तुझे पियेंगे नसीबों वाले!
‘‘एक सवाल मेरे मन में आता है, वह यह कि हमारे हीरों जैसे लेखक.... गायक.... शराब पी-पी कर क्यों अपनी जान गँवा रहे हैं? क्या शराब... जिंदगी और सेहत से... ज्यादा अच्छी है?’’
पंजाबी आरसी की फेसबुक वाल पर कुलदीप माणक की मृत्यु का इज़हार करते हुये तनदीप तमन्ना जी ने यह उर्पयुक्त विचार लिखा था। सवाल वाक्य ही गौर की माँग करता है। पहले सुरजीत बिंदरखीआ, फिर काका भैणीवाला मेजर राजस्थानी और फिर माणक।
शिव कुमार बटालवी के अतिरिक्त एक दर्जन से भी अधिक पंजाबी के साहित्यकार हैं, जो मनहूस शराब की भेंट चढ़े। बात यह नहीं है कि केवल गायक, एक्टर, साहित्यकार ही शराब पीकर मरते हैं। बहुत सारे आम लोग भी शराब की भेंट चढ़ते रहते हैं। लेकिन उनको मीडिया कवरेज नहीं मिलती। प्रसिद्ध लोगों के बारे में वह खबर बन जाती है और जंगल की आग की भांति फैल जाती है। जब कोई आम व्यक्ति शराब सेवन से मरता है तो उसके अनेकों कारण होते हैं, जैसे आर्थिक तंगी, असफलता, कर्ज़ा, बेरोज़गारी, घरेलू रिश्तों में उत्पन्न हुआ तनाव, मजबूरी या अय्याशी। लेकिन प्रसिद्ध व्यक्तियों की मृत्यु का केवल एक कारण होता है, वह है उनका प्रसिद्ध होना।
फिल्म एक्टर संजयदत्त इसकी सबसे बढ़िया मिसाल है। जब उसकी शोहरत शिखर पर चढ़ी हुई थी तो वह नशे की दलदल में पूरी तरह धंस-चुका था। सनावर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते हुये भांग के पत्तों की बीड़ियां पीने से शुरु हो कर उसने कोकीन और हैरोईनतक का सफ़र किया। न्यूयार्क में कैंसर के साथ लड़ रही अपनी माँ नरगिस को मिलने के लिये जब वह अस्पताल में गया तो उसके जूतों में 60 ग्राम हैरोईन छुपाई हुई थी।
रेमण्ड चैंडलर कहता है, ष्।सबवीवस पे सपाम सवअमण् ज्ीम पितेज ापेे पे उंहपबए जीम ेमबवदक पे पदजपउंजमए जीम जीपतक पे तवनजपदमण् ।जिमत जींज लवन जंाम जीम बसवजीमे वििण्ष् पहले शराब शौंक या मस्ती बनती है और उसके बाद आदत, फिर शारीरिक आवश्यकता। यहां आकर हरेक प्रसिद्ध हस्ती के साथ बाकी कारण भी आकर जुड़ जाते हैं, जैसे घर का झगड़ा। क्योंकि कद्रदानों और कला को समय देते हुये निजी रिश्तों के लिये समय सीमित यां नामात्र हो जाता है।
गीता दत्त ने भरी जवानी में शराब पी-पी कर खुद को तबाह कर लिया और गुर्दे खराब होने के कारण मर गई। गुरुदत्त शराब पीने के कारण मरा। पाकीज़ा जैसी उम्दा फिल्म देने वाली मीना कुमारी अपने समय की मशहूर अदाकारा (नायिका) थी। सब यह बात भली-भांति जानते हैं कि धर्मेंद्र के कैरियर को धक्का दे कर स्टार्ट करने वाली वह थी। लोगों ने उसकी प्रसिद्धी का फायदा उठाया और कुछ नाकाम मुहब्बतों का गम न झेलते हुये उसने खुद को शराब के नशे में डूबो दिया और मौत के मुँह में चली गई।
शिव कुमार बटालवी अपने समय का ऐसा अज़ीम शायर था कि छोटी उम्र में ही कामयाबी उसके पाँव चूमने लगी। सारे पंजाबी लेखकों में से सब से अधिक स्त्री प्रशंसक ;थ्मउंसम थ्ंदेद्ध शिव की ही थी। वह शराब का इस कद्र आदी हो गया कि उसे सुबह उठते ही पैग लगाना पड़ता था। इसका सबूत उसके साहित्य में से भी मिलता है, ‘‘मैनूं जद वी तुसीें हो याद आये, दिन दहाड़े शराब लै बैठा।’’ जब वह इंग्लैंड आया तो इंग्लैंड के लेखकों ने उसका साथ (संगत) पाने के लिये सकाटलैंड की डिस्टीलरियां खाली कर दी और वह भारत लौटते हुये इस दुनियां से ‘‘जोबन रुत्ते, भरे भराऐ’ (यौवन में ही) चला गया।
माणक की सफलता ने दुनियां भर में उसके इतने प्रशंसक और शागिर्द बना दिये कि सम्मान के तौर पर वे माणक को नशे में डुबोते रहे। नतीजा आज सामने है।
किसी समय हरचरन गरेवाल और सीमा की जोड़ी की दोगाना गायकी में शोहरत थी। माणक ने अपने कैरियर का आगाज़ गरेवाल के साथ साज़ बजानेसे किया था। गरेवाल का एक गाना था, सीमा कहती है, ‘‘मितरा मैं बोतल नाभे दी।’’ गरेवाल का जवाब था, ‘‘तैनू गट-गट कर के पीं जांगे फिर उसने कह कर गीत लिखवाया थ, ‘नाभे वाले ठेके दीये बंद बोतले नी, तैनूं लाहां नाल बुल्लां दे नाल ला के।’
डी.एम थौमस ;क्लसंद डंतसंपे ज्ीवउंेद्ध कहता है, ष्।द ंसबवीवस पे ेवउमजीपदहए ूीपबी कतपदो लवन ंे उनबी ंे लवन कवण्ष् गरेवाल गट गट करके शराब पीता गया और एक दिन उसे भी नाभे वाली बोतल पी गई। चार दिन लोगों ने याद किया फिर बस उसके ही गीत की भांति बूढ़ों ने नलों पर मोटरें लगा ली और यारों के टयूबवैल सूने पड़ गये। आज बहुत से गायकों को भी नहीं पता मि हरचरन गरेवाल नाम का भी कोई गायक होता था।
फिर बारी आई दीदार संधू की। ग्रेवाल तो अकेला अंगे्रजी का अक्षर श्न्श् यू था। लेकिन दीदार डब्ल यू था अर्थात् गायक होने के साथ-साथ गीतकार भी था और वह भी चोटी का। ‘हुण ढाके दी मलमल वरगी दे नाल यारी आ’, तेरे मुख तो इयों रुशनाई हुंदी अै, जिवें किसे ने आले दे विच जोत जगाई हुंदी है, और ‘गल सुण मखमल वरगिआ यारा, तैनू चंद कहां के तारा’ उसके गीतों की पंक्तियां हैं नमार के पलंघ जैसे गीत बुनता था। दीदार उसके गानों में से ही उसका जीवन झलकता था। नमूने के तौर पर सुन कर देखों, उसने गाया ‘जिसने इस भरी सुराही चो पहला पैॅग भर के लाया होऊ’ या एक अन्य गीत -
लड़की:- तू ठेके ते ना जाया कर!
लड़का:- जे हुण जावां ता जाणी।
लड़की:- फिर काहते पी के आया?
