बनाने के लिये लुईस का डाक्टर रिचहर्ड रसल अपने रोगियों (मरीजों) को ब्राईटन सागर के पानी के प्रयोग के नुस्खे दिया करता था। मच्छेरों का यह गाँव बादशाह जारज चैथे (चतुर्थ) के समय ही अच्छी प्रकार विस्तृत हुआ था और आज विशाल शहर का रूप धारण कर चुके इस शहर में बहुगिनती इमारतें जाॅरज़ीअन शैली की ही है। 480,000 की आबादी (जनसंख्या) वाले ब्रईटन के साथ लगते पोर्टसडेल, वाॅर्थिंग और लिटलहैम्पटन आदि क्षेत्र इसी शहर का अंग है। यहां दो यूनीवर्सिटीयां और एक मैडीकल स्कूल है। ब्लैकपूल के बाद बाईटन यूनाईटिड किंगडम का दूसरा बड़ा उत्तेजित यात्रियों (सैलानियों) केंद्र माना जाता है।
इंग्लैंड में लगभग 30,000 रैस्टोरेंट हैं, जिन में से सबसे अधिक 12,477 अकेले लंदन शहर में हैं और लंदन के बाद ब्राईटन सबसे अधिक भोजनालयों में दूसरा प्रमुख स्थान है, यहां लगभग 400 रेस्टोरेंट (रेस्तरां) हैं।
दिन-प्रतिदिन बढ़ती आबादी (जनसंख्या) को देखकर 1997 में ब्राईटन के साथ होव क्षेत्र को भी मिला दिया गया था। अब इसे ब्राईटन एण्ड होव कहते हैं। मलिका ऐलिज़ बेथ-2 की वर्ष 2000 में मिलेनियम वर्षगांठ के मौके पर ब्राईटन को प्रमुख सैलानी बंदरगाह घोषित किया गया था। 1919 में यहाँ प्रथम सिनेमा बना था, जिसे ‘दी डयूक आफ योरकज़ पिक्चरहाऊस’ कहा जाता था। अब इसे आर्टहाऊस कहते हैं। इसके अलावा ब्राईटन में दो अन्य मल्टीपलैक्स सिनेमा हैं। ब्राईटन म्यूज़ियम एण्ड आर्ट गैलरी के अतिरिक्त बूथ म्यूज़ियम आॅफ नैचुरल हिस्टरी, ब्राईटन टौए एण्ड म्यूज़ियम और ब्राईटन फिशिंग अजायब घर भी यहां हैं।
ब्राईटन में अनेकों फिल्में भी बनीं है, जिनमें फनंकतवचीमदपं ;1979द्धए डपततवतउंेा ;2005द्धए ।दहनेए ज्ीवदहे ंदक च्मतमिबज ैदवहहपदह ;2008द्धए ज्ीम ल्वनदह टपबजवतपं ;2009द्धए ठतपहीजवद त्वबा ;2010 ंदक 1947द्ध ंदक ज्ीम ठवंज जींज त्वबामक ;2009द्ध के नाम वर्णनीय हैं। 
मैं जब कभी भी समंदर के किनारे चलता हूं तो स्कूल के दिनों में पढ़ी हुई अंगे्रजी की कविता ‘‘मैन एण्ड गौड़’’ मुझे याद आ जाती है। जो शायद लार्ड टायसन की लिखी हुई थी। कविता तो अब मूल रूप में याद नहीं है। लेकिन उस के माध्यम से ब्यान की गई कहानी मुझे तमाम उम्र नहीं भूल सकती। बेशक मेरी सोच और विचारधारा तो किताबें पढ़ कर नास्तिक बन चुकी है। लेकिन ज्ञान फैलाने के मकसद के साथ इस कविता का जिक्र कर रहा हूं। प्राप्त की गई विधा और हुनर के आप उतनी देर तक हकदार नहीं बनते, जब तक आप उसे किसी दूसरे की झोली में नहीं डालते। महात्मा बुद्ध भी कह गये हैं कि ज्ञान और प्यार बांटने से बढ़ते और विकसित होते हैं।
बहरहाल, उस कविता के माध्यम से कवि जो कथा पेश करता है, वह इस प्रकार है। कवि मृत्यु के पश्चात् ईश्वर की कचहरी में चला जाता है। उसकी जिंदगी का लेखा-जोखा होने लगता है। उसके पूरे जीवन सफर की दास्तान सामने पड़ी होती है। उसे देखकर वह व्यक्ति ईश्वर से प्रश्न करता है, ‘‘देख मैं अपनी बीती जिंदगी के सागर को देखता हूं तो उसके किनारे रेत पर दो कदमों के निशान हैं। एक मेरे और दूसरे तेरे। फिर मैं आगे देखता हूं कि आगे जाकर कई जगह केवल एक ही के पाँव का निशान है। यह वह समय था जब मेरे ऊपर दुखों, मुसीबतों और विपत्तियों के तूफान आये। मैंने तुम्हें प्रार्थना की। कितना तुम्हारे नाम का स्मरण किया। कितने ही दान-पुण्य और लोगों की भलाई के काम किये। लोगों, दोस्तों, मित्रों और सगे संबंधियों ने तो मेरा साथ छोड़ना ही था। तुमने भी मेरा साथ छोड़ दिया?’’
यह सुन कर ईश्वर उसे उत्तर देता है, ‘‘जब तुम्हारे ऊपर गमों के बादल छाए हुये थे तो तुम्हारे भीतर चलने की हिम्मत नहीं रही थी तुम औधे मुँह गिर पड़े थे। मैं तुम्हें अपने कंधे पर उठाकर चला था। ध्यान से देखो। वह तुम्हें जो एक पाँव के निशान दिखाई दे रहे हैं ना? वह तेरे नहीं मेरे हैं।’’
यह टूर (यात्रा) हमारे यू.के. से छपते पंजाब टैलीग्राफ अखबार की तरफ से आयोजित किया गया होने के कारण बहुगिनती सैलानी सवारियां अखबार के पाठक थे और मेरा नावल ‘अग्ग की लाट: प्रिंसैस डायना छपता होने के कारण मेरे नाम से वाक़िफ थे। मेरी उपस्थिति के बारे में जब लेखिका कमल अनमोल गिल ने कोच में बताया तो एकदम सब की नजरें मुझ पर केंद्रित हो गईं। देखा जाये तो यह अपने आप में मेरी कला की दाद (तारीफ) थी। पाठक का योग्य मौके पर मिला प्रोत्साहन लेखक का आगे और बढ़िया लिखने के लिये उत्साहित करता है और सही समय पर मिले आलोचनात्मक सुझाव आत्म-निरीक्षण करने और अगली रचनाओं को दोष-मुक्त बेहतरीन बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं।
एक बार एक बहुत प्रसिद्ध कवि था। उसे राज दरबारी कवि बनने का भूत सवार हो गया। वह बादशाह के पास गया और अपनी गज़ल सुनाने लग पड़ा। गज़ल का मुखड़ा (मतला) सुन कर बादशाह खामोश रहता है। पहला शेर सुन कर बादशाह दाईं तरफ मुँह करकेे बैठ जाता है। दूसरा शेयर सुनाने पर बादशाह उसकी तरफ पीठ करके बैठ जाता है। तीसरा शेयर सुनाता है तो बादशाह और घूम कर कवि के दाईं तरफ वाली दिशा में मुँह कर लेता है। चैथे शेयर के साथ बादशाह घूम कर गज़लगो की तरफ मुँह सीधा कर लेता है। कवि बादशाह की आँखों में आँखें डाल कर कहता है, ‘‘छोड़ो पीछा यार! मैं आपका और अपना समय बर्बाद कर रहा हूँ। आपको मेरी समझ नहीं लगेगी।’’
यह सुनकर बादशाह कहता है, ‘‘जब तुमने मुझे पहला शेयर सुनाया तो मैंने तुम्हें अपनी दाईं तरफ की रियासत दे दी। दूसरे शेयर से प्रभावित होकर मैंने अपने पिछले तरफ वाली दिशा की रियासत बखश दी। तीसरे शेयर के साथ बाईं तरफ वाली तेरे नाम कर दी। चैथे के साथ सामन वाली रियासत तुम्हें इनाम के तौर पर दे दी।’’
कवि उसकी बात बीच में से काटते हुये बोलता है, ‘‘तुम्हारी रियासतें मैंनें सिर में मारनी हैं, यदि तुमने मेरी रचना की मौके पर ही दाद (तारीफ) नहीं दी तो क्या दिया?’’