लड़का:- एैदां तां तूं आप सयाणी।
बाजीगरों के लड़के और कबड्डी के खिलाड़ी कुंदन के साथ दीदार की गहन दोस्ती थी। दीदार को घेर कर हर रोज़ कुंदन और उसके साथी शराब पिलाते और कहते, ‘‘संधू यार अपने गीत में मेरा नाम ऐसे फिट कर दे कि हर जगह कुंदन-कुंदन हो जाये। एक बार लोगों को ये पता लग जाये कि कुंदन नाम का भी कोई शख्स है। तुम्हें शराब से नहला देंगे। कुंदन भी यारों का यार है।’’
बताईये जरा कि ज़हर पिलाना कौन सी यारी हुई। दीदार ने कई गीतों में कुंदन का नाम डाला, जैसे कुंदन कपूरे का, कंध तों दी मारे झातियां’ और कुंदन जैसे यह कहेंगे कि देखो यह संधू क्या करता हैं कुंदन और उसके साथी उसे दारू से स्नान करवाते रहे। फिर दीदार ने एक गाना गाया, ‘सानू लंडू पैग लगे जिह सरूर हो गया।’ इस सरूर के चक्कर में ही दीदार हम से दूर हो गया।
और भी पंजाबी के अनेकों गायक हैं, जो इन्हीं रास्तों पर चलकर महज़ फूलों (पुष्पों) की माला पहनी तस्वीर बन कर रह गये।
अदाकार (अभिनेता) सलमान को ही ले लीजिए। दूसरे ही दिन शराब पी कर कोई न कोई गलती कर बैठता है। पहले शराब में टल्ली होकर सोमी अली को चांटा मार दिया, वह उसे छोड़ कर भाग गई। फिर पार्टी में संगीता बिजलानी को घूंसा मारा, उसने कहा मैं घूंसा क्यों खाऊं? मैं तो बैट खाऊंगी और क्रिकेटर मुहम्मद अजहरुदीन के साथ शादी करवा ली। फिर ऐश्वर्य राय के सिर पर खाली करके बोतल मारी और फिर सारी रात फोन पर उसे गंदी-गंदी गालियाँ निकाली, जो समाचार-पत्रों और यू-टयूब द्वारा उसके प्रशंसकों ने भी सुनी। वो कहती कि यदि गालियां खानी हैं तो बच्चन परिवार से खाऊँगी। कैटरीना कैफ कहने को तो उसकी थी, फिल्में तो सबसे अधिक अक्षय कुमार के साथ करती है। फिर भाई साहब ने भगवान का नाम लेकर रौअब से फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा कर सोये हुये व्यक्तियों को सदा के लिये कुंभकरण की नींद सुला देने की करामात कर दी।
विश्वप्रसिद्ध मुक्केबाज मुहम्मद अली सिरे का नशेड़ी था। मार्लिन मुनरो ने अपने समय में हालीवुड की सभी अभिनेत्रियों को एक किनारे पर कर दिया था, लेकिन स्टारडम उसे भी हजम नहीं हुई। यह प्रसिद्ध अभिनेत्री मारलिन मुनरो शराब के कारण पैदा हुई मुश्किलों के चलते नींद की गोलियां खा कर मरी। अंगे्रजी गायकी में नई राह डालने के कारण एलविस प्रैसली इतना मशहूर हुआ कि कहते है कि जब वह घर से निकलता था तो उसकी प्रशंसक लड़कियां उसकी राहों में बिछ जाया करती थी। रास्ता रोक कर रास्ते में लेटी लड़कियों को कार में से निकल कर वह उठा कर चंुबन और आटोग्राफ दे कर वह अपना रास्ता छुड़वाता (खाली करवाता) था। बीसवीं सदी में वह संगीत की दुनियां का बादशाह माना जाता था। उसको किंग आॅफ राॅक एण्ड रोल’ का खिताब दिया गया था। उसका एक गीत एक हफते में 600 मिलियन बिका था। इस बात ने उसे नशेड़ी बना दिया और आवश्यकता से अधिक नशे करने के बाद रौकस्टार एलविस प्रैसली की लाश भी उसके वाॅशरूम (गुस्लखाने) में से बरामद हुई थी। मौत के समय उसके पास 55 मिलियन डालर की जायदाद थी। पाॅप गायक माईकल जैक्सन शराब के अतिरिक्त अन्य नशीले पदार्थों के सेवन के साथ मरा। शहज़ादी डायना से भी शराब पीने पर काबू नहीं रखा जाता था। शहज़ादा ऐंडरू, शाहज़ादा विलियम और ब्रिटनी सपीयरस कई बार ‘ड्रिंक एण्ड ड्राईव’ करते हुये पकड़े गये। शाहजहाँ से लेकर महाराजा रणजीत सिंह तक कई हुक्मरान (शासक) शराब पी कर रूखस्त हो गये। शाहजहाँ की बेटी और औरंगजेब की बहन जहाँआरा तमाम जिंदगी शराब के नशे में डूबी रही।
विश्व स्तर पर प्रसिद्धी कमाने वाला जेमज़ बोल्ड़विन पहला लेखक हुआ है जिस ने सारे नवयुग के लेखकों में से सबसे पहले सैक्स के बारे में खुल कर लिखा और प्रसिद्धी प्राप्त की। वह स्वयं समलिंगी था। ळव जमसस पज वद जीम उवनदजंपद आत्मकथा के साथ उसने साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किया और छव दंउम पद जीम ेजतममज जैसी रचना रचने तक वह बहुत पढ़ा जाने लग गया था। शराब के कारण पैदा हुई बीमारियों के कारण वह मरा। अरनैस्ट मीलर हमिंगवेअ जिसका घरेलू नाम ‘पापा’ था। वह एक ऐसा नावलकार, पत्रकार और कहानीकार था कि उसने अपने दौर के बड़े-बड़े महारथियों के घुटने टिकवा दिये थे। ज्ीम व्सक डंद ंदक जीम ैमं जैसे सदाबहार और शाहकार नावल का जगत प्रसिद्ध रचयिता तमाम उम्र शराब का आदी रहा। उसकी मानसिक परेशनियां इतनी बढ़ गई कि वह पागल हो गया। 1961 में वह इलाज करवा कर पागलखाने से निकला और एक दिन कैचम ;प्कंीवद्ध अपने ही घर में अपनी ही बंदूक से खुद ही को गोली मार कर उसने जीवन लीला समाप्त कर ली। एडगर एलम पौ अमेरिकीन कवि और कहानीकार (जो अमेरिकन रौमेंटिक मूवमैंट का सरगर्म मैंबर रहा) की भी ऐसी ही दुगर्ति हुई।अमेरिकन कवियत्री डौरथी पाक्रर के तीन विवाह असफल रहे और वह मानसिक तनाव न झेलते हुये शराब पर निर्भर रहने लगी। अनगिनत आत्म-हत्याओं के असफल यत्नों के पश्चात् वह शराब पीने के कारण ही मरी। हमारे इंग्लैंड की प्रसिद्ध लेखिका विरजीनिया वौल्फ शराब के नशे में नदी में कूद कर मरी। नावल थ्मंत ंदक स्वंजपदह पद स्ंेअमहंे के साथ चर्चा में आने वाला नावलकार हंटर थाॅमसन और रेमंड चैडलर का भी यही हाल था। 1979 च्नसपज्रमत च्तप्रम विजेता नावलकार और कहानीकार जौहन शीवर जिसको ष्ज्ीम ब्ीमाीवअ व िैीतनइे ष् कहा जाता था और 400 कहानियां लिखने वाला विलियम सिडनी पाॅटर, जिसका उपनाम हैनरी था, का भी शराब के साथ बुरा हाल हुआ। मेरी पसंदीदा फिल्म क्पतजल क्ंदबपदह फिल्म का अभिनेता निक कैनटर खालिस हैरोईन का टीका खुद अपने आप को लगाकर 1991 में मरा। डाना प्लैटो की मृत्यु 1999 में नशीले पदार्थों के कारण हुई। एडी सैडविक 1971 में मिलावटी शराब पीकर मरा। डाना ब्रैड रैनफरो हैरोईन की अधिक मात्रा के साथ 2008 में मरा। ब्ंज वद ं ीवज ज्पद त्वव िलिखने वाला और रंगमंच के कई बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त करने वाला थाॅमस विलियम 3, नदकमत उपसा ूववक का लेखक वैलिश कवि डालिन थाॅमस, 1931 के सर्वोतम बिक्री के रिकार्ड तोड़ने वाले नावल ळववक म्ंतजी का रचयिता पीरल बॅक, 1949 का साहित्य नोबल पुरस्कार विजेता विलियम फालनकर आदि नामों की इतनी लंबी लिस्ट है कि गिनने लगे तो कई सैंचियों के गं्रथ तैयार हो सकते हैं।
मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि मशहूर हस्तियां ऐसी हरकतें क्यों करती है और बेहिसाब दारू पीकर क्यों मरती हैं। मेरे हिसाब से इसके लिये दो व्यक्ति जिम्मेवार होते हैं, एक तो कलाकार खुद, दूसरा उसके कदरदान। अपने विचार की पुष्टि के लिये मैं खुद को ही बलि का बकरा बना लेता हूं।
17-18 साल की उम्र में मेरी कहानियाँ छपने लग पड़ी और मेरी चर्चा होने लग पड़ी। जैसे कहावत है कि मिआं भी गर्म और गोलियां भी गर्म। इंग्लैंड में ठण्डे वातावरण में बैठ कर लिखी मेरी कहानियां भी भाप छोड़ती और प्रतिक्रम भी जाहिर है गर्म होंगे। मुझे मेरे आलोचकों ने मशहूर कर दिया। मैं जानबूझ कर अपनी रचनाओं में कुछ ना कुछ ऐसा लिखता, जिससे मेरा विरोध हो। मैं विवादों में घिर कर बड़ी तीव्र गति से लाईमलाईट में आ गया। मैं लिखता गया और समाचार-पत्र और पत्रिकाएं छाप कर पाठकों तक पहुंचाते गये। पंजाब टाईमज़ के संपादक हरजिंदर सिंह मंडेर ने मुझे बहुत ऊँचा उठाया। मैंने अपने लिये स्वयं वह पाठक वर्ग पैदा किया, जो साहित्य पढ़ने के आदी नहीं थे। इण्डिया से नये-नये शादी करके आये लड़के लड़कियों को मैंने टारगेट किया। उनके बारे में उनकी समस्याओं के बारे में लिख कर उनको साथ में जोड़ा।
इंग्लैंड के कई पुराने लेखकों को मेरा चर्चा में रहना और छपना अच्छा ना लगता। जब मुझे एहसास हुआ कि मेरा अधिक विरोध ज्यादातर लेखकों द्वारा किया जाता है तो लेखकों को झंडे के तले करने के लिये मैंने लेखकों और उनकी रचनाओं के बारे में ‘लफ़ज़ा दे दरवेश’ काॅलम लिखने लग पड़ा। पंजाबी लेखकों की सबसे बड़ी कमज़ोरी मेरे हाथ मंे थी। पंजाबी का हर लेखक चाहता है कि उसकी और उसके द्वारा रचित साहित्य की कोई अन्य व्यक्ति चर्चा करे। इस प्रकार अपने बारे में लिखवाने की चाह रखने वाले लेखकों ने मेरे विरूद्ध आवाज़ बंद कर ली। मुझे निमंत्रण पत्र भेज कर आमंत्रित किया जाता और जाम टकराये जाते। फिर मेरी प्रमोशन (तरक्की) हो गई और समाचार पत्र के संपादकी मण्डलों में सेवा निभाने का बादल और कैप्टन सरकार की भांति मुझे सौभाग्य प्राप्त होने लगा। मैं जहां जाता, बल्ले-बल्ले होने लगती। रचना छपने पर फोन आने लगे। जहां जाता लोग कहते, ‘‘भाई तुम्हारे साथ एक जाम अवश्य पीना है। पैग लगाये बिना तुम्हें जाने नहीं देना।’’
ष्। उमंस ूपजीवनज ूपदम पे सपाम ं कंल ूपजीवनज ेनदेीपदमण्ष् की धारणा पर अनुकरण करते हुये यह पहले वीक-एंड (सप्ताह के अंत) का शुगल (मौज मस्ती) अर्थात् सोशल डिंªकिंग थी, फिर धीरे-2 चलते सप्ताह में चलने लग पड़ा। थोड़ी और तरक्की की, पहले रेड़ियों और फिर टी.वी. मीडिया में हाथ अटक गया। मुझे ऐसा फितूर चढ़ा कि रॅब को टब बताने लग पड़ा। एक्टरों, सिंगरों, सियासतदानों (नेताओं) और बिजनेसमैनों से संपक्र पैदा हो गये। शोज के वी.आई.पी. और बैक स्टेज पास डाक द्वारा घर आ जाते।
इण्डियन ओवरसीज़ के प्रधान दलजीत सिंह सहोता जी जैसे बलबीर सिंह एम.पी. या हरियाणा के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चैटाला जैसों के साथ मेरा परिचय करवाते हुये कह देते, ‘‘लड़का पूरी आग है जी आग।’’
मैं और सर चढ़ जाता। कहानी लिखते हुये ख्याल आया कि कहानी तो सिर्फ वही पढ़ सकता है, जिसे गुरूमुखी पढ़नी आती है। गीत लिखने से ज्यादा शोहरत मिल सकती है और गुजराती, पाकिस्तानी और ब्रिटिश बौरन (पैदायशी) साथ में जोड़े जा सकते हैं। जैसे कहते हैं कि मेहनत करने वाले को ईशवर भी सही रास्ता दिखाता है।
बस कुछ गीत लिखे, रिकार्ड होकर अच्छे चल निकले। दिमाग कुतुबमीनार से ऊँचा उठ गया। जानकारों का घेरा और विशाल हो गया। इस प्रकार सोशल से सैंसीबल डिंªकिंग का आगाज़ हो गया। इस दौरान जिंदगी में दो ऐसे संगीन हादसे घटित हुये कि तब का टूटा मैं अब तक जुड़ नहीं पाया। शराब नियमित हो गई। मैं लिखने को छोड़ कर आठों पहर शाहजहां की भांति नशे में टल्ली रह कर यह भ्रम पाल बैठा कि जो ताजमहल मैंने बना लिया है, वह कोई और नहीं बना सकता। काश! शाहजहां खुद को शराब में ना डुबोता तो न तो उसे अपने पुत्र की कैद में रहना पड़ता और न ही काले ताजमहल को बनाने का उसका स्वप्न अधूरा रहता।
खैर 4-5 साल तक तो मैंने जी भर कर बेपरवाह होकर शराब पी। शराब मेरी अडिकशन बन गई। मैं शराब पर निर्भर रहने लगा। कुर्सियां, रूतबे (पदवियां) प्रशंसक सब चले गये तो लोगों का तो एक तरफ, मेरे अपने खून के रिश्तों का मेरे प्रति रवैया बदल गया। जो कहते थे ‘मरेंगे तेरे साथ, वे मैदान छोड़कर भाग गये।’’
कालेज के जमाने में एक कहानी अधूरी रह गई थी और तब उसका कलाईमैक्स नहीं सूझता था। जैसे एक शायर ने कहा है, ‘जिस अफसाने को आरजू पे लाना हो मुश्किल उसे खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना अच्छा है।’ बस कुछ इसी प्रकार खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ी उस कहानी का अंत लिखने के लिये अकेलेपन के जंगल में भटकते हुये उस जख्म को कुरेद बैठा और पुराने दर्द को जगाने के बारे में सोचकर फोन किया। जिसका कभी यह कहना था, ‘‘आवाज़ लगाई दोस्त ने, मैं पाँव जूती न डालूं।’ तो आगे से उसके फोन उठाने पर उसकी पृष्ठभूमि से (पाश्र्व) आवाज़ आई, ‘‘कह दो मैं नहीं हूं।’’ यह सुनते ही मेरा सीता की भांति धरती में समा जाने का मन किया। आगे से मैंने भी न जने कौन सा हक जताते हुये कहा, ष्प् रनेज ूंददं जंसा जव ीमतण्ष्
‘‘कहा, ना भाई उसने तेरे साथ बात नहीं करनी। उसे तुम्हारी जरुरत तब थी जब तुम हीरो थे, अब तुम जीरो हो। अब उसे भूल जाओ।’’
मायूस सा होकर मैंने सोचा, हाँ यार बात तो सही है। भ्मतव को हटा दें तो वाक्य में ही पीछे 0 र्;मतव) रह जाती है। अकेले शून्य जितने मर्ज़ी इक्ट्ठे हो जायें, उतनी देर तक उनका कोई अस्तित्व नहीं होता, जितनी देर तक उसके साथ महत्वपूर्ण अंक एक न लगा हो। कला का वह एक अंक मैं अपने आप से जुदा करके बैठ गया था। इस समय मैंने अपनी कैफियत पर एक गीत लिखा था, ‘भीड़ पई ते याद करें तां भुल गये ओह प्यारा नू। चलो होर नहीं ता ऐसा बहाने परख लिआ है यारां नू।’ गीत का एक-एक शब्द मैंने निजी तजुर्बे में गूंथ कर अपने रक्त (खून) से लिखा था। अंगे्रज अली ने जब यह रिकार्ड करवाया तो रिकार्डिंग रोक कर मैं स्टूडियो से बाहर जा कर दो तीन बार दिल भर कर रो कर आया।
एक मित्र के साथ उसके किसी काम से स्काॅटलैंड जाना था। मैंने उसे तीस पौंड देकर शराब लेने भेज दिया। वह बोतल ले आया, तो मैंने लिफाफा देखते हुये उसे कहा,
‘‘हमारा सफ़र लंबा है, यह क्या एक बोतल?’’
‘‘भाई निकाल कर देखो लीटर की बोतल है।’’
‘‘फिर क्या हुआ लीटर की है, पीने वाला भी इधर बलराज सिद्धू है। पंजाबी के लेखक तो ड्रम होते हैं।’’
गाड़ी जब मोटर वे पर डाल दी तो उसे याद आया कि वह शराब में डालने के लिये कोक या पानी तो लेकर ही नहीं आया। मैंने उसे बताया कि पानी तो बेवफा माशूक की भाँति होता है, जिस रंग में डालो, वैसा ही हो जाता है। मैंने ढक्कन खोला और बोतल मुँह से लगा ली। कार के स्टीरियो पर चमकीले का कुदरती फिट हुआ गाना चल रहा था, ‘‘सुक्की नू लाऊंदे रगड़ा, पाऊंदे ना पाणी नी। दारु तां नाल जट दे कबरां तक जाणी नी।’’
गलासगो से अभी हम 25 मील दूर थे। मैंने खाली बोतल अपने दोस्त को दिखाते हुये पूछा, ‘‘देख तो कोई एक आधा कतरा (बूंद) बच तो नहीं गया?’’