मौके पर मिली दाद (तारीफ) का अपना ही महत्व होता है। हमारी ब्रमिंघम वाली कोच में आर.पी. सिंह भी थे। अस्सी-पचासी साल की उम्र के वे सेवामुक्त सरकारी अफसर है। उनसे मेरी सबसे पहली मुलाकात करवाते हुए रामदास चाहल (पंजाबी टैलीग्राफ के संपादक) ने बताया ‘‘यह बलराज सिद्धू वह लड़का है, जिसने रन, घोड़ा और तलवार कहानी लिखी थी।’’
उन्होंने मुझे बैठे हुये देख कर कहा, ‘‘खड़ा हो।’’ मैं खड़ा हो गया। वे मुझे सिर से पैरों तक देखते हुये मुतास्सिर स्वर में, ‘‘वाह’’ बोले। उन्हें मेरी रचना के स्तर के मुताबिक मेरी कम आयु देखकर ताजुब (हैरानी) हुआ था व कहानी के बारे में बातें करने लगे।... और कहने लगे, ‘‘सिद्धू यार तेरी कहानी का एक डायलाग है। मुझे इतना बढ़िया लगा कि मैंने कईयों को सुना कर कहानी पढ़ने की सिफारिश की है। जब कपूरथले की शहज़ादी गोबिंद कौर हमेशा निर्वस्त्र रहती है और उसका घरवाला उसे वस्त्र (कपड़े) पहनने को कहता है तो वह जवाब देती है। वस्त्र पहनने का क्या फायदा, कपड़ों के भीतर भी तो हम नंगे ही होते हैं?... यार कमाल का डायलाग था यह।’’
मैंने बात हंसी में डाल दी और सुन कर प्रसन्नता भी हुई कि मेरी कहानियों को याद रखा जाता है। मैं आर.पी. सिंह जी को बताने लग पड़ा कि मैंने एक नावल वस्त्र भी लिखा था। जिसमें वस्त्रांे के अनेकों सिंबलों (प्रतीकों) में प्रयुक्त करके यह भी बताया था कि रिश्ते-नाते भी वस्त्र ही होते हैं, जिन्हंे उतार कर फेंक देने के बाद इन्सान नंगा हो जाता है।... इस प्रकार बातें करते-करते हम ब्राईटन पहुंच गये।
ब्राईटन, इंग्लैंड का एक नूड़बीच है। अर्थात् इस सागर का एक हिस्सा ऐसा है, जहाँ पूर्ण रूप मंे निर्वस्त्र होकर आप धूप सेक सकते हो। आम तौर पर समुद्री तटों पर आप आंगन में सुखाने के लिये डाली गीली गेहूं की भांति, धूप सेकने के लिये लेटे गोरे गोरियां देख सकते हो, लेकिन उनके ब्रा और जांघीआ (निक्कर) पहनी होती हैं। सौभाग्य से ब्राईटन में आप इन्हें अल्फ (पूर्ण) नग्न अवस्था में देख सकते हो। यह प्रथा यूनाईटड किंगडम, आयरलैंड और हैनओवर (जर्मन) के बादशाह जार्ज चतुर्थ (चैथे) (12 अगस्त 1762 - 26 जून 1830) ने चलाई थी। वह साहितय संगीत के अतिरिक्त शराब, कबाब और शबाब का सिरे का शौकीन था। इक्कीस वर्ष की आयु में वह अपनी अठारह रखैलों को लेकर ब्राईटन आया करता था। उसकी मृत्यु के बाद यह सब बंद हो गया था।
मलिका विक्टोरिया के बड़े पुत्र पिं्रस आॅफ वेल्ज़, एलबर्ट एडवर्ड (जो बाद में एडवर्ड सातवां बन कर यूनाईटिड किंगडम, ब्रिटिश डोमेमज़ और हिंदुस्तान का बादशाह बना) ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर 1847 में ब्राईटन के बीच को ‘न्यूटर्स बीच’ घोषित कर दिया था। उसने महाभारत के कौरव दुर्योधन की कहानी सुनी थी कि उसके पिता धृतराष्ट्र के अंधा होने के कारण उसकी माँ गंधारी ने भी अपनी आँखों के ऊपर यह कहकर पट्टी बांध ली थी कि जिस संसार को उसका पति नहीं देख सकता, वह भी नहीं देखेगी। दुर्योधन को वरदान प्राप्त हुआ था कि यदि उसे नगन रूप में उसकी माँ एक बार आँखों से पट्टी उतारकर देख लेगी तो उसका सारा शरीर पत्थर जैसा पक्का हो जायेगा और उसे कोई भी हथियार चोट नहीं पहुंचा सकेगा। दुर्योधन जब पूर्ण रूप से नग्न होकर अपनी माँ के पास जाने लगा तो कृष्ण ने चाल चलते हुये उसे लंगोट पहनने के लिये उकसा दिया था। जब गांधारी ने आँखों से पट्टी उतार कर दुर्योधन को देखा तो उसका बकी सारा शरीर तो चट्टान की भांति सख्त और फौलादी बन गया था। लेकिन लंगोट वाला हिस्सा कच्चा रह गया था। हिंदू मिथिहासकार मर्द के लंगोट के भीतर आने वाले इस अंग पर चोट लगने के साथ मर्द की होने वाली मौत को इस मिथ्या से जोड़ते हैं।
इस बात से प्रभावित हेकर ऐडवर्ड सातवें ने अपने शासन काल के समय इस समुद्र के किनारे धूप सेकते हुये स्त्रियों-पुरुषों को सब कपड़े उतारने की ना सिर्फ छूट दी, बल्कि इस नेक कार्य में खुद भी शामिल हो कर इस को बढ़ावा भी दिया था। तब से इस नंगे समुद्री तट की मशहूरी होनी शुरु हुई थी और यह कामी सैलानियों के लिये मक्का मदीना बन गया था। एडवर्ड का मानना था कि ठण्डे देशों में रहने वालों के लिये धूप पौष्टिक-आहार का काम करती है। उसने प्रचारित किया कि धूप के गुणों और पौष्टिक आहार से गुप्त अंग और स्त्रियों की छातियां (सीना) वंचित क्यों रहें! इस लिये इस समुद्र के उतने हिस्से को न्यूट्रीअस बीच कहा जाता है। उन दिनों में ब्राईटन को समुद्र किनारे बसा लंदन भी कहा जाता था।
मैं और आर.पी. सिंह समुद्र के किनारे जा कर पत्थरों के ऊपर बैठ कर समुद्र को देखने लग पड़े। कंप्यूटरों पर अधिक समय गुजारते होने के कारण समुद्र के पानी को छू कर आती ठण्डी लहरें आँखों के लिये वरदान सिद्ध होती हैं। ठण्डक, ताज़गी और सुकून का सा अनुभव होता था उस समय। कुछ देर बाद मैंने आर.पी. सिंह को कहा कि आप बैठो और समुद्र देखो। मैं कोई जरूरी काम करके आता हूं।
यदि ब्राईटन के समुद्र की तरफ जाते हुये मुँह कर लें तो दाईं तरफ साधारण बीच है और बाईं तरफ न्यूट्रिस बीच है। मैं मस्ती में कूदता हुआ सीधा वहाँ जा पहुँचा। जैसे ताजा-ताजा बना कर कच्ची सेवईयां सूखने के लिये टंगी होती हैं। इस प्रकार गोरे-गोरियां नग्न शरीर सूर्य की तरफ किये शीशे की भांति चमक मार रहे थे। मर्द तो दो-चार ही थे, लेकिन औरतों की भारी संख्या थी। कम से कम पच्चीस-तीस तो अवश्य होंगी। लिखने के लिये लेखक अपने आसपास से इसी भांति ही चीजें उठाता है। मुझे भी उम्मीद थी कि मुझे भी लिखने के लिये यहां से कुछ नया अवश्य मिल जायेगा। मैंने जितना भी गल्प लिया है, अर्थात् नावल कहानियां सभी स्त्री-पुरुष के रिश्तों पर आधारित हैं और इस रिश्ते की बुनियाद सैकस होता है। और निर्वस्त्र होने का मतलब काम की तरफ पहला कदम बढ़ाना होता है। मेरी हर कहानी और नावल में सैक्स का वर्णन होने के कारण कई तो पंजाबी में सब से अधिक अश्लील लिखने के खिताब के साथ भी मुझे निवाज़ देते हैं। नग्न डांस और मुजरे तो बहुत देखे हैं। लेकिन कहते हैं कि हुसन तब पूरे यौवन पर होता है, जब सोया हो। मेमें (गोरी स्त्रियां) सागर किनारे आँखें बंद किये, नीम नींद की अवस्था में पड़ी थी। वैसे तो हैरानी सी भी होती थी कि कैसे ये लोग दुनियाँ से बेखबर और बेलिबास (वस्त्रहीन) होकर अपनी मस्ती में मस्त हैं।
आचार्य रजनीश ओशो अपनी पुस्तक ‘संभोग से समाधी तक’ में एक बड़ी बढ़िया बात का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि एक व्यक्ति होता है और किसी इस्लामिक मुल्क (देश) के किसी गाँव में वह रहता है। उसने बचपन से जवान होने तक कभी किसी स्त्री को नहीं देखा होता। फिर एक दिन वह शहर जाता है और वह एक बुर्कापोश औरत के हाथों की अंगुलियाँ देखता है तो उसे असीम उत्तेजना होती है। वह रोज़ स्त्रियों की अंगुलियाँ देखता रहता है। उसके भीतर से धीरे-धीरे उत्तेजना मर जाती है। उसके बाद वह किसी बड़े शहर में चला जाता है। वहां की स्त्रियों के कंधों तक बाजू नंगी होती हैं। उसकी उत्तेजना पुनः उत्पन्न हो जाती है। कुछ समय के बाद वह इसका आदी हो जाता है। फिर वह किसी महानगर में चला जाता है, जहाँ स्त्रियां बुर्का नहीं पहनती थी। काम उसके भीतर तहलका मचा देता है। कुछ समय बाद वह बिना बुर्के वाली स्त्रियों के अंग देखने का भी आदी हो जाती है। फिर वह यूरोप में आ जाता है और बिकनी वाली स्त्रियाँ देखने लग जाता है। यहाँ वह काम वासना के अगले पड़ाव में पहुँच जाता है और उसकी नसें सदैव तनी (अकड़ी) रहने लगती हैं। फिर वह मेरे भांति ब्राईटन बीच पर आने लग जाता है और इस प्रकार जब औरत के जिस्म और संभोग कला का ज्ञाता हो जाता है और सैकस से ऊपर उठ जाता है और बहुत बड़ा व्यक्ति बन जाता है।
मैं भी उसकी नकल (रीस) से सैकस से ऊपर उठने का प्रयास कर रहा था। सैकस से ऊपर उठने के लिये पहले इस में गर्दन तक धंसना पड़ता है। मैं इस कुदरती नज़ारे को लुत्फ उठाते हुये सोच रहा था कि क्या मैं आँखें सेंक रहा हूं या आँखों को ठण्डक पहुँचा रहा हूं? लेकिन एक बात मैं अच्छी प्रकार जानता था कि वहां से मुझे लिखने के लिये काफी कच्चा मसाला प्राप्त हो जाना था। लेकिन दूसरी तरफ वहां बैठे व्यक्ति को डर भी होता है कि कोई जानकार ना देख ले। इस भय को दिल से निकालने के लिये मैं धनी राम चातरिक की कविता गुनगुनाने लग पड़ा, ‘‘अखिओं तकणा सिफत तुहाड़ी। कौण कहे तुसीं तक्को ना? जगत तमाशा जम-जम तक्को। तकदीआं तकदीआं थको ना।’’
मेरी आँखों के क्लोज़ सरकट कैमरे घूमते हुये एक अंग्रेज स्त्री पर जाकर फोकस हो गये। वह औंधे लेटे हुये किताब पढ़ रही थी। मेरी हम उम्र और एथलैटिक शरीर वाली थी वह। धूप में चमकते रेत के कणों की भांति लिशक (चमक) रही थी वह। मेरे मन में आया कि ये तो अपने महकमे (साहित्य की शौकीन) की लगती है। इसे किसी कई कहानी का पात्र बनाते हैं। मैंने उसके पास जाकर पूछा, ‘‘यदि आप बुरा ना माने तो क्या मैं आपके पास आकर बैठ सकता हूं?