यह देखकर वह हैरान रह गया और उसने कईयों को इसके बारे में बताया। हर कोई मुझे इसके बारे में पूछ लिया करे, ‘‘सुना है यार तू पूरी बोतल पी जाता है? यकीन नहीं आता।’’
‘‘पिला कर देख लो फिर।’’ मैं आगे से जवाब देता तो वह पल भर में बोतल ले आता। मैं हवा में आकर पी कर दिखा देता। ऐसे ही मेरे घर के पास विक्टोरिया पोस्ट आफिस में बनी दुकान पर मैं कुछ लेने गया तो दुकान वाले के वहां खड़े मेरे एक जानकार लड़के ने बताया कि मैं एक घंटे में 9ः वाले सुपरनैट के चार डिब्बे पी जाता हूं। दुकान वाला हैरान हो गया। वह मुझे बोला कि पीकर दिखा। लेकिन शर्त यह है कि डिब्बा एक बार मुँह को लगा कर खाली हुये बिना मुँह से नहीं हटाना (उतारना)। मैंने शर्त मानते हुये कहा कि वह मुझे रोकेगा नहीं, मैं जितने मर्जी डिब्बे पी जाऊँ और यदि रोका तो फिर मैं अपनी मर्ज़ी की बोतल मुफत लूँगा। मैंने शर्त के मुताबिक डिब्बा खाली करके उसकी तरफ चला कर मारता गया। जब पाँचवा डिब्बा खाली करके मैंने छठे को हाथ लगाया तो पास में खड़ी उसकी बीवी पीटने लगी, ‘‘आप तो दुकान लुटा कर छोड़ोगे।’’
बेचारा वह मुझे रोकने के लिये मजबूर हो गया और मैं उससे मारटल ब्रांडी की बोतल ले आया।
पहले मेरा बड़ा मामा और फिर छोटा, भरी जवानी में अधिक शराब पीने के कारण मर चुके थे। छोटे मामा के अंतिम संस्कार वाले दिन सुबह से ही मैंने बोतल को मुँह लगा लिय। शमशानघाट पहुंचने तक मैं पौनी बोतल पी चुका था। मामा जी की अर्थी को कांधा दिये हुये मुश्किल से दस मिंट भी नहीं हुये होंगे अैर मैंने गाड़ी में पड़ी बची हुई बोतल को मुँह से लगा कर खाली किया और जोर से दूर झाड़ियों में फेंक दिया।
अखबारों में काम करते हुये आप इतनी खबरें लगाते हो कि आपको भी पता नहीं होता है कि कब आपने कौन सी खबर लगाई है। जैसे कुश्ती लड़ रहे दो पहलवानों में से एक को गिरना पड़ता है, इसी प्रकार आपके द्वारा लगाई गई खबर किसी के हक (पक्ष) और किसी के विपक्ष में होती है। पंजाबी की गंधली पत्रकारी में पंजाब केसरी के लाला जगत नारायण इण्डो-कैनेडियन के तारा सिंह हेयर और देस-प्रदेस के तरसेम पुरेवाल को अपनी जानों से भी हाथ धोने पड़े हैं। ऐसे ही हमने एक खबर छापी, जो हमारे भरोसेयोग्य सूत्रांे के मुताबिक सही थी। उस का संबंधित व्यक्तियों को सेक (बुरा) लगा और उन्होंने मुझे धोखे से स्थानीय टैसको की कार पार्क में बुला लिया। मौके पर पहुंच कर मुझे सारा मामला पता लगा कि वह मुझे पीटने के लिये तैयारी कर के आये हैं। वे पाँच लोग थे और मैं अकेला था। ऐसे समय में चाणक्य नीति तो यही कहती थी कि भागने में ही फायदा है, लेकिन पॅब में बीयर के दो तीन पवांईट लगे होने के कारण मेरे भीतर जाटवाद आ गया। मैंने उन्हें बातों में उलझा कर समझाना चाहा कि खबर सही है बाकी के पंजाबी अखबारों के अतिरिक्त सारे अंगे्रजी के अखबारों ने भी छापी है। फिर मुझे ही क्यों शोध अभियान के लिये निशाना बनाया जा रहा है? उनका स्पष्टीकरण था कि अन्य अखबारों में खबर किसी ने पढ़ी, किसी ने नहीं पढ़ी। लेकिन तुम्हारी लिखी खबर पढ़ कर लोगों ने फोन करके हमें बताया कि बलराज सिद्धू ने देखो तुम्हारे खिलाफ क्या लिखा है। तुम्हारे साथ लोग जुड़े हैं और तुम्हें विशेष तौर पर पढ़ते हैं। वीक-एंड (सप्ताह का अंत) होने के कारण कार पार्क मशरूफ थी और मेरा दौड़ सकना संभव नहीं था। मैं तो भाग जाता, लेकिन तब उन्होंने मेरी नई वैक्टरा गाड़ी तोड़-फोड़ देनी थी। मैंने पंजाब पुलिस के भूतपूर्व डी.जी.पी कंवरपाल सिंह की भांति मौके पर ही निर्णय लिया और अपनी अगली चाल चलते हुये कहा कि यह खबर मुझसे गलत छप गई। यह सुन कर दो जन तो कुछ ढीले पड़ गये। लेकिन उनमें से एक कुछ अधिक ही गर्म था। वह अपनी कार में से लोहे की राॅड उठा लाया और मुझे कहने लगा, ‘‘माफी-वाफी नहीं, हम तो तुझे पीटने आये हैं और तेरी मुरम्मत कर करके ही वापिस जायेंगे।’’
उसकी दृढ़ता देखकर मुझे चंदड़ों के हाथों से काटा (मारा) जा रहा मिरजा दिखाई देने लग पड़ा। साथ ही मुझे अगले पंजाबी समकाली अखबारों के मुख्य पन्ने दिन में तारे दिखने जैसे दिखाई देने लगे। जिनमें मेरी हुई सर्विस की खबरें चार काॅलमों में छपनी थी। मेरी दलीलों की पानी में मधाणी (मंथनी) डालने से खीझ कर वे कहने लगे कि कोई सफ़ाई नहीं सुननी, बस तुझे पीटना है। मैंने उनसे कहा कि ठीक है, पीट लो, लेकिन पहले मुझे मार सहने के लायक हो लेने दो। मैंने अपनी कर का बूट खोला और गिलास में समीरन आॅफ वोडके का पैग भर कर उन्हें आॅफर (पेश) किया। चार लोगों ने तो जवाब दे दिया और एक ने पकड़ लिया। मुझे हौंसला हो गया कि मैं आधी लड़ाई जीत गया हूं। फिर मैंने खुद के लिये एक पैग बनाया और उनके साथी के साथ टकरा कर खींच लिया, साथ के साथ ही मैंने फिर दोबारा से गिलास भर लिये और अपना गिलास उनमें से एक अन्य की तरफ कर दिया। उसने भी झिझकते-झिझकते पकड़ लिया। मैं उन्हें एक चुटकुला सुनाने लग पड़ा। ‘‘एक बार एक शराबी पॅब में जाता है और बारटैंडर से कहता है। सभी ग्राहकों और अपने आप के लिये गिलास भर मेरी तरफ से। बारटैंडर भर देता है और शराबी से पैसे मांगता है तो शराबी कहता है पैसा तो मेरे पास कोई है नहीं। बारटैंडर पीटकर उसे बाहर फेंक देता है। अगले दिन फिर वही शराबी आकर उसी बारटैंडर को आदेश (हुक्म) देता है कि उपस्थित सभी ग्राहक, मेरे और अपने लिये गिलास भर। बारटैंडर सोचता है कि कल तो यह ज्यादा शराबी था और इसके पास पैसे नहीं थे। आज बिन पिये लगता है। वह फिर से सब को शराब देकर शराबी से पैसे मांगता है तो शराबी कहता है, पैसे तो मेरे पास है नहीं। बारटैंडर को गुस्सा चढ़ता है। वह मारपीट कर शराबी को पॅब के बाहर फेंक देता है। उससे अगले दिन फिर वह शराबी आ जाता है तो बारटैंडर से कहत है, मेरे और सब के लिये गिलास भर दो। यह सुनकर बारटैंडर कहता है कि अब तू कहेगा कि मैं अपने लिये भी भर लूं और पैसे मांगने पर तुम्हारे पास कुछ होगा नहीं। उसको टोक कर शराबी कहता है। नहीं यार, तू मत पीना। शराब पीकर तू वायलैंट हो जाता है। अब तुम लोगों में से जो वायलैंट है वह नहीं पिये, बाकी लोग हम पैग लगाते हैं।’’
इस प्रकार मैंने सभी को पीने लगा लिया। जिस प्रकार 16 दिसंबर 1971 को शाम के चर बज कर इकयावन मिन्ट पर पाकिस्तानी जरनैल के नियाज़ी ने अपनी 93000 फौज के साथ जरनल जगजीत सिंह अरोड़ा को आत्म समर्पण किया था, वैसे ही मेरे दुश्मन मेरे आगे हथियार डाले खड़े थे। एक-एक पैग के साथ हमारी बोतल खत्म हो गई। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि हम रेस्टोरेंट चलते हैं। उनमें से एक शेर बनता हुआ कहने लगा, ‘‘मैं बोतल ले कर आता हूं। कौन सी पीनी है, भाई?’’