‘‘नहीं। आईये बैठिये। इटस ए फरी कंटरी!... यह आज़ाद देश है।’’ उसने पढ़ना छोड़ कर वह नावल बंद कर के रख दिया।
यह ऐना राईस का ऐतिहासिक नावल था। मैंने नावल के कवर से इस संबंध में फुर्ती से टिप्पणी पढ़ कर उसे यह साबित कर दिया कि मैंने वह पढ़ा था, ‘‘बहुत बढ़िया और खोज भरपूर है यह नावल।’’
‘‘तुम्हें पढ़ने का शौक है?’’
‘‘हाँ। शौक नहीं जनून है। पढ़ने का ही नहीं, लिखने का भी। राईटर (लेखक) हूँ। मैंने अपने नंबर से बनाने चाहे थे।
‘‘वैरी गुड! क्या लिखा करते हो?’’
‘‘जो दिल करे। हर विधा में लिखा है। लेकिन मेरी पहचान अधिक तौर पर गीतों, नावल और कहानियों में है।’’
वह मुस्करा कर बोली, ‘‘मेरे ऊपर कोई कहानी लिख सकते हो?’’
‘‘मैं भी ऐना राईस की भांति गल्प ही लिखता हूं। मेरी रचना की पात्र बनने के लिये तुम्हें मेहनत करनी पड़ेगी। यदि परिश्रम करो, कोई ऐतिहासिक प्राप्ति करो तो कहानी तो क्या, मैं तुम्हारे ऊपर पूरा नावल लिख दूं।’’
उसने ऐना राईस के नावल के संबंध में तीन चार सवाल दाग दिये। पढ़ा ना होने के कारण विष्य बदलता जरूरी हो गया था। मैंने फुर्ती से अगला पत्ता फेंक दिया, ‘‘तुम्हें मालूम है कि मैं तुम्हारे पास ही क्यों आया हूं?’’
‘‘नहीं, क्यों?’’
‘‘दूर से लेटी हुई तुम ऐसे लग रही थी, जैसे समंदर की लहर ने कोई सीप उछाल कर बाहर किनारे पर फेंक दी हो और उसमें से निकल कर गिरी तुम असली मोती हो। सच में तुम स्वीट, सैक्सी और बहुत सुंदर हो।’’
तारीफ स्त्रियों की सबसे बड़ी कमज़ोरी होती है और इसकी मार से कोई भी स्त्री नहीं बचती और फिर साधारण स्त्रियों के मुकाबले सूक्ष्म कलाओं को प्रेम करने वाली स्त्रियां इन कलाओं के सृजनकत्र्ताओं की पकड़ में आसानी से आ जाती हैं। हम वार्तालाप के भंवर में लपेटे गये।
‘‘तुम्हें मेरे बदन का कौन सा अंग सुंदर लगता है?’’ उसने बड़े नखरे से पूछा।
मेरी नज़रों ने उसके संदली शरीर की परिक्रमा की, ‘‘कौन सा कहूँ? सिर से लेकर पाँव तक तुम सारी की सारी ही सुंदर हो। अर्श से उतरी हुई बिल्कुल कोई हूर लगती हो। तुम्हारी सुंदरता देख कर किसी भी व्यक्ति (आदमी) का तुम्हें भरी भराई को एक ही बार में पीने का मन करने लग जाये।’’
‘‘फिर भी तुम्हें मेरा सबसे अधिक क्या सुंदर लगता है?’’
शायद वह मेरी नीयत परख रही थी,
‘‘फलावर शो (पुष्प उत्सव) में सारे ही फूल (मनमोहक) मनभावन होते हैं। जब कोई व्यक्ति ऐतिहासिक वस्तुओं की प्रदर्शनी देखने गया होता है तो उसके लिये यह फैसला करना कठिन होता है कि किस ऐतिहासिक वस्तु की अधिक महत्व है। मैं क्या कहूं, तुम्हारा कौन सा अंग सुंदर है, कौन सा नहीं?’’
‘‘तुम डायलाग बहुत खूबसूरत बोलते हो।’’
‘‘मैं रोमांस और ऐकशन भी बहुत बढ़िया करता हूं। कभी मौका दे कर देखो।.... डीयर! मुझे तो यहाँ आकर ऐसे लगता है जैसे मैं कोई सपना सा देख रहा हूं।... मैं जब भी कभी जहाज़ में बैठता हूं तो एक विचार हमेशा मेरे दिमाग में आता है कि जहाज़ उड़े और आसमान में जाकर क्रैश हो जाये। सब सवारियां (यात्री) मर जायें और मैं पैराशूट द्वारा पृथ्वी पर सही सलामत पहुँच जाऊँ। जहाँ जाकर मैं लैंड करूं, वहां केवल सुंदर-सुंदर स्त्रियां ही हों और मैं अकेला मर्द रहूँ, कोई अरब का देश या जन्नत जैसी जगह हो। मैं हसीन स्त्रियों के बीच में दिन रात घिरा रहूं। मुझे ऐसा लगता है कि जैसे जागती हुई आंखों से देखा हुआ मेरा वह सपना आज साकार हो गया है।’’
‘‘सरेआम नग्न स्त्रियों को पहली बार देख रहे हो?’’
‘‘हां ना नहीं... हां हा! नहीं बहुत से स्ट्रिपटीज कल्ब देखे हैं। लेकिन मैं वहां कम ही जाता हूं। ज्वव उनबी दनकपजल पे ं जनतद वििण् म्ेचमबपंससल प िंसस जींज सिमेी पे वद वदम चमतेवदण् (हद से अधिक नग्नता देखने से व्यक्ति की उत्तेजना मर जाती है।)... वैसे मुझे लगता है कि यह सरेआम निरवस्त्र होने वाला आईडिया तुम लोगों ने हमारे इण्डिया से चोरी किया है। हमारे वहां नंगे साधु होते हैं। वे कहते हैं जैसे इस दुनिया में आये हैं। उसी अवस्था में जीवन व्यतीत करें। उनका मत है कि नग्न रहने से काम से ऊपर उठ कर ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है। लेकिन....।’’
उसने मुझे बीच में ही टोका, ‘‘लेकिन क्या?’’
‘‘लेकिन उन नंगे साधुओं को देखकर आदमी के शरीर पर वह चींटियां सी नहीं काटती, जो तुम मेमों (गोरियों) को देख कर शारीरिक अंगों पर रेंगने सी लग जाती हैं।... अच्छा बल्लिये! एक बात बता, तू इस प्रकार वस्त्रहीन होकर समंदर किनारे लेटी पड़ी है। तुझे वस्त्र उतारते हुये शर्म नहीं आई थी?’’
‘‘जब शर्म ही उतार दो, तो फिर वस्त्र उतारते हुये शर्म नहीं लगती। शर्म और नथ पहली बार उतारते हुये ही झिझक होती है। फिर तो आदत पड़ जाती है और यह साधारण प्रक्रिया लगने लग जाती है।... अमेरिकन अभिनेत्री मार्लिन मुनरो अपने समय की सब से बड़ी सैक्स सिंबल मानी जाती थी। बंबशैल मुनरो ने कहा था, ष्ज्ीम इवकल पे उमंदज जव इम ेममदए दवज ंसस बवअमतमक नचण्ष्
‘‘हां, यह तो है। हुस्न आंखों से टकराने के लिये होता है, ढांपने के लिये नहीं।’’
‘‘नग्नता अपने आप में एक लिबास है। जिसे जीवित प्रेमी या मुर्दे पहना करते हैं। लाज रहित होकर निर्वसत्र होना तुम्हारी मासूमियत प्रकट करता है। मैं तो कहती हूं कि तुम भी उतार कर दूर फेंक दो कपड़े। आओ हम इक्ट्ठे धूप सेकते हैं? दिलचस्प आदमी लगते हो तुम। बस मन में यह भावना पैदा कर लो कि तुम्हें कोई नहीं देख रहा।’’
‘‘नहीं यार यहां तो बहुत शर्म लगती है। फ्रैंडो पेसोआ ने अपनी किताब ‘बुक आॅफ डिसकुआईट में लिखा है ष्ज्ीम इमंनजल व िं दंामक इवकल पे मिसज वदसल इल जीम कतमेेमक तंबमेण्ण्ण्श् जब कपड़े अभी नहीं बने थे तब आदि मानव नंगे ही रहते थे। नग्नता सत्य और वस्त्र धारण करना झूठ है।’’
‘‘लेकिन विलियम ब्लेक लिखता है, ।तज बंद दमअमत मगपेज ूपजीवनज छंामक इमंनजल कपेचसंलमकष्
उसके इन वाक्यों ने मेरे होठों पर ताला लगा दिया था। मैं हैरानी से उसकी आँखों में देखने लगा। उसने अपने पास पड़ी लाल वाईन की बोतल उठाई और ढक्कन खोल कर बड़ी सी घूंट भर ली। भरी हुई घूंट के साथ उसका मुंह अभी फूला हुआ ही था और वाईन भीतर उतारते हुये बोतल मेरी तरफ की। उसकी गोरी अनछूई गर्दन में से लाल वाईन (शराब) मुझे नीचे तक जाती दिखाई देती थी। 
‘‘ले घूंट पी। दिलेरी और हौंसला आ जायेगा। हिम्मती बन। पकड़... बग्गा शेर बनकर खींच जा।’’
‘‘थैंकस, बॅट नो थैंकस! हौंसले तो मेरे वैसे ही बहुत बुलंद रहते हैं’’
‘‘इसका मतलब मैं सुंदर नहीं।’’
‘‘क्यों? यह मैंने कब कहा है?’’
‘‘सुंदर स्त्री तो मर्द को ज़हर दे दे तो आदमी दूसरी बार सोचता नहीं, पीने की करता है। यह तो फिर भी शराब है।’’
‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। मुझे पीने से मेरे डाक्टर ने मना किया हुआ है। वरना मैं कहां ढील करने वाला था। और फिर मेरा पीना बहुत बुरा है। पीने के बाद मैं शोर डाल देता हूं।’’
‘‘शोर? किस प्रकार का शोर?’’