मैंने कहा श्विास रीगल ले आ। वह अपने एक साथी को लेकर चल पड़ा। जाते हुये को मैनें आवाज़ लगा कर कहा, एक से क्या बनेगा, दो ले आना। वह दो बोतलें ले आये और हम सोहो रोड़ पर रैस्टोरेंट में चले गये। रैस्टोरेंट में पौंड 135.43 का बिल बन गया। बहरे ने मुझे ला कर बिल दिया। चंदड़ों के बीच में से एक जन बोला, ‘‘भाई बिल मैं देता हूं।’’ मैने उससे कहा, ‘‘ठीक है, डेढ़ सौ पौंड दे दे।’’
उसने अपना क्रैडिट कार्ड दे दिया। कार्ड और बिल वेटर (बहरे) को पकड़ाते हुये आँख दबाते हुये मैंने उससे कहा, ‘‘बाकी टिप है तेरी।’’
रैस्टोरेंट (रेस्तरां) के बाहर निकल कर सब के मुँह पर एक ही डायलाग था, वह यह कि भाई, यार तू तो बहुत बढ़िया बंदा है हम तुझे गलत समझते रहे। तू तो कौम का हीरा है हीरा। वे मुझे गले से लगाने लगे। वह दिन गया और आज का दिन आ गया। ना तो मैंने माफीनामा (क्षमायाचना) लगाया है और ना ही उन्होंने मुझे पीटा है। आज भी वे मेरे फैन हैं।
एक बार एक आतंकवादी गठन (जत्थेबंदी) के लीडर ने मुझे गुरुद्वारे में एक तरफ ले जाकर कहा कि वह चाहता है कि मैं उसकी विरोधी पार्टी के खिलाफ एक अखबार में छापने के लिये पत्र लिखूं। मैंने उसे समझाया कि मैं एक लेखक हूं और ऐसे मसलों से दूर ही रहना चाहता हूं। वह पीछे ही पड़ गया और कहने लगा तेरी कलम में दम है। मैंने उससे कहा कि मैं तो गर्म मसाला डालने वाला हूं, धार्मिक मसले मेरे बस का रोग नहीं। उस समय तब मेरी कहानी ‘‘प्रिथम भगौती सिमर के’’ (जो 18वीं सदी के सिक्ख के ऊपर दिखायी गई थी, लेकिन वास्तव में 1980 में पंजाब के अंदर चली आतंकवादी लहर के बारे में थी) का विवाद भी ठण्डा नहीं पड़ा था। उस कहानी के विरोध में कुछ नासमझ लोगों ने पत्र और लेख छापे थे। उन लोगों का कहना था कि कहानी में पेश की गई स्वअम डंापदह ैबमदम वाली घटना उस समय घटित हो ही नहीं सकती, क्योंकि उस समय सिक्खों का आचरण बहुत ऊंचा होता था और काम जैसी बुराई के लिये उनके पास समय था ही नहीं। मेरी दलील थी कि मेरे पात्र निरभै जिसे वे सिक्ख समझते हैं, मैंने दिखाया है कि वह पूर्ण गुरू सिक्ख नहीं होता है, सिक्ख तो उसका पिता भाग सिंह होता है जो सजा देता है और रिश्ते से भी पहले जिसके लिये धर्म महत्वपूर्ण होता है। जत्थेदार भाग सिंह इन्साफ करता और प्रिथम भगौती सिमरता है। दूसरी मेरी दलील थी कि यदि विवाह बीच में ही छोड़ कर आने वाला भाई जोगा डोल सकता है तो उसके आचरण की रक्षा के लिये गुरू गोबिंद सिंह को पहरा देना पड़ता है, तो कोई सिक्ख भी डगमगा सकता है। खैर, वे सिंह साहिब मुझे कहने लगे कि यही कहानी पढ़ कर वे प्रभावित हुये हैं। उन्हें मेरी कमज़ोरी मालूम थी और वे मुझे अपने एक मित्र के घर ले गये। वहां उनके मित्र ने डिंपल की बोतल खोल ली, हम दोनों ने पी। सिंह साहिब जूस का सेवन करते रहे। बोतल खाली हुई तो मैंने ललकार मार दी, ‘‘बेफिक्र रहो, सवेरा होने पर हल्ला हो जायेगा।’’ मैंने लेख उनके हक में लिखकर दे दिया। और उनको कहा अपने नाम तले छपवा लें और किसी को मालूम न पड़े कि मैंने लिखा है। उन्होंने इश्तिहार बनवा कर अपनी तरफ से सभी समाचार पत्रों में छपवा लिया। खाये-पिये में शब्दावली काफी गर्म ख्याली लिखी गई थी। दूसरे पक्ष को पूरी तरह पोंछ कर रख दिया था। घरेलू सा समागम करके उनकी तरफ से गुप्त राशि के साथ मुझे सम्मान भी प्रदान किया गया। कुछ अरसे तक यह काम चलता रहा। फिर एक दूसरी एंटी पार्टी (विरोधी पत्र) वले मेरे घर आ गये, वे पहली पार्टी के खिलाफ मुझसे लिखवाना चाहते थे। मेरे सामने मेरा ही लिखा लेख पड़ा था, जिसके विरोध में मुझे लिखना था। मुझे महाभारत के युद्ध का स्मरण हो आया। महाभारत से पहले कौरव-पांडव दोनों कृष्ण के पास मदद (सहायता) के लिये जाते हैं। कृष्ण उन्हें कहता है कि एक तरफ मेरी सारी सेना और दूसरी तरफ मैं अकेला, तुम्हें जिसका चुनाव करना है, चुन लो। न तो मैं कृष्ण था, न मेरे पास दूसरा विकल्प था। उस समय बहाना लगा कर उनसे पीछा छुड़ाने के सिवाय कोई चारा नहीं था। बाद में जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरा वह फैसला कितना सही था। इस प्रकार कई उद्योगपतियों और अमीर व्यक्तियों के बारे में मैंने बिना अपना नाम दिये लिखा और आर्थिक तथा अन्य लाभ प्राप्त किये।
भूतपूर्व डिप्टी कमिश्नर कुलबीर सिद्धू इंग्लैंड आये तो उनके पास समय सीमित था। वे देस-प्रदेस को इंटरव्यू भी देना चाहते थे और लंदन घूम कर कोहिनूर हीरा और महाराजा रणजीत सिंह का सिंहासन भी देखना चाहते थे। दोनों में से एक बात संभव थी। उनके इस बारे में विरक साहब से बात हुई तो उन्हांेने समस्या बताते हुये कहा कि यदि बलराज सिद्धू इंटरव्यू करके भेज दे? गुरुबख्श सिंह विरक ने कहा कि और क्या चाहिये, यदि बलराज सिंह सिद्धू कर दे, वह मुझ से बढ़िया करेगा। पूछ कर देख लो। वह मूड़ी सा है। कलबीर सिद्धू के साथ उनका साढ़ू कुलबीर बराड़ था। वह मेरा दोस्त था। उसने मुझे फोन किया, मैंने कहा कि जैसे कहो कोके जड़ दें (बात बना देंगे)।
मेरा शराब पीना दिन प्रतिदिन बढ़ता चला गया। मुझे मेरे डाक्टर ने नशा मुक्ति संस्था ऐक्यूऐरियस के पास भेजा। मेरी केस वर्कर इतिफाक से इण्डियन लड़की थी। मेरे शौंक के बारे में पूछने पर मैंने अपने लेखक होने के बारे में बताते हुये जब अपने ‘नचदी दे’, ‘ऊधम सिंह’ और ‘यार पाओणगे भंगड़ा’ जैसे गीत गिनाये तो हरेक गाने को वह अपना फेवरेट बताते हुये कहने लगी कि उसे भी गीत लिखने का शौक है। मैंने उससे पूछा कि पंजाबी आती है तो वह बोली नहीं, मैं रोमन लिपि में ही पंजाबी लिखती हूं। कौंसलिंग सैक्शन के बाद वह मेरे साथ ही दफतर से बाहर आ गई। वैस्टब्रामिच हाईस्ट्रीट’ पर सामने पॅब था, मैंने उससे कहा कि आओ पॅब में एक-एक पवांईट बीयर का लगाते हैं और साथ में तुम्हारे गाने सुनेंगे। हम पॅब में जाकर घंटे के बाद दो रोज़े वाईन की बोतलें खाली करके आ गये। ।सबवीवस कवमेदश्ज ेवसअम ंदल चतवइसमउेण्ण्ण् इनज प िलवन जीपदा ंहंपद दमपजीमत कवमे उपसाण् वाक्य मैं कई बार दोहरा कर उसे सुनाता रहा। और वह सुन-सुन कर ठहाके लगा कर हँस-हँस कर लोट-पोट होती रही।
कहाँ तो उसने मेरी शराब छुड़वानी थी, कहाँ मुझे उसे घर छोड़ कर आना पड़ा। त्मींइपसपजंजपवद पे वित ुनपजजमते कह कर मैंने बात हंसी में टाल दी। इस प्रकार बहुत से किस्से, यादें और घटनायें हैं।
शराब तो बड़े-बड़े हाथियों को गिरा देती है। इन्सान कौन से बाग की मूली है? महाराजा रणजीत सिंह की भांति एक दिन शराब ने मुझे भी गिरा डाला। मुझे ।सबवीवस ूपजीकतंूस ैमप्रनतमे अर्थात् बेहोशी के दौरे पड़ने लग गये। खड़ा-2 मैं बेहोश होकर गिरने लग पड़ा। मुझे कई-कई दिन तक अस्पताल में दाखिल रहना पड़ता। विटामिन के थ्सनपके (तरल) चढ़ा कर डाक्टर ने मुझे कायम करके घर भेजते। कुछ दिनों बाद मैं पुनः शराब शुरु कर देता और अस्पताल जा पहुँचता। बार-बार दौरे पड़ने का कारण जानने के लिये डाक्टरों ने मेरे बल्ड टैस्ट, ई.सी.जी, स्क्रीनिंग करने के पश्चात् मेरी इण्डोस्कोपी करने की सोची।
इण्डोस्कोपी का माहिर मुझे बेहोशी का टीका लगा कर नर्सों को कहने लगा, ‘‘मैं दस मिन्ट के लिये बाहर चला हूं। जब यह बेहोश हो जाये। मुझे बुला लेना।’’
डाक्टर आधे घंटे बाद आया तो मैं बेहोश होने की बजाय (जगह) नर्सों को चुटकले सुना रहा था। यह देखकर डाक्टर को बड़ी हैरानी हुई। मेरा शरीर सुन्न हुआ है या नहीं, यह परखने के लिये डाक्टर ने मुझे सुई चुभा कर देखा। सुई लगते ही मेरा हाथ अपने आप से पीछे की ओर खींचा गया।
मैंने डाक्टरों से कहा कि मैं टीकों (इंजेकश्नस) के साथ बेहोश होने वाला नहीं हूं। दौड़ कर बोतल पकड़ लाओ। फिर जैसे मर्जी कैमरे मेरे अंदर डाल कर देखते रहना।
डाक्टर संजीदा होते हुये मुझे कहने लगा, ‘‘मिस्टर सिद्धू, यह मज़ाक की बात नहीं है। मुझे ये अच्छी निशानियां नहीं लगती।’’
डाक्टर ने तेज और दोहरी मात्रा का टीका लगा कर मेरी इण्डोस्कोपी की। तीन-चार घंटों के बाद होश आई और डाक्टर रिपोर्ट लेकर मेरे पास अया और कहने लगा, ‘‘ज्ीमतम पे ं हववक दमूे ंदक इंक दमूेण् पहले कौन सी सुननी पसंद करोगे’’?