मैंने गहरा सांस लिया था, ‘‘मैं तो कौन सा शेर डालता हूं। असली शोर तो मेरा गोती (समान गोत्र वाला) पटियाले वाला महराजा भूपा (भूपेंद्र) यहां 1911 में ब्राईटन आकर डाला करता था। हिज़ हाईनैस अधीराज महाराजा भूपेन्द्र सिंह सिद्धू बहादुर ;ळब्ैप्ए ळब्प्म्ए ळब्टव्ए ळठम्द्ध वलिये रियासत पटियाला, बीसवीं सदी में यूनाईटिड किंगडम से हवाई जहाज़ खरीदने वाला पहला भारतीय हुआ था। पटियाला में उसने जहाज़ के चढ़ने और उतरने के लिये विशेष मार्ग पट्टी भी बनवाई हुई थी। महाराजा खेलों का शौकीन और क्रिकेट का बढ़िया खिलाड़ी था। चैल, हिमाचल प्रदेश (शिमल से 49 कि. मी. दूरी पर स्थित नगर) में उसने क्रिकेट खेलने के लिए दुनिया की सबसे बुलंद पिॅच 1893 मंे बनवाई थी, जो 2443 मीटर की थी। पोलो खेल को उत्साहित करने में भी महाराजा भूपेन्द्र सिंह का नाम सबसे पहले लिया जाता है। चैल में बनाये महल को वह अपनी अय्याशी के केन्द्र के तौर पर गर्मियों में प्रयोग करता था। चाहे पाँच या तीन पत्तियों वाली पोकर हो या काम का खेल, तुम गोरियों के साथ खेलने का पूरा शौकीन था। रीयल स्पोर्टसमैन था वह। महाराजा भूपेन्द्र सिंह ने दस विवाह करवाये थे। उसके 88 बच्चे पैदा हुये थे और जिनमें से 53 जिन्दा (जीवित) है। महाराजा की चार पत्नियां तो हिमाचल प्रदेश की सगी बहनें थी। पंजाब का भूतपूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह उसका पोता है। महाराजा की पत्नी बखतवर कौर ने मलिका मैरी को 1911 में दिल्ली दरबार में बेहद कीमती पटियाला शाही हार तोहफे के तौर पर भेंट किया था।’’
‘‘अच्छा? बहुत दिलचस्प इन्सान था तुम्हारा महाराजा। कुछ और बताओ उसके बारे में?’’
लाश की भांति लेटे हुये गोरे गोरियों को देखकर मुझे प्रथम विश्व युद्ध याद आ गया। प्रथम विश्व युद्ध में अंगे्रजों की सहायता के लिये पटियाला के महाराजा भूपेन्द्र सिंह सिद्धू ने अपनी रियासत के 10080 सैनिक दिये थे। फिर जब महाराजा 1921 में इंग्लैंड आया था तो अंगे्रजों ने उसकी खातिरदारी करने के लिये ब्राईटन का राॅयल पबीलियन महल खाली कर दिया था। कई महीने महाराजा भूपेन्द्र सिंह ब्राईटन के इस सागरीय तट पर रास-रंग की महिफलें लगाता रहा था। महाराजा भूपेन्द्र सिंह सिद्धू के बारे में सोचते ही उसकी जिन्दगी के कई अहम कांड मेरे दिमाग में घूमने लग गये थे, ‘‘महाराज भूपेन्द्र सिंह ने इस न्यूट्स बीच को देखने के बाद अपनी अय्याशी के लिये पटियाला जाकर लीला भवन बनाया था। बारांदरी बाग के निकट भूपेन्द्र नगर की तरफ जाती सड़क पर बना यह महल एक प्रकार का अजूबा ही था। उसके भीतर जाने के लिये केवल एक मार्ग ही था और मुख्य द्वार पर बड़े सारे लोहे के गेट लगे हुये थे। गेट पार करते हुये अगला रास्ता डं्रम (भूल-भूलैया) जैसा टेढ़ा-मेढ़ा था ताकि कुछ गजों से आगे कुछ भी स्पष्ट दिखाई न दे। इस की चार दीवारी की दीवारें टेढ़ी-मेढ़ी और तीस फुट ऊँची थी। बाहर से भीतर देख पाना असंभव बनाने के लिये सफैदा एवं अन्य ऊँचे एवं घने वृक्ष लगाये गये थे। आगे जाकर शाही बाग में से गुजरते हुये महल में दाखिल हुआ जाता था। महल में अनेकों शयन-कक्ष (सोने के लिये कमरे) थे। सब आहला (विशेष) किस्म के हीरे-मोती जड़े गलीचों और विदेशी यूरोपीयन फर्नीचर से सजे हुये थे। महल के अंदर राजा की रानियाँ और रखैलेें निर्वस्त्र घूमा करती थी और जब दिल करता था, तब महाराजा मनमर्ज़ी की स्त्री को पकड़ कर भोग विलास कर लेता था।’’
उस ने जिज्ञासा प्रकट की थी, ‘‘यदि उस समय किसी को पीरियडज़ (मासिक धर्म) आये होते हों, तो फिर महाराजा क्या करता था?’’
‘‘जिन स्त्रियों को मासिक धर्म होता था या बिमार होने के कारण सैक्स करने में असमर्थ होती थी, उन्हें हिदायत होती थी कि उन्हें बाल खुले छोड़ कर महल में घूमना होता था। यह महाराजा के लिये संकेत होता था। ऐसी अवस्था में वह अन्य किसी को दबोच लेता था। बहुत थी उसके हरम में... वहाँ कौन सा कोई एक थी।’’
‘‘अच्छा फिर तो वह सारी जिंदगी वासना में डूबा रहा होगा? उसने और कोई काम नहीं किया होगा?’’
‘‘हाँ, था तो कुछ इसी तरह ही। महाराजा का रियासत के कार्यों में ध्यान कम और वासना में अधिक रुचि देखकर उसके प्रीवी-पर्स अफसर कर्नल गुरदयाल सिंह ढिल्लों ने सलाह दी कि महाराज रखैलें जल्दी बदल लिया करो। एक ही किस्म की स्त्रियों के साथ संभोग (काम-क्रीड़ा) करते-करते आप बोर (ऊब) हो जाओगे। उसने तो यह इस लिये कहा था कि महाराजा दिन-रात सैकस करके ऊब जायेगा और उसका ध्यान अन्य कार्यों की तरफ चला जायेगा। लेकिन महाराजा बात उल्टी ले गया था। साल में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं। उसने तीन सौ पैंसठ स्त्रियाँ हरम में पूरी कर लीं और साल के बाद एक रात के लिये हरेक की बारी आती थी। इस लीला भवन में एक ‘लव चैंबर’ नाम का विशेष कक्ष (कमरा) था। महाराजा अधिकतर बिस्तर की कुश्तियाँ यहीं लड़ता था। इस कमरे की दीवारें अनेकों काम उत्तेजित तस्वीरों से भरी पड़ीं थी। इसमें विलास हेतु एक झूला भी लगा हुआ था, जिस पर संगिनी के साथ झूलते हुये महाराजा अनेकों आसनों के अलौकिक तजुर्बे किया करता था। इस महल के बाहर एक विशेष स्वीमिंग पूल था। जिसमें डेढ़ सौ व्यक्ति एक ही समय में तैर सकते थे।  हर रोज़ शाम को देर रात तक चलने वाली मदिरा पार्टियां इसी पूल के किनारे आयोजित की जाती थी। महीन पारदर्शी सूट पहन कर स्त्रियां दारू और भोजन परोसती थी। पचास-साठ महाराजा की पसंद की स्त्रियाँ इतर (सेंट) के साथ शरीर को महका कर सुगंधित पानियों में तैरती रहती। गर्मियों में तालाब के पानी को ठण्डा रखने के लिये बर्फ की बड़ी-2 ईंटें डाल दी जाती। अत्यंत गर्मी में भी इस पूल का पानी नाॅर्थ पोल की भांति ठण्डा होता था। सारी रात धीमे स्वर में रस भरा संगीत बजता रहता और महाराजा भोर होने तक अपनी रखेलों और रानियों के साथ पानी में जल-क्रीड़ा करता रहता था। जो भी यूरोपियन या अमेरिकन सुंदरी एक बार महाराजा के साथ इस तालाब में तैर लेती थी फिर वह अपनी दस सहेलियों को लीला भवन में भेजा करती थी।’’
‘‘तुम्हारी बातें सुन कर तो मेरा तो खुद लीला भवन में जाने का मन करता है।’’ ‘‘टिकी रह। ज्यादा ऐक्साईटिड मत हो। अब न तो पटियाला में भूपा रहा है और ना ही उसका भवन। बातों का हलवा बनाना मेरा पेशा है। मेरी हर बात को सच ही समझती मत चली जा।’’
‘‘फिर यूं ही मुझे इतने समय से गर्म किये जा रहे हो? मेरे भीतर तो ज्वारभाटा लाकर रख दिया, भूपे के किस्से सुना कर, साली खलबली सी मच गई है तन-बदन में।... वह सामने मरीना ड्राईव पे मेरा होटल है। होटल चलते हैं।.... अरे हाँ, हमने एक दूसरे का नाम तो पूछा ही नहीं.... मेरा नाम नैटली और तुम्हारा?’’
‘‘राज कह सकती हो मुझे।... शेक्सपीयर रोमियों एण्ड जूलियट नाटक में लिखता है, ‘‘वट लाईज़ इन ए नेम। गुलाब को गेंदा कह दें तो उसकी सुगंध में फर्क नहीं पड़ता?’’
नैटली ने उत्तेजित नज़रों से मेरी तरफ देखा, ‘‘तुम्हारे होंठ बहुत सुंदर हैं, राज।’’
‘‘मुझे मालूम है। बहुत सी लड़कियों ने मुझे यह काॅम्पलीमैंट दिया है।’’ मैं ससुराल जाने का नाम सुन कर मस्ती खाये बंदर की भांति मुस्कुराया।
‘‘तुम्हारी गालों में पड़ते डिंपल (गड्डे) बहुत सुंदर लगते हैं।’’ उसने मेरी बाईं गाल से चिमटी (चूंटी) भरी।
समझदार को इशारा काफी होता है, मैं उसके मन की बात बूझ गया था। नैटली की एवरेज लुक थी। ना सुंदर ना कुरूप। वैसे समझदार लोग कहते हैं कि मुफत की घोड़ी के तो वैसे भी दांत नहीं गिनने चाहिये। मैंने उसे सिर से लेकर पांव तक ध्यान से देखा, ‘‘चल आजा चलें फिर।’’
उसने अपने लेटने के लिये बिछाया कपड़ा उठा कर वस्त्र पहने। उसका सारा सामान उसके बैग में डालकर हम वहां से चल पड़े।....
फूल जैसा हल्का होकर मरीना होटल में से निकल कर मैंने साधारण समुद्र की तरफ देखा। मुझे थोड़ी सी थकावट महसूस हो रही थी। न्यूट्रस बीच के माथे पर ही मरीना ट्रेन स्टेशन है। जहाँ से पुरातन किस्म की छोटी सी सैलानी रेल चलती है, जो शहर में समंदर के किनारे-2 एक छोर ब्राईटन मरीना से ब्लैक राॅक तक से दूसरे छोर तक सैलानियों (यात्रियों) को ले जाती है। 4 अगस्त 1883 वाॅलकस रेलवे की तरफ से चलाई गई यह दुनियां की सब से पुरानी बिजलई (विद्युत) सैलानी रेल सेवा है।
नवीन सृजनात्मक इतिहास को संभालने के लिये उतारी तस्वीरें मैंने अंगुली मार कर आई फोन फोर एस में से देखी तो जिस्म में नवीन जोश संचार करता हुया महसूस हुआ। मैं रेल की पटरी के साथ-साथ शहर की ओर तेज़ कदमों से चल पड़ा। मेरे दाईं तरफ दुकानें और बाईं तरफ वालीबाल, टेबल टेनिस और गोल्फ खेलने के लिये कोर्ट बने हुये थे। जगह-2 साईकिल किराये पर देने वालों के खोखे भी बने हुये थे। मैं ब्राईटन वील (चंडोल) के पास से होते हुये राॅयल पबीलियन महल की तरफ सीधा चल दिया। इस हिंडोले को शहर के मध्य में मैट्रोपोल होटल के निकट लगाया जाना था ताकि इस के ऊपर बैठ कर सारे शहर का नज़ारा देखा जा सके। लेकिन इसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया था। खास करके बीच पर खोखे और दुकान वालों ने, क्योंकि इसके साथ उनके व्यापार पर बुरा असर पड़ता था। इस लिये साऊथ अफ्रीका में बने इस ब्राईटन वील को अकतूबर 2011 में ब्राईटन मरीना पैलेस और पीयर (घाट) के समीप लगा दिया गया था।
ब्राईटन वील से आगे निकल कर मैं दाईं तरफ सड़क पार करने ही लगा था कि रास्ते में मुझे एक चायनीज़ (चीनी) लड़की ने रोक लिया। उसे अपनी तरफ हसरत भरी नज़रांे से देखते हुये देख कर मैं अपने भीतर कुछ ज्यादा ही खुशकिस्मत होने की खुशफहमी पाल बैठा था। दरअसल मेरे मन में एक भ्रम सा है कि जिन सिद्धुओं को नाम अंगे्रजी के बी ;ठद्ध अक्षर से शुरू होते हैं, उनके अंगे्रजी और पंजाबी वाले दोनों लक (अंगे्रजी लक अर्थात् किस्मत और पंजाबी लक अर्थात् कमर और उसके नीचे वाला हिस्सा) ब अक्षर से शुरू होने वाले स्थानों पर जाकर अधिक चलने लग जाते हैं। मेरा यह वहम तब पक्का हो गया था, जब मैं कुछ समय बैलज़ियम के ब्रुज शहर में रहा था। बलराज, बैलजियम और बू्रज। इसी लिये मैं इंग्लैंड का ब्रमिंघम शहर नहीं छोड़ रहा हूं। अंगे्रजी के बी अक्षर से ही भूपेंद्र सिंह और बी अक्षर से ही ब्राईटन बनता है।
जल्दी में होने के कारण मैंने उस चीनी लड़की का नंबर लेने के लिये जेब में से फोन निकाला ही था कि उसने मुझे बताया कि वे बाईबल सोसायटी की तरफ से मुफत में सैंडविच बाँट रहे थे। प्रत्येक रविवार वे ब्राईटन समंदर के किनारे पचास हज़ार सैंडविच मुफत में बांटते हैं। मुझे भूख न होने के कारण मैंने मना कर दिया। लेकिन उसने अपने मिशन के बारे में बता कर सैंडविच लेने के लिये तैयार किया। मैं मान गया और उससे टयूना मछली वाला सैंडविच ले लिया। सैंडविच और उसके साथ मिले टिशू पेपर पर बाईबल के संदेश छपे हुये थे। मैंने एकाग्र होकर संदेश पढ़े और वहां से चल पड़ा। आगे गलों में टोकरियां और ईसा मसीह के काल वाला पहरावा (वस्त्र) पहने और बहुत से लड़के-लड़कियां सैंडविच और तरल पदार्थ बांट रहे थे। मुझे बाईबल सोसायटी का यह प्रयास सिक्खों के लंगर से एक कदम आगे लगा। हम सिक्खों का लंगर तो कोई भी व्यक्ति गुरुद्वारे में जाकर ही छकेगा। ये लोग लंगर को लोगों तक ले कर गये हैं। हमारे लंगर के साथ गुरुबाणी का कोई संदेश नहीं होता। हां, निहंग बरछे उठाकर लंगर की मर्यादा अवश्य समझाने लग जाते हैं। पैदल चलते हुये मेरे दिमाग में अनेकों प्रश्न कलाबाजियाँ मार थे।
मैंने अपनी कहानी ‘प्रथम भगौती सिमर के’ में एक संवाद लिखा था, मेरा पात्र कहता है, ‘‘राज्य तलवारों और धर्म प्रचारों के साथ फैलते हैं।’’ सिक्खों को तंग सोच के कारण अब तक प्रचार करना नहीं आया। सिक्खों के पास कोई नीति या कोई मनसूबाबंदी नहीं है। उतने सिक्ख नहीं जितने हम शहीद पैदा किये बैठे हैं। फिर भी सिक्ख मत फैलने के बजाय सिकुड़ता जा रहा है। गुरु गं्रथ साहिब का कोई संदेश टिशू पेपर पर छाप कर तो देखो। उसी समय पंथ का मसला बन जायेगा। जिन्होंने सर को हवा लगवा कर नहीं देखी होती और ऐसे कहलाने वाले रात को भी पगड़ी बांध कर सोने वाले लाईसेंसी सिक्ख तालिबान फेसबुक पर फतवे देने शुरू कर देंगे।
महाराजा रणजीत सिंह के जीवन पर मुकेश खन्ना को लेकर बी.आर. चोपड़ा सीरियल बनाना चाहते थे। सिक्खों ने विवाद खड़ा कर दिया। चोपड़ा ने सोचा ‘‘मुझे क्या लेना है अन्य विष्य कम हैं क्या सीरियल बनाने के लिये।’’ कह कर प्रौजेकट वहीं छोड़ दिया। इसाई तो अपने इतिहास को आँखों के समक्ष ला कर खड़ा कर देते हैं। इनके प्रचारक लोगों के घर जाकर प्रचार करते हैं। एक इन्सान अपने जीवन में पांच प्रकार की भूखों के साथ जूझता है। इनमें से सब से अहम पेट की भूख होती है। दूसरे नंबर पर तन की भूख, फिर धन की भूख, उसके बाद शोहरत की भूख और अंतिम मन की भूख होती है। बाकी की भूखें पूरी करने के पश्चात् ही इन्सान मन की भूख मिटाने के काबिल बनता है।
फ्रांस की गलियों में फटे हुये कपड़े पहने हुये, नंगे पाँव बेकरी के सामने खड़ा एक बालक बेकरी में पड़ी ब्रैडों की तरफ लालच भरी नज़रों से देख रहा होता है। जब उसे वहाँ उसी अवस्था में खड़े हुये काफी देर हो जाती है तो दुकानदार आवाज़ देकर उसे अपने पास बुलाता है और कहता है, ‘‘क्या कर रहे हो यहां? चोरी करने की स्कीमें बना रहा था?’’
‘‘नहीं, चोरी करनी होती तो कब का करके दौड़ जाता। मुझे बहुत भूख् लगी हुई है और गरीब होने के कारण ब्रैड खरीदने के लिये मेरे पास सिक्के नहीं है। मैं ब्रैड की तरफ देख-देख कर ही अपना पेट भर रहा हूं। जब पेट भर गया तब मैं यहाँ से चला जाऊंगा।’’
उस बच्चे की यह बात सुनकर दुकानदार उसे ब्रैड दे देता है और वह बच्चा ब्रैड खाते हुए, वहां से चला जाता है। कई वर्ष बीत जाते हैं। उसी बेकरी के सामने आकर एक छह घोड़ों वाली बग्घी रुकती है। अब उस बेकरी का मालिक बहुत वृद्ध हो चुका होता है, और बेकरी भी काफी खस्ता (बुरी) हालत में होती है। वहां ग्राहक भी नामात्र ही आते हैं। बग्घी में से वही बच्चा उतरता है जो कि बड़ा होकर नैपोलियन बोनापार्ट बन चुका होता है।
नैपोलियन अपने सिपाहियों के इशारा करता है और वे सिक्कों से भरी बोरियां उठा कर बेकरी के अंदर ढोने लग जाते हैं। बेकरी का बूढ़ा मालिक उन्हें रोक कर पूछता है कि वे कौन हैं और यह क्या कर रहे हैं?