मैंने डाक्टर से कहा, ‘‘पहले बुरी आने दो।’’
‘‘बुरी खबर यह है कि तेरा लीवर डैमेज़ (नष्ट) होना शुरु हो गया है और यदि तुम इसी भांति पीते रहे तो मुझे नहीं लगता कि तुम छहः महीने भी और जी सकोगे अच्छी खबर यह है कि यदि अब तुम शराब छोड़ दोगे तो इस नुक्सान की मुरम्मत हो सकती है। लेकिन इसमें भी वक्त लगेगा। सोच लो शराब छोड़ दो, नहीं तो शरीर छोड़ना पड़ेगा। तुम्हारी अभी उम्र ही क्या है? समझदार बनो, शराब सेहत के लिये बहुत हानिकारक है। खासकर के जिस मात्रा में तुम पीते हो।’’
डाक्टर मुझे वार्ड में भेजने का हुक्म देकर चला गया। वार्ड में लेटा हुआ मैं गंभीर विचारों के प्रवाह में बहता हुआ सोचने लग पड़ा कि शराब की बोतल के ऊपर भी लिखा होता है कि शराब सेहत के लिये हानिकारक है, फिर भी हम पीने के समय पर ढील नहीं करते। नर्स मेरा ब्लैड प्रैशर चैक करने आई और मुझे उदास देख कर उत्साह बढ़ाने के लिये कहने लगी, ‘‘कोई बात नहीं फिक्र मत करो। सब ठीक हो जयेगा। अब शराब मत पीना। शराब बहुत बुरी चीज़ है।’’
नर्स के इतना कहने पर ही मैंने जबरदस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट लाई और उसे चुटकुला सुनाने लग पड़ा, ‘‘नर्स इसी भांति एक शराबी को डाक्टर कहने लगा कि तू शराब छोड़ दे, नहीं तो मर जायेगा। मैं तुझे कितनी बर समझा चुका हूं कि शराब बुरी है। आगे से शराबी ने जवाब दिया कि डाक्टर साहब मैं शराब तो बढ़िया ही पीता हूं। शराब तो बुरी नहीं है। क्या करूं साला लीवर ही कमज़ोर निकल गया।’’
फ्रैंक सिनाटरा ने लिखा है, ष्।सबवीवस उंल इम उंदश्े ूवतेज मदमउलए इनज जीम इपइसम ेंले सवअम लवनत मदमउलण्ष् मैंने भी डाक्टर की चेतावनी की परवाह नहीं की और पहले की भांति बादस्तूर पीता चला गया। मेरी सेहत बद से बदतर होती चली गई। मेरे दोस्त साबी की माता जी का देहांत हो गया और उनके अंतिम संस्कार पर पहुंचने के लिये मैं एक दिन पहले ही लंदन को चल पड़ा क्योंकि अगले दिन मौसम खराब हो जाना था। रात को मुझे आर्टिस्ट अच्छर सिंह के यहां ठहरना था। मेरी सभी पुस्तकों के कवर आर्टिसट अच्छर सिंह द्वारा बनाये हुये है। इस लिये अच्छर सिंह के साथ मित्रता वाले संबंध बने हुये है। जब वह ब्रमिंघम आता है तो मेरे पास आ जाता है और जब मैं लंदन जाता हूं तो उससे अवश्य मिलता हूं।
मैं सलोह जाकर कोच स्टेशन पर उतरा तो मुझे एकदम से चक्कर आ गया और दिमाग बिल्कुल बलैंक हो गया। मैं कौन हूं और कहाँ आ गया हूं। मैं सब कुछ भूल गया, जबकि मैं एक बार नहीं अनेकों बार वहाँ जा चुका था और उस क्षेत्र का पूरा जानकार था। लेकिन सब कुछ मुझे पराया-पराया सा लग रहा था। मेरी हालत हू-ब-हू गज़नी फिल्म के आमिर खान जैसी थी। मैं ऐसे ही सड़क पर इधर-उधर भटक रहा था कि अच्छर सिंह आ गया। मैंने उसे भी नहीं पहचाना और चुपचाप उसके साथ चल पड़ा। अच्छर सिंह के घर पहुंचने तक मुझे थोड़ा-थोड़ा याद आने लगा। अच्छर सिंह खाना बनाने लग पड़ा और मैंने जेब में हाथ मारा। मेरी जब में सुखमनी साहिब का गुटका (धार्मिक पुस्तक) थी। मैं गुटके से पाठ करने लग पड़ा। (तब मैं नास्तिक नहीं बना था।)
अच्छर सिंह ने खाना बना लिया और पाठ करके मैंने गुटका रख दिया। मैं पहले से काफी बेहतर महसूस कर रहा था। बातें करते हुये हमने दो-दो पैग लगाये तो मेरे मस्तिष्क के सारे कपाट खुल गये। ऐसे लगा जैसे दसवां द्वार भी खुल गया होता है। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, हां बाते करते-करते कभी-कभी मैं विष्य अवश्य भूल जाया करता था। मैंने ब्रमिंघम लौट कर अपने डाक्टर को इसके बारे में बताया। उसने मेरा सी टी हैड स्कैन करवाया। मैं ैीवतज जमतउ उमउवतल सवेे से पीड़ित था। फिर अक्सर मेरी एकदम थोड़ी देर के लिये याददाश्त जाने के कई हादसे हुये। मैं शराब पीता चला गया और मेरी हलत बिगड़ती चली गई। मैं नीम पागल हेने की हद तक चला गया। जिसे मैडीकल भाषा में च्ंतंदवपक च्मतेवदंसपजल क्पेवतकमत होना कहते हैं। मुझे भांति-2 की आवाज़ें सुनाई देने लगती या मुझे अपनी समीप कोई बैठा हुआ होना दिखने लग पड़ता। मैं उसके साथ बातें करता रहता। लेकिन वास्तव में मेरे पास कोई भी नहीं होता था। कुछ देर बाद जब परिवार के लोगों ने बताना तो मुझे हैरानी होती। खैर! इलाज चलता रहा। अंगे्रजी में कहते हैं, ष्। उंद ूीव म्गचवेमे ीपउेमस िूीमद ीम पे पदजवगपबंजमकए ींे दवज जीम ंतज व िहमजजपदह कतनदाण्ष् आम तौर पर जब कोई व्यक्ति शराब पी लेता है तो वह सच बोलने लगा जाता है। लेकिन मेरा मामला बिल्कुल उल्ट है। मैं शराब पीकर कुल दुनियां का झूठ बोलने लग जाता हूं। मेरी इस आदत ने मेरी नाज़ुक स्थितियों में बहुत फायदा किया है।
वुल्वरहैंप्टन की एक लेखिका और उसके अपाहित पति ने मुझे एक केस में फंसाने के लिये मेरी बातों की रिकार्डिंग की और बार-बार उस केस के साथ संबंधित मेरे से सवाल पूछे। हर बार मैं मनघड़त जवाब देता रहा। वे इतने मूर्ख निकले कि जब मैं चुप करता तो रिकार्डर पोज़ कर लेते। इस तरह मैंने जानमूझ कर उनसे रिकार्डपोज़ करवा कर वह रिकार्डिंग वोऐड करवाई। बातचीत के दौरान मेरी पी हुई मदिरा का नशा उतर गया और उस लेखिका के सामने मैंने उसका वह इतिहास उसके पति को बताया जो उस लेखिका के फरिश्ते भी नहीं जानते थे। फिर मैंने उस लेखिका के ऊपर एक कहानी भी लिखी, जिस दिन छपेगी उन्हें मुँह छुपाने के लिये भी जगह नहीं मिलेगी। उन्हें मेरे ऊपर उस बात का गुस्सा है, जिस बात से मेरा कोई संबंध ही नहीं है। यह पहुंची हुई शरीफ एवं चमत्कारी लेखिका आज भी अपने पुराने आशिक और पंजाबी के लंदन रहते लेखक के पास रातें बिता कर आती है और अपने पति को बुद्धु बनाये जा रही है। वैसे असली पति और उसके इकलौते बेटे का बाप तो कोई और था जिसे ये कई साल पहले नयें के चाव (उल्लास) में छोड़ कर चोरी भाग आई थी।
एक शराब न पीने वाला व्यक्ति ही दूसरे की शराब छुड़वा सकता है ना कि एक शराबी दूसरे शराबी की। मैं और सुक्खी समुंदरी लगभग समान उम्र के हैं और लगभग एक ही समय से हमने लिखना शुरू किया। बैलज़िम सुक्खी की शराब वाली दुकान पर हर सुबह हैंगओवर के साथ जूझते हुये हम प्रण करते कि आज नहीं पियेंगे। लेकिन बड़ी मुश्किल से तीन बजते और हम एक दूसरे से पूछने लगते, ‘‘आज कौन सी पी जाये?’’