नैपोलियन आगे बढ़ कर उस वृद्ध को उत्तर देता है, ‘‘बाबा, मैं वहीं गरीब बच्चा हूं, जिसे आपने कई वर्ष पूर्व मुफत में खाने के लिये बै्रड दी थी। उस ब्रैड की कीमत और उसका आज तक का जो ब्याज बनता है। मैं वह अदा करने आया हूं। आपने मेरी एक दिन की भूख मिटाई थी। मैं आपकी आने वाली तमाम जिंदगी की भूख मिटा कर चला हूं।’’
बेकरी वाले बुजुर्ग की आँखों में आँसू आ जाते हैं और वह आशीर्वाद देता है, ‘‘जा बेटा, दुनिया का इतिहास सुनहरी अक्षरों में तुम्हारा नाम दर्ज करके संभाल कर रहती दुनिया तक याद रखेगा। मेरी यादों के भंडार में तुम रोज़-ए-हशर याद रहोगे।’’
बाईबल सोसायटी वालों ने भी भूख के महत्व को समझते हुये, हवस और जिस्मों की भूख पूरी करने आये लोगों की पेट की भूख पूरी करके अपना संदेश फैलाने का सराहनीय प्रयास किया हुआ था। बीच से केवल दो मिंट की पैदल दूरी पर राॅयल पबीलियन महल है। मैं पार्क में से गुज़रता हुआ महल के सामने पहुंच गया। मैं राॅय पबीलियन महल के बिल्कुल सामने खड़ा था और मेरे सामने उस समय का मुख्य द्वार (जो अब आम जनता के लिये बंद किया गया है, था) इसे साउथरन गेटवे कहते हैं। महाराजा पटियाला भूपेन्द्र सिंह जब ब्राईटन आया था तो उसके लिये राॅयल पबीलियन महल का साउथरन गेटवे द्वार विशेष तौर पर बनाया गया था। साउथरन गेटवे के आगे खड़े होकर मैंने कुछ तस्वीरें खिंचवाई और महल के सामने वाले बगीचे के बीच में से होते हुये दाईं तरफ ब्राइटन म्यूज़ियम एण्ड आर्ट गैलरी की तरफ चला गया।
म्यूज़ियम में से मैं ब्राईटन के बारे में कुछ ऐतिहासिक जानकारी इक्ट्ठी करके बाहर निकला और सामने दाईं तरफ रायल पबीलियन महल के पिछले दरवाज़े की तरफ चला गया। राॅयल पबीलियन के मुख्य द्वार के पास जार्ज चतुर्थ का विशालकाय बुत भी लगा हुआ है। यह दरवाजा सैलीनियों के लिये महल के भीतर जाने का एक ही मार्ग है। काऊंटर से साढ़े दस पौंड की टिकट लेकर मैं आगे बढ़ा तो वहां खड़ी एक कर्मचारी लड़की ने मुझ से पूछा कि मैं कौन सी भाषा बोल या समझ सकता हूं?
आपके द्वारा बताई गई भाषा पर वह इलैकट्रानिक गाईड को सैट करके नीले रंग का छोटा सा ट्रांजिस्टर जैसा यंत्र आपको पकड़ा देती है। इसे पोर्टेबल गाईड कहते हैं। यह देखने में मोबाईल जैसा लगता है। ऊपर स्क्रीन जिस पर वीडियो और तस्वीरें आप देख सकते हो, उसके नीचे के हिस्से पर कीपैड होता है। महल के हर कमरे को एक-दो, तीन करके भिन्न-भिन्न नंबर दिये गये हैं। आप जिस कमरे में जाते हो वहां जाकर पोरटबल गाईड में कमरा नंबर टाईप कर दो और गाईड को कानों से लगा लो। गाईड उस कमरे के बारे में रिकार्ड की हुई जानकारी आपको सुना देगा। महल में पड़ी हुई सभी वस्तुओं पर भी नंबर लिखे हुये हैं। जैसे कि सबसे पहला कक्ष (कमरा) स्वागत हेतु है। इस कक्ष का नंबर एक है। इसमें एक बड़ा प्यानो पड़ा है, उसके उपर भी एक नंबर लिखा हुआ है। जब आप प्यानों का नंबर गाईड में डालते हो तो गाईड आपको प्यानो के इतिहास से संबंधित सारी जानकारी दे देता है। महल के भीतर मोबाईल फोन का प्रयोग एवं तस्वीरें खींचने की सख्त मनाही है। मनाही वाले काम करने में मुझे अधिक मज़ा आने के कारण मैंने वहां पर तस्वीर खींच ली। गुप्त कैमरों में से देखकर सिक्योरिटी वाले झट (जल्दी) से भीतर आ गये और बड़े प्यार से उन्होंने मुझे फोटो डिलीट करने के लिये कहा और मैंने उन्हें दिखाकर फोटो उड़ा दी।
किसी समय ब्राईटन का रायल पबीलियन महल ब्रतानवी शासकों के लिये छुट्टियाँ बिताने का आवास स्थान होता था। इस का निर्माण 1787 में आरंभ होकर तीन पड़ावों में पूर हुआ था। भारतीय, साईरैनिक (सीरिया और अरब) एवं चीनी इमारतसाज़ी (भवनकला) की तर्ज़ पर बनाई गई यह इंग्लैंड की एक ही इमारत है। इसकी बाहरी दिखावट इस्लाम का प्रभाव दर्शाती है और आंतरिक सजावट एवं साज़-ओ-सामान चीनी कला से प्रभावित है। पिं्रस आॅफ वेल्ज़ (जो बाद में राजा जार्ज़ चतुर्थ बन कर प्रसिद्ध हुआ) इक्कीस वर्ष की आयु में 1783 में पहली बार ब्राईटन आया तो यहां की खूबसूरती पर मोहित हुये बिना नहीं रह सका। उसके चाचा कमबरलैंड के डयूक शहजादा हैनरी अफसर ब्राईटन में ही रहा करते थे। क्योंकि उनके पैर पर हुये कोहड़ के इलाज के लिये वैद्यों-हकीमों ने उसे ब्राईटन सागर के कुदरती खारे पानी को पीने और नहाने के लिये प्रयोग करने की सलाह दी थी।
लंदन दरबार की नज़रों से चोरी एकांत में रंगरलियां मनाने के मकसद के साथ जार्ज चतुर्थ अकसर ब्राईटन आया करता था। यहीं पर बादशाह चतुर्थ ने अपनी रखैल मारीआ फिटजहरब के साथ अनेकों वर्ष तक दुनियां से चोरी अय्याशी की उसने गुप्त विवाह करवाया था। लेकिन जब यह भेद खुला थ तो मारिआ के रोमन कैथोलिक बेगाने संप्रदाय के साथ संबंध होने के कारण शाही परिवार ने रायल मैरिज़ एक्ट 1772 के मुताबिक इस शादी का अस्वीकार कर दिया था।
मारीआ फिटज़हरबर्ट, टाँग (सरौपशयर इंग्लैंड) में पैदा हुई सुंदर युवती थी। कहा जाता है कि उसकी आंखे भूरी, रेश्मी जुल्फें और नाक तीखी तलवार जैसी थी। वह इतनी हसीन थी कि उसे देखते ही व्यक्ति घायल हो जाया करता था। ‘मनुष्य भक्षणी’ उसके बारे में प्रसिद्ध हो गया था। वह एकटन बूरनल, सरौपशायर के तृतीय (तीसरे) बैरनट सर जाॅन सिनथै की पोती और विलियम सिनथे और मैरीएन इरिंगटन की सबसे बड़ी लड़की थी। पैरिस के कानवैंट स्कूलों से उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। मरीआ सिनथे की पहली शादी उससे सोलह साल बड़े ललवर्थ किले के अमीर कैथेालिक मालिक एडवर्ड वैल्ड के साथ जुलाई 1775 में की थी। वैल्ड की घोड़े से गिर कर, शादी से तीन महीने बाद ही मृत्यु हो गई थी। वैल्ड की सारी संपत्ति उसके छोटे भाई ने छीन ली और तीन वर्ष बाद मारीआ से पीछा छुड़वाने के लिये उसे थाॅमस फिटज़हरबर्ट के साथ ब्याह दिया था।
थाॅमस फिटज़हरबर्ट, मरीआ से दस वर्ष बड़ा था। उनके यहां एक लड़का पैदा हुआ लेकिन छोटी आयु में ही गुज़र गया। 7 मई 1781 को मारीआ फिटजहरबर्ट दोबारा विधवा हो गई थी। उसका पति उसके लिये एक हज़ार पौंड की धनराशि और टाऊन हाऊस, पार्क-स्ट्रीट, मेयफेयर वाली हवेली छोड़ गया था। निराश होकर मारीआ फिटजहरबर्ट ने शराब और जूए में खुद को डुबो लिया था और वह उच्च वर्ग की महिफलों का आनंद प्राप्त करने लग पड़ी थी।
मारीआ फिटजहरबर्ट का काम के प्रति विशेष आकर्षण था और वह नवयुवकों को नगद धन राशि और गहने इत्यादि देकर कई-कई रातों के लिये अपने घर पर रखकर भोग-विलास करती थी। 1784 की बसंत ऋतु में जब मारिया फिटज़हरबर्ट को छह वर्ष छोटे वेल्ज़ के शहज़ादे और भविष्य के बादशाह जाॅर्ज से मिलाया गया तो वह देखते ही शहज़ादे पर मर मिटी और उसने बिना देरी किये उससे हमबिस्तर होने की पेशकश कर दी थी। इतिहासकार लिखते हैं कि पहली बार अठरह (18 घंटे) घंटे लगातार मारीआ फिटज़हरबर्ट ने शहज़ादे को बिस्तर में से गर्दन नहीं निकालने दी थी। शहज़ादा मारीआ फिटजहरबर्ट के साथ विवाह करवाने के लिये पागल हो गया था। जब तक मारीआ फिटज़हरबर्ट ने हां नहीं की थी, तब तक शहज़ादे ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। 15 दिसंबर 1785 को दोनों ने गुप्त विवाह मारीआ फिटज़हरबर्ट के घर, लंदन में करवा लिया था। मारीआ फिटज़हरबर्ट के चाचा हैनरी इरिंगटन और उसका भाई जैक सिनथे गवाह और मेहमान थे। पादरी राबर्ट बर्ट को विशेष तौर पर इस कर्य हेतु शहज़ादे ने जेल में से रिहा करवाया था।
इस शादी के लिये बादशाह जार्ज तृतीय और पिरवी कौंसिल की मंजूरी न ली होने के कारण इसे गैर-कानूनी ऐलान कर दिया गया था। एक्ट आफ सैटलमेंट 1701 के अनुसार इस विवाह के गैर कानूनी सिद्ध होते ही जार्ज चतुर्थ का राजगद्धी से हक खत्म होता था। इस समस्या का हल करने के लिये शहज़ादे के छोटे भाई शहज़ादा अगसटस फ्रैडरिकने जार्ज की शादी लेडी अगस्टा मूरी के साथ 1793 में करवा दी थी। जिससे शहज़ादा जार्ज के दो बच्चे भी हुये थे। शहज़ादे द्वारा अय्याशियों में बहुत अधिक धन बर्बाद करने के कारण, उसके सर पर बहुत कर्ज़ा चढ़ा हुआ था। इन कर्ज़ों को उतारने के लिये शहज़ादे जार्ज़ ने बरनस्विक की डचेज़ कैरोलाईन के साथ 8 अप्रैल 1795 में शादी कर ली थी और इस विवाह के एक वर्ष पश्चात् राजकुमारी शारलट का जन्म हुआ था। इस विवाह में मिले दाज-दहेज के साथ शहज़ादे ने अपने कजेऱ् उतारे थे।
शादियों के बाद भी शहज़ादे ने मारीआ को मिलना नहीं छोड़ा था। इस रिश्ते के परिणामस्वरूप मारिआ की कोख से एक पुत्र जेमज़ ओर्ड भी पैदा हुआ था। मारीआ से शहज़ादे का मोह-भंग करने के लिये शहज़ादे को और अन्य औरतें उपलब्ध करवाई जाती थी। राॅयल-पबीलियन महल के पिछवाड़े ही कुछ दूरी पर अस्तबल बनवाया गया था। अस्तबल से रायल-पबीलियन महल को एक सुरंग बनी हुई है, जो सीधी जाकर शहज़ादे के शयन-कक्ष (सोने के कमरे) के साथ बने कमरे में जाकर निकलती है। शहज़ादे के शयन-कक्ष के दायें एवं बायें दो कमरे बने हुये हैं, जिनके गुप्त द्वार शहज़ादे की आरामगाह में ही खुलते हैं। इन दरवाज़ों द्वारा शहज़ादे की रखैलें, अभिनेत्री मैरी राॅबिनसन, गे्रस ईलियट (एक डाक्टर की विधवा), फैंसिस विलर (जरसी की काऊंटैस), लेडी हर्टफोर्ड, लेडी एलिज़बैथ कोनिघम, लेडी एन लिंडसे, अलीज़ा फाॅक्स, लेडी एलिज़बैथ लिडसे, कैंडी साहरा ब्राऊन आदि आकर शहज़ादे से मिला करती थी और सुबह होते ही बिना किसी को पता चले सुरंग द्वारा ही वापिस चली जाया करती थी। लेकिन जार्ज हमेशा अपने तकिये के नीचे मारीआ की तस्वीर रखा करता था। 26 जून 1830 को मरते वक्त बादशाह चतुर्थ की अंतिम इच्छा के अनुसार उसके गले में मरीआ की आँख की तस्वीर वाला लाॅकेट पहना कर उसे दफनाया गया था।
इंग्लैंड का बादशाह जार्ज कामुक वृति का मालिक होने के कारण उसने 17 भिन्न-2 किस्म और आकारों के तकिये बनवाये हुये थे। इन तकियों का प्रयोग वह शैय्या-सुख में बढ़ोत्तरी करने के लिये किया करता था। यह तकिये बादशाह के बिस्तर के नीचे पड़े रहते थे। जार्ज अपनी रखैल के कद और शारीरिक बनावट के अनुसार आवश्यक तकिया निकाल कर साथी स्त्री के नीचे रख कर संभोग किया करता था। इसी का अनुकरण करते हुये महाराजा पटियाला ने विशेष किस्म के गोल नीले रंग के तकियों का प्रयोग शयनसुख (सेज-सुख) प्राप्त करने हेतु आरंभ किया था। इसीलिए जाॅर्ज की रखैलें उसे तकियों वाला बादशाह भी कहती थी।
जार्ज की मृत्यु के पश्चात् शाही परिवार को मारिया के बहुत से खत प्राप्त हुये, जो जार्ज और मारिया के शादीशुदा रिश्ते को साबित करते थे। शाही परिवार ने ये सब पत्र नष्ट कर दिये थे। मारिया ने जार्ज के भाई क्लेयरेंस के डयूक (जो बाद में बादशाह चतुर्थ बना) से जायदाद और धन-संपत्ति में से अपने रिश्ते के सबूत दिखाकर हिस्सा माँगा तो शाही परिवार ने इंकार कर दिया था। इस पर मारिया ने समाचार पत्रों में शोर डालने की धमकी दी तो शाही परिवार ने झुक कर उसे वार्षिक आमदन, शाही नौकर, शाही विधवा की पदवी और ब्राईटन में विलियम पोरडन से स्टेन हाऊस, पुरातन स्टेन हवेली भी बनवा कर दी थी। जहां वह 1804 से 1837 तक अपने अंतिम समय तक रही थी। मारिया को गुप्त तौर पर शाही रिवायत के अनुसार सैंट जोहन बैपटिस चर्च, कैंप, ब्राईटन के निकट दफना दिया गया था। मारिया और जार्ज के रिश्ते पर अनेकों फिल्मों भी बनी हैं। जिन्में से वर्णनयोग्य फिल्मों के नाम इस प्रकार है:-
1. दी मैन इन गे्र (1943) मारिया की भूमिका निभाई अभिनेत्री नौरासविनबुर्नी ने।
2. ‘मिसज़ फिटजहरबर्ट’ (1947) मारिया की भूमिका निभाई अभिनेत्री जोईस होवर्ड ने।
3. ‘ब्यू बरॅमल’ (1954) मारिया की भूमिका निभाई अभिनेत्री रोज़मैरी हैरिस ने।
4. ‘दी मैडनेस आॅफ किंग जार्ज’ (1997) मारिया की भूमिका निभाई अभिनेत्री कैरोलाईन हैकर ने।
1787 में कारलटन हाऊस के डिज़ाईनर हैनरी हौलेंड को इस महल के विस्तृत निर्माण की जिम्मेवारी सौंप दी गई थी। उसने तीन मुख्य कमरों के अतिरिक्त नाश्तागृह, कुतुबगृह और भोजनालय तैयार करके दीवारों पर ब्यागो रिबैका से चित्रकारी करवाई थी। जिसमें फ्रांसीसी कला की सुर भारी थी। 1801-02 में भोजन वाला कमरा और कुछ अन्य कमरे डिज़ाईनर पीटर फै्रडरिक रौबिनसन की देखरेख में मुकम्मल हुये। 1803 में वेल्ज़ शहज़ादे जार्ज ने इस महल के चारों ओर की कुछ और ज़मीन खरीद कर यहां घोड़ों के लिये अस्तबल का कार्य विलियम पौर्टडन के सपुर्द किया और 1808 तक 60 घोड़ों का मरीन पबीलियन अस्तबल तैयार हो गया था। 1860 में अस्तबल को अखाड़ों और सांस्कृतिक इकत्रता के लिये प्रयोग किया जाने लग पड़ा और इसका नाम ब्राईटन डोम रख दिया गया था। अब इस डोम को कानफ्रैंस भवन में तबदील कर दिया गया है।
1815-1822 तक जोहन नैश ने इस महल को पुनः डिज़ाईन किया और उसका किया काम आज के मौजूदा महल के रूप में देखा जा सकता है। ब्राईटन के सीने में उतारा गया राॅयल पबीलियन महल जोहन नैश की कल्पना वाला 19वीं सदी का भारतीय भवन-कला का प्रेरक इंग्लैंड का एकमात्र शाही महल है, जिसकी बाहरी दिखावट मुगल भवन कला और आंतरिक भाग चीनी चित्रकला से प्रेरित होकर फ्रैडरिक क्रेस और चित्रकार रार्बट जाॅनज़ के हुनर की मुँह बोलती तस्वीर है।
1830 में बादशाह जार्ज चतुर्थ की मृत्यु के पश्चात् यह महल बादशाह विलियम चतुर्थ और मलिका विकटोरिया का निवास स्थान रहा है। मलिका विक्टोरिया ब्राईटन को मात्र इसी कारण पसंद करती थी, क्योंकि इसी राॅयल पबीलियन महल में ही मलिका विकटोरिया का उसके भारतीय खानसामे (रसोईये) के साथ इश्क शुरू हुआ और आगे बढ़ा था।
1850 में शाही परिवार ने रायल पबीलियन महल ब्राईटन के लोगों को 53,000 में बेच दिया था। राॅयल पबीलियन का भीतरी एवं अधिकतम फर्नीचर बेच दिया गया था या लंदन ब्रमिंघम महल और विंनसडर किले को भेज दिया गया था।
प्रथम विश्व युद्ध के समय रायल पबीलियन को घायल सैनिकों के इलाज के लिये अस्पताल के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था। नवंबर 1914 से दिसंबर 1916 तक यहां युद्ध में पीड़ितों का इलाज किया जाता रहा था, जिनमें से अधिक गिनती ‘‘इंडियन आर्मी’’ अर्थात् भारतीय फौजियों की थी। 1915 के जुलाई में बादशाह जार्ज पंचम और लार्ड किचनर फौजियों की मिज़ाज़पुरशी के लिये अकसर ब्राईटन आया करते थे और उन्होंने अनेकों फौजियों को बहादुरी के तमगे देकर सम्मानित भी किया था। डोम के बराबर वाले हिस्से को अप्रेशन थियेटर के तौर पर प्रयुक्त किया गया था, जहां आज थियेटर है। महल में गोरखे, जाट, पठान, राजपूत और सिक्ख बहादुर सिपाहियों की तस्वीरें आज भी लगी हुई हैं, जिन्होंने प्रथम विश्व-युद्ध में भाग लिया था। अधिकतम घायल सैनिकों का जहां इलाज किया गया था, उस स्थान को किचनर इण्डियन अस्पताल का नाम दे दिया गया था, जो अब नाईटन जनरल अस्पताल के नाम से जाना जाता है। 1916 में इलाज के अधीन 14000 भारतीय सैनिकों की मृत्यु हो गई थी और उनकी (याद) में ब्राईटन में बनाया गया विशेष स्मारक आज भी मौजूद है। 1918 में पबीलियन महल में से अस्पताल को हटा दिया गया था।