हमारी इस हालत पर चुटकुला बड़ा बढ़िया फिट होता है। जो इस प्रकार हैः- दो तीन शराबी रात की शराब के असर के कारण लस्सी (छाछ) पीते हुये कहते हैं, यार शराब बहुत बुरी चीज़ है। चलो सब कसम खायें कि अब नहीं पियेंगे। सब कसम खा लेते हैं। अगले दिन सुबह होते ही उठ खड़े होते हैं और एक दूसरे से पूछते हैं, ‘‘क्यों रात किसी ने पी।’’ सभी नहीं में सिर हिलाते हैं। उनमें से एक जोश से कहता है कि हम में से किसी ने कसम नहीं तोड़ी। चलो इसी खुशी में एक-एक पैग लगा लें।
गाने वालों को तो हम यह कह कर बरी कर सकते हैं कि वे अनपढ़ हैं। लेकिन मैं और सुक्खी तो पढ़े लिखे घरों के लड़के थे। मैं चंडीगढ़ के कानवैंट स्कूलों और इंग्लैंड में पढ़ा लिखा था। मेरे डैडी लंबा समय शिक्षा विभाग में उच्च पद पर रहे और वे स्वयं भी उच्च शिक्षा प्राप्त किये हुये थे। दूसरी तरफ सुक्खी की माता जी भी अध्यापिका रह चुकी थी। हम न सिर्फ लेखक ही थे, बल्कि सुक्खी ने अपना युवा एवं छोटा भाई शराब पीकर मरते हुये देखा था और मैंने भी अपने दो जवान लठ जैसे तगड़े मामों को शराब पीकर मरते हुये देखा था। इन झटकों के बाद भी हम रोज दिल भर कर पीते। सुक्खी पहले आऊट हो जाता तो मैं उसे कहता, ‘‘सुक्खी तू अब और मत पीना। तू मुझे धुंधला-धुंधला दिखाई देने लग पड़ा है।’’
सुक्खी खुद टल्ली होकर मुझे कहने लग जाता, ‘‘तू बस कर। तेरी जुबान थथलाने लग पड़ी है। बाकी बची मैं पी लेता हूं।’’ इस प्रकार हम लोग बिन नागा रोज दिल भर कर पीते। सुक्खी तो अपना कोटा पूरा करके नौ-दस बजे तक बिना होश में रहे सो जाता। मैं धीरे-धीरे घूंट-घूंट करके पीता रहता और रात के बारह-एक बजे तक दुकान संभालनी होने के कारण कैसे ना कैसे खुद को होश में रखता। दुकान बंद करते ही मैं और एक अन्य दोस्त बबलू, नाईट-क्लब चले जाते और सुबह के छह बजे तक पीते रहते। फिल्में, गीतों और साहित्य द्वारा शराब और अन्य नशों का प्रचार भी फनकारों को नशों का सेवन करने के लिये उकसाता है। मुहम्मद नज़ीर और सुरिंदर सोनिया का एक गीत है, ‘‘तेरे वीरां मैनू दारू ना पिलाई जिना नू वड्डे सेठ दसदी।’’ आगे से जवाब है, ‘‘पाणी वांगू पीण बोतलां, साडे घर दे सतारां ठेके।’’
बड़े-बड़े साहित्यकार खासकर गज़लगो अपनी रचनाओं को शराब के वर्णन के बिना अधूरा मानते आये हैं। मिर्ज़ा गालिब, खुसरो, उम्र ख्याम और हरिवंश राय बच्चन की ‘‘मधुशाला’ शायरी की धुरी ही शराब ही है। फनकारों के भीतर यह गल्तफहमी पैदा हो जाती है कि शराब या अन्य नशे उनकी कला को निखारते या सृजनात्मक शक्ति में बढ़ोतरी करते हैं। कुंदन लाल सहगल छोटे-मोटे गायक के पैर नहीं लगने देता था। वह अक्सर शराब में टल्ली होकर रिकार्डिंग करवाया करता था। कई बार तो वह इतना शराबी हो जाया करता था कि संगीतकार नौशाद को रिर्काडिंग कैंसल करनी पड़ती थी।
शराब के नशे में बुरीतरह जकड़ा होने के कारण शराब का वर्णन मेरे द्वारा रचित साहित्य में आना आवश्यक था। मेरी दो चार कहानियों को छोड़कर हर कहानी में मैंने पात्रों को शराब पिलाई। मेरी कहानी ‘मोरां का महाराजा’ जितनी महाराजा रणजीत सिंह की कहानी है, उतनी ही मेरी है। उसमें जो रणजीत सिंह के साथ घटित हुआ ठीक वही उसी प्रकार मेरे साथ भी घटित हुआ था। अचानक ही एक बार मुझसे लिखा गया था कि कहानियां वही रहती हैं, महज़ पात्र बदल जाते हैं। शराब का इतिहास सब नशों से पुराना है। प्राचीन आर्य लोग भी सोम रस का सेवन करते थे और देवी-देवताओं को रिझाने के लिये शराब के भोग (प्रसाद) लगते थे। शराब के इतिहास का जिक्र मैंने अपनी कहानी ‘नंगीआं अक्खां’ की एक पात्र पैम के मुख से कुछ यूं करवाया हैः-
इस बार उसे शराब पहले जितनी कड़वी नहीं लगी और धीरे-धीरे चढ़ने भी लगी। हाथ ऊपर उठा कर गिलास को आँखों के बराबर करते हुये परमजीत रीझ लगाकर काँच के बीच से शराब को देखने लगी, ‘‘वाह! क्या लाजवाब चीज़ है। पीते ही गम भूल जाते हैं और शरीर में मस्ती आ जाती है। मैं तो शराब की खोज करने वाले पर वारी-वारी जाती हूं। कई बार सोचती हूं कि शराब बनाने की तकरीब इंसान के दिमाग में कैसे आई होगी?’’
शैली ने अपनी बची हुई दो घूंटे अंदर फेंकी और अपना गिलास खाली करके नीचे रख दिया, ‘‘यह सब एक्सीडेंटली हुआ था।’’
‘‘ऐक्सीडेंटली? - वह कैसे?’’
परमजीत ने शैली की तरफ जिज्ञासा (हैरानी) से देखा।
‘‘हां, पुरातन काल में अभी जब तक मानवीय सभ्यता विकास के रास्ते पर पड़ी ही थी, उस समय की बात है। उन दिनों में आदि मानव गुफाओं में रहा करता था। रात के अंधेरे के डर के कारण वह गुफा से बाहर नहीं निकला करता था। इस लिये दिन के समय में ही जंगली जानवरों का माँस और फल तोड़ कर रख लेता था, जो वह रात के समय भूख लगने पर खा लिया करता था। इसी भांति तब कहीं गुफा में कुछ अंगूर बच रह गये। समय बीतने पर अंगूर गर्मी के कारण गल गये। अंगूर के बीच की मिठास (शक्कर) के परस्पर छूने से छिलके के ऊपर आई फफूंदी में से खमीर उठा, अर्थात् थ्मतउमदजंजपवद च्तवबमेे हुआ। इस प्रकार लाहन में हुई जीव (जैव) रासायनिक क्रिया ने फल की मिठास को नशीले तरल में बदल दिया। कुछ दिनों बाद आदि मानव ने रात को आहार की तलाश में हाथ मारा। भोजन समाप्त हुआ होने के कारण उसने अंगूरों की गाव (तरल) को चखा, तो उसे नशा अनुभव हुआ। बस फिर क्या था? हमेशा ही आदि मानव अंगूरों को गला कर पीने लग पड़ा। इस प्रकार मूल रासायनिक क्रिया के सिद्धांत के साथ मानव ने शराब बनानी आरंभ कर दी। तब से लेकर आज तक शराब ने घड़ों (मटकों) ढोलों से होते हुये बोतलों तक का लंबा सफर तय किया है।’’
‘‘अच्छा।’’ परमजीत ने शैली की जानकारी से प्रभावित होते हुये सिर मारा। ‘‘यह तो था इतिहास। लेकिन मिथिहास में हज़ारों साल पहले ही शराब की उत्पत्ति हो जाने का जिक्र आता है। पुराण में एक कथा यूं आती है कि देवताओं ने खीर समुद्र में सुमेर पर्वत को मधानी (मंथनी) बना कर फेंक (डाल) लिया और शेष नाग को उस पर रस्सी की भांति लपेट लिया। एक तरफ से देवताओं ने खींचा और दूसरी तरफ राक्षस लग गये। उन्होंने दबा कर समुद्र को मंथा और उसमें से चैदह अद्भुत पदार्थ निकले। जैसे कि श्रवा घोड़ा, कामधेनु गाय, कल्प-वृक्ष, रंभा अप्सरा, लक्ष्मी, चंद्रमा, धनवंतरी, पांचजनय (पंचमुखी) शंख, कौस्भमणि, सारंग धनुष, ऐरावत हाथी, अमृत, मदिरा एवं विषय (जहर)। इनमें से पहली तेरह चीजें तो धोखे के साथ देवता ले गये और रत्न कहा जाने लगा। चैदहवीं ज़हर बेचारे राक्षसों के हिस्से में रह गई। इसी कारण से विष को रत्नों में नहीं गिना जाता। इसी प्रकार अब भी मदिरा अर्थात् शराब को तेरहवें रत्न के तौर पर जान जाता है। (नंगीआं अक्खीयां, पृष्ठ नं. 76-77)