रायल पबीलियन महल के स्वागत कक्ष से आगे रसोई घर आ जाता है। वहाँ डमी मुर्गे और बकरे, सलाखों में डालकर ऐसे टाँगे हुये हैं, जैसे राजाओं के समय में भूने जाते थे। उससे आगे डाईनिंग हाल है, जहां एक ही समय में पचास से अधिक व्यक्ति विशाल मेज़ पर खाना खा सकते हैं। इससे आगे आप सैलून में दाखिल हो जाते हो। खाने के बाद स्त्रियाँ अपने हुसन को दाव पर लगाने में व्यस्त हो जाती हैं और मर्द अगले कमरे में बैठकर ताश या जुआ खेलते हुये सियायत के बारे में विचार-विमर्श किया करते थे। उस कमरे में से निकल कर मैं डांस रूप में चला गया। यह कमरा सबसे अधिक सजाया गया था। इसमें आये मेहमान नृत्य करते और इसके पश्चात् वे इसके साथ बने मेहमान कमरों में आराम करने चले जाते। डाँस रूम के बाद सीढ़ियाँ आ जाती हैं। सीढ़ियों के किनारे विशेष प्रकार के कैंसट लोहे के साथ बनाये गये हैं, लेकिन देखने में वे बाँस के बने होने का भ्रम डालते हैं। जार्ज चतुर्थ अपनी मनपसंद स्त्रियों को लेकर इन सीढ़ियों द्वारा अपने शयन-कक्ष (सोने के कमरे) में चला जाया करता था। जीवन के अंतिम समय में बादशाह जार्ज ने अपना शयन-कक्ष नीचे बनवा लिया था। सीढ़िया चढ़ते ही गली में से गुज़र कर बाईं तरफ बादशाह जार्ज के भाईयों के दो शयन-कक्ष हैं। एक कमरा डयूक आॅफ यौरक और एक डयूक आॅफ क्लेयरेंस प्रयुक्त किया करता था। इसके साथ ही लाॅबी और उनके नौकरों के कमरे बने हुये हैं। राबर्ट जोनज़ ने इन कमरों की दीवारों पर पीले रंग के कागज़ लगाये थे। प्रयोग किये गये पीले क्रीम रंग का वास्तव में तब 1918 में नया आविष्कार ही हुआ था। आगे चल कर मलिका विकटोरियां का कमरा आ जाता है जो कि महल के प्रवेश द्वार के एकदम ऊपर है। इसमें मलिका का डैªसिंग टेबल, कुर्सियां और वह चार पायों (स्तंभों) वाला ऐतिहासिक बैड है जो मलिका अपनी काम-तृप्ति हेतु प्रयुक्त किया करती थी। मलिका विकटोरिया घोड़ों की बजाय मर्द की सवारी को महत्त्व दिया करती थी। यह पलंघ (बैड) मलिका ने विशेष तौर पर अपने लिये बनवाया था, और इस पर छह भिन्न-2 किस्मों और आकारों के गद्दे पड़े हैं। ये गद्दे मलिका को संभोग के समय उछालने में सहायक होते थे। इस कमरे के साथ ही मलिका की दासी का कमरा है और मलिका के नौकर इस कमरे के एकदम ऊपर एटिक में रहा करते थे। दासी के कमरे में बहुत आलीशान तीन गुना छह फुट का पलंघ है। जिसे नौकरों के साथ इश्क फरमाने के वक्त मलिका विक्टोरिया कभी-कभी प्रयोग किया करती थी। इन कमरों की दीवारों पर हाथों से चित्रकारी की हुई देखने को मिलती है। यहां से आगे नीचे की तरफ छोटी-छोटी सीढ़ियां उतर कर जार्ज चतुर्थ के शयन-कक्ष में दाखिल हुआ जा सकता है। इसी कमरे में लाईबे्ररी भी बनी हुई है और सुरंग इसी कमरे में ही निकलती थी। गुप्त दरवाज़े सैलानियों को दिखाने के लिये खोल कर रखे जाते हैं यदि उन्हें बंद कर दिया जाये तो बिल्कुल पता नहीं चलता कि वहां दरवाज़े भी हैं। महल की गैलरी को कैफे में परिवर्तित कर लिया गया है। इसके अतिरिक्त मेहमानों के लिये कुछ अन्य कमरे भी हैं।
महल से निकल कर मैं डोम की तरफ चला गया। डोम को अब सियासती और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये प्रयुक्त किया जाता है। स्टीडयो थियेटर फोरन अकसचे और काॅनसर्ट हाल आज आपको अस्तबल की जगह दिखाई देते हैं। जार्ज चतुर्थ के शयन-कक्ष तक जाती सुरंग अब महल के बाहर बने पबीलियन बगीचे तक ही आती है और ब्राईटिन मयूज़ियम के साथ उसका बाह्य (निष्कासन का द्वार) द्वार साझा है। कोरन एकसचेंज की जार्ज चतुर्थ (उस समय वह पिं्रस रीजैंट थी) ने घुड़सवारी सीखने के लिये बनवाया था। डोम वाले सारे कौमलेकस का कार्य 1805 में पूरा हुआ था और विलियम वोरडन ने इसका डिज़ाईन तैयार किया था। 19 मीटर ऊँचे तथा 24 डायामीटर चैड़े डोम के गुंबद को अरबी और भारतीय दिखावट प्रदान की गई है।
वहां से खाली होकर मैं ब्राईटन मरीना पैलिस पीयर (शाही घाट) की तरफ चल पड़ा। इस घाट को 1866 में बनवाया गया था। यहां मनोरंजन के साधनों, हिंडोला और झूले लेने वाली अनेकों चीजें और खाने-पीने की दुकानें बनी हुई हैं। 1975 में आग लगने की घटना के बाद इसे बंद कर दिया गया था। और हाल ही में कुछ वर्ष पूर्व (पहले) दोबारा खोला गया है।
पीयर पर टहलते हुये काफी भूख लगने लग पड़ी थी। मैंने एक चाईनिज़ टेकवे से चिकन नूडलज लिये और नैटली के बारे में सोचने लग पड़ा था। नैटली ने कुछ घंटे पहले अपने घर की तरफ चल पड़ना था। दरअसल उसकी दस साल की लंबी शादीशुदा जिंदगी की कश्ती भंवर में फँसी हुई थी और वह मानसिक परेशानियों से निजात पाने के लिये तीन दिन पहले से ही ब्राईटन आई हुई थी। अब उसका अपने पति से कानूनी तौर पर ताज़ा-ताजा अलगाव हो चुका था। नैटली को वापिस लौटने की जल्दी ना होती तो उसके साथ घूमा जा सकता था। मैंने नैटली के साथ बात करने के इरादे से फोन निकाल कर देखा तो उसकी पाँच मिस कालज आई हुई थी, जिनके बारे में महल में घूमते हुये मुझे इल्म (मालूम) नहीं हो सकता था। मैंने नेटली को फोन किया। उसने फोन नहीं उठाया। पाँच मिनट के बाद उसका मैसेज़ और काल आ गई। वह कुछ समय के लिये कैफे पर रूकी थी। कुछ देर उससे बातें हुई।  तब तक हमारी वापसी का समय हो गया। मैं कोच में सवार हो गया और हमने वापिस ब्रमिंघम की तरफ यात्रा आरंभ कर दी। हमारीकोच में कुछ संगीत का शौक रखने वाले लड़के भी थे। बारी-बारी से वे अपने गीत सुनाने लग पड़े। वहीं कोई-कोई चुटकला सुना कर मनोरंजन कर रहा था। लेकिन मैं नैटली के ख्यालों मंे ही गुम था। कुछ घंटे पहले तक मैं उसे जानता नहीं था और कुछ पलों के सफर के साथ वह मेरे ज़ेहन की रियासत पर कब्जा जमा चुकी थी। हैरानी भी होती थी कि कोई अजनबी भी इतनी तीव्रता के साथ आपके दिल के करीब पहुँच सकता है। एक मर्द और औरत के दरमियां सिर्फ तीन कपड़ों का फासला होता है। जब यह वस्त्र बीच में से हटा दिये जायें तो सब फासले मिट जाते हैं। हमारा टैकसट मैसेज़ों का आदान-प्रदान होने लग पड़ा।
नैटली का बिजलई संदेश आया, ‘‘मुझे लगता है हमारे दरमियां एक लंबे समय तक निभ सकने वाले रिश्ते का सृजन हो चुका है।
फोन देखते ही मैंने मुस्कुरा कर उत्तर टाईप किया, ‘‘मालूम नहीं। लेकिन मुझे समझ नहीं आती कि हम एक दूसरे से बहुत फासले पर रहते हैं। दूरियों के बावजूद करीबियां पैदा हो सकती हैं यां नहीं, यह तो वक्त ही बतायेगा।’’
‘‘आशिक तो सात समंदर पार करके भी एक दूसरे को मिल लेते हैं। हमारे बीच में तो महज़ कुछ मीलों की दूरी है।’’
‘‘हाँ वह तो ठीक है। लेकिन वो कहावत है न कि आंखों से दूर तो दिल से भी दूर।’’
कुछ देर बाद उसने सोच कर अगला टैकस्ट मैसेज कर दिया, ‘‘कुछ भी हो, भले ही तुम्हारी यादें कुछ पल के साथ की थी, लेकिन तमाम उम्र मेरे साथ रहेंगी। कभी मैं तुम्हारे पास आ जाया करूंगी। कभी तुम मेरे पास आ जाया करना।’’
‘‘हां। जरूर, क्यों नहीं? यदि तुम कभी ब्रमिंघम आया करोगी तो मिल जाया करना। यदि कभी मेरा साऊथ हैंपटन की तरफ चक्कर लगा तो मैं हज कर जाया करूंगा। लेकिन तुम्हारी यादों को मैंने अपनी अगली रचना में तुम्हें पात्र कर, हमेशा के लिये संभाल लेना है।’’
उसके बाद का संदेश पढ़ते हुये नैटली का निखरा हुआ चेहरा मेरी आँखों के आगे घूम रहा था, ‘‘सो नाईस आॅफ यू! नहीं राज, वादा करो कि तुम हर वीकएण्ड पर मुझसे मिला करोगे।’’
‘‘मैं बहुत मशरूफ (व्यस्त) इन्सान हूं। ऐसा संभव नहीं है। आई टेक लाईफ ;स्पमिद्ध ऐज़ इट कमज़। मुझे और भी अनेकों काम रहते हैं। और भी गम हैं जिदंगी में, मुहब्बत के सिवा। आशिकी करने, रिश्तों की लाशों का बोझ उठाने के लिये मेरे पास इतना खाली समय नहीं है। बस ये समझ लो कि मैं एक बेपरवाह दरिया हूं, जिसे खुद नहीं पता कि मैं कहाँ से बहना शुरू हुआ हूं और बह कर कहाँ जाना है। हमारी पंजाबी भाषा में एक कहावत है कि पुल के नीचे से बह कर गया हुआ पानी वापिस लौट के नहीं आता।’’
‘‘बेपरवाह दरिया ऊबड-खाबड़ रास्तों से होते हुये जिस तरफ मर्जी बह लें, अंत में निर्वस्त्र होकर उन्हें नंगे सागरों में ही गिरना होता है।’’
नैटली का यह संदेश पढ़ते ही मेरे फोन की बेटरी फलैट हो गई और फोन बंद हो गया। शायद कुदरत को मेरी तरफ से कोई जवाब देना मंजूर नहीं था।

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