शराब की अलामत से निजात पाने के लिये भिन्न-2 देशों की सरकारें थक गई और असफल रही। एस.एस सवाहने के लेखक ;च्तवीपइपजपवद इपक पद डमकपमअंस प्दकपं ;ज्ीम ज्तपइनदमए 24 थ्मइ 1980द्ध के अनुसार भारत में सबसे पहले शराबबंदी अलाऊदीन खिलजी ने लागू की थी। फिर औरंगजेब ने भी इसे रोकने की नाकाम कोशिश की।
मेरे पास कब से अलग से रखी एक बोतल पड़ी थी। तब मैंने तनदीप जी के ये शब्द पढ़े, ‘‘क्या शराब... जिंदगी और सेहते से... ज्यादा अच्छी है? माणक को भी यह बात पता थी कि यदि वह यूं ही दारू (शराब) पीता रहा तो....लेकिन फिर भी उसे अपने परिवार... अपने चाहने वालों का ख्याल नहीं आया? क्यों मति मार देते हैं ये नशे? आखिर क्या रखा है इस शराब में...’’ तो मेरा मन झकझोर गया। मन में सोचा, ‘‘इतु मदि पीतै नानका बहुते खटिअहि बिकार।’’ (पृष्ठ 553) सचमुच ही शराब मति मार देती है। शराब का सेवन करने के बाद मनुष्य को अपने आप की भी सूझ नहीं रहती। अन्य किसी के बारे में उसने क्या सोचना है। गुरबाणी भी इस बात की गवाही भरती हैः-
‘‘जितु पीतै मति दूरी होई बरलू पवै विच आई।।
अपना पराया न पछाणई खसमहु धक्के खाई।।
जितु पीतै खसअु विसरै दरगाह मिलै सजाई।।
झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाई।। (पृ. 55)
खुद जी भरकर शराब पीने वाला शेक्सपीयर अपने नाटक ओथैलो के एक्ट 2, सीन 3, 1.291 पृष्ठ पर अपने पात्र के मुख से कहलाता है, ष्व् ळवकए जींज उमद ेीवनसक चनज ंद मदमउल पद जीमपत उवनजीे जव ेजमंस ंूंल जीमपत इतंपदे! ज्ींज ूम ेीवनसकए ूपजी रवलए चसमंेमदबमए तमअमस ंदक ंचसंनेम एजतंदेवितउ वनतेमसअमे पदजव इमंेजेण्ष् (हे, ईश्वर! खुशी-खुशी दुश्मन (शराब) को मुंह में डालते हैं कि वह उनकी अक्ल चोरी कर ले और फिर मौज मस्ती में झल्ले हो, वे अपना आप एक पशु में परिवर्तित कर सकें।)
मेरे दिमाग में एक ख्याल आया कि बोतल घर में पड़ी देख कर कहीं पीने का मन न कर आये। मैं फौरन गार्डन में जाकर बोतल तोड़ कर आया। यह जिंदगी में पहली बार हुआ है जब मैंने शराब की बोतल तोड़ी हो। हां यह बाकी पता नहीं कि यह प्रण कब तक निभा सकूं। मेरी भांति ही एक शराबी ने शराब से तौबा करने की सोच कर बोतल उठाई और उसे मुखातिब होकर कहने लगा, ‘‘तुझे पीकर मेरी नौकरी गई। चल बाहर।’’ गली में फेंक कर बोतल तोड़ देता है। दूसरी बोतल उठाता हुआ कहता है, ‘‘तुझे पीकर मेरा घर बिक गया। चल बाहर। दूसरी बोतल भी तोड़ देता है। तीसरी बोतल उठाई, ‘‘तुझे पीकर मेरी घरवाली मुझे छोड़ कर चली गई। चल बाहर।’’ तीसरी बोतल भी चूर-चूर कर देता है। फिर चैथी बातल के हाथ डालता है तो वह सीलबंद भरी हुई निकलती है। शराबी उस बोतल को कहता है, ‘‘तू एक तरफ हो जा, तेरा कोई कसूर नहीं।’’
लेकिन मैंने वास्तव में ही भरी हुई बोतल तोड़ी थी। अब सोचता हूं कि शोहरत और कला में ही नशा तो बहुत होता है फिर अन्य नशों का सहारा लेने की क्या जरूरत है। अब ठण्डे दिमाग से सोचता हूं तो शराब से नफरत होती है। कितना नुक्सान करवाया है मैंने इस शराब की वजह से। थौमस जै जैक्सन ने कितना सही कहा है, ष्प् ंउ उवतम ंतिंपक व िंसबवीवस जींद व िंसस जीम इनससमजे व िजीम मदमउलण्ष्
मुझे जब कोई कहता है कि तुम में इतना टैलेंट है, ते शराब पीकर यूं ही क्यों गंवा रहा है तो मुझे मिर्जा गालिब का शेयर याद आ जाता हैः-
वुह मसाईल-ई-तस्सवफ, वहु तेरा ब्यान गालिब,
तुझे हम वली समझते जो ना बादा-खवार होता।
हिन्दी में इसका अर्थ कुछ इस प्रकार होगा, ‘‘तेरा रब्ब का वर्णन वाह साईं, और गालिब कड़क ब्यान तेरा। यदि पीने की तुझे ना मार होती, हमारे लिये तू वली अवतार होता।’’
मैं खुशकिस्मत था मेरे दोस्तो जैसे पाठकों ने मेरी शराब छुड़ाने के लिये पूरा जोर लगाया और इसमें सबसे अहम भूमिका भूतपूर्व कौंसलर जोगिंदर सिंह बॅल के भतीजे सरबजीत सिंह बल्ल, सलोह की रही। उस ने बहाने से मुझे बुलाकर अपने घर में रखा और मुझे शराब पीने नहीं दी। शराब के बिना मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ ऐड़ियां रगड़ने लगा। मुझे मालूम था कि मुझे शराब की कितनी तलब हो रही थी। मैंने साबी से कहा मुझे थोड़ी सी पी लेने दे, नहीं तो मैं मर जाऊंगा। लेकिन उसने पीने नहीं दी और मुझे अस्पताल ले गया। साबी ने मुझे शराब छोड़ देने के लिये मजबूर कर दिया और मैं पुनः लिखने में सरगर्म हो गया। जापान की साकी, गोआ की फेनी, नेपाल की ताड़ी, स्काॅटलैंड की स्काॅच, पंजाबी की रूड़ीमार्का जुगनी, रशिया रूस की वोदका, विशेष यह कि हरेक देश की हर तरह की शराब पी कर देख ली। इंसान खत्म हो जाता है, शराब समाप्त नहीं होती। हमारा लोकगीत है- जिसमें लड़की की तुलना शराब से करते हुये शायर ने लिखा है, ‘‘नशे दीये बंद बोतले, तैनू पीणगे नसीबां वाले’ अब यदि इसे शराब के ही संदर्भ में देखें तो शराब बंदे को पी जाती है, लेकिन आज तक वह नसीबो वाली माई का लाल पैदा नहीं हुआ, जिस ने शराब को पिया हो और जिसको शराब ने ना पिया हो। जैसे मछली पत्थर (पाषाण) को चाट कर वापिस लौटती है, वैसे ही मैं लौटा हूं। शराब से तौबा करने के लिये दिमाग ने कहा, ‘‘मन तू ज्योति स्वरूप है अपना मूल पहचान।।’’ (पृष्ठ 441)
अब तक जो खो चुका था, वह पुनः धीरे-धीरे वापिस आ रहा है। साईनिंका ने कहा है, ष्क्तनदामददमदमेे पे दवजीपदह मसेम जींद ं अवसनदजंतल उंकदमेे ंदक ेजमच जवूंतके ेनपबपकमण्ष् माणक के मुकाबले मैं तो कुछ भी नहीं। माणक के चेलों और प्रशंसकों को यह सवाल खड़ा करता हूं कि उन्होंने ऐसा प्रयत्न क्यों नहीं किया? चार दिन माणक के बारे में जिक्र करेंगे और फिर भूल जायेंगे। अब लोग अपने स्वार्थ के लिये माणक के नाम पर मेले लगायेंगे। गायक उन मेलों में आयेंगे और अपने आप को प्रमोट करके अपने राह चलते बनेंगे। यह कड़वी सच्चाई और दुनियां की रीत है। जैसे कहते हैं ‘बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां, सुभान अल्लाह’ युधवीर तो माणक से भी अधिक नशों का आदी हो चुका है। माणक के लिये उसके चाहने वाले कुछ नहीं कर सके। (उसके जीवित रहने पर इलाज का खर्च दिये बिना) तो कम से कम माणक के बेटे युद्धवीर को शराब और नशों से दूर रख कर गायकी में खड़ा करने के लिये जोर ही मार लें!!! शराब के अज़ाब में से निकलने के बाद मेरी तो यही प्रार्थना है कि ‘दिक हो, सिल हो, प्लेग हो, कोई भी भारी आज़ाब हो। मगर ए खुदा दो जहां, ना किसी को शौंक-ए-शराब हो!’ इस लेख को लिखने का मेरा मकसद यही है यदि आप किसी फनकार के कदरदान हो तो उसे नशा करने से रोको। आल्मा इकबाल लिखता है
‘‘नशा पिला के गिराना तो सबको आता है।
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साकी।’’
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