औरत...औरत...औरत...
घर से जाते हुए भोली के डैडी की पीठ को मैं देखती रह गई थी। ये गए... वो गए। पल में ही पता नहीं कहाँ गायब हो गए।
हमारी बेटी भोली हमारे नज़दीक ही रहती है। मैंने सोचा उसके पास ही गए होंगे। पर अब बेटी के घर आने पर पता चला कि वह तो यहाँ भी नहीं आए।
शायद फिर किसी के पास और दारू पीने चले गए होंगे।
हाय रब्बा ! यह मैं क्या कर बैठी। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। भोली के डैडी यदि ऊँची आवाज़ में गंदी गालियाँ बक रहे थे तो मुझे चुपचाप सुनते रहना चाहिए था। मेरा क्या नमक बिखरता था? पति के आगे नहीं बोलना चाहिए। अगर वह नशे में थे तो मैं तो होश में थी। जब वह मुझे थप्पड़ मारने के लिए आगे बढ़े थे तो मुझे उनका हाथ हर्गिज हर्गिज नहीं रोकना चाहिए था।
टूट जाएँ मेरे ये कमबख्त हाथ ! हालांकि मैंने उनकी कलाई अपने बचाव के लिए ही पकड़ी थी, पर है तो यह विद्रोह ! है न ? शायद उन्हें कितना बुरा लगा होगा।
मैंने भोली के डैडी की तनी हुई बांह बहुत देर तक मजबूती से पकड़े रखी थी। वह मेरी तरफ घूर घूरकर देखते रहे थे और अपनी बांह छुड़ाकर मुँह में मुझे बुरा भला कहते हुए बाहर चले गए थे। कहाँ जा रहे थे यह भी बताकर नहीं गए थे।
ऐसे ही मुझे अपने बापू जी की घर से बाहर जाते हुए की पीठ दिखाई दिया करती थी। मेरा बापू भी शराब पीकर लफ्फड़ों से मेरी माँ का मुँह माथा तोड़ दिया करता था। माँ को पीट पीटकर हाथ हल्के करने के बाद बापू बाहर निकल जाया करता था और जब पाँच सात घंटों के बाद वापस लौट आता था तो माँ बापू दोनों का गुस्साढीला पड़ चुका होता था। माँ बिल्कुल भी मुँह नहीं खोलती थी बापू के आगे।
पर मैंने जो किया हैए पता नहीं सही है या गलत घ् मुझे बिठाकर भोली खुद रसोई में चली गई है। मुझे यहाँ बैठ कर क्या करना है घ् दरवाज़े की घंटी बजती है। सोचती हूँए काम करती भोली को क्या परेशान करनाए मैं ही उठकर दरवाज़ा खोलती हूँ। नहींए होसकता हैए भोली के डैडी ही हों ! बैठी रहती हूँ। भोली ही खुद खोलेगी। मैं दीवार से कान लगाकर सुनूँगीए क्या क्या चुगलियाँ करते हैं ये मेरी बेटी के पास। अरे ! यह कौन आया जिसके घुसते ही भोली लड़ने लग पड़ी है?
थू ! कैसी गालियाँ बके जा रही है यह बेशर्म लड़की!
"आ गया कंजर ! अभी भी क्या ज़रूरत थी आने की? बैठा रहता वहीं। हरामजादे ! मैंने बीस बार कहा है कि शराब पीनी होती है तो मेरे घर में पैर न रखा कर। कहाँ सुनता है तुझे ! ठहर जाए मैं बनाती हूँ आज तुझे अच्छी तरह बंदा..."
तड़ाक ! तड़ाक !! आह ! भोली तो थप्पड़ मारने लग पड़ी।
उसको दहलीज़ से बाहर निकालकर भोली ने भड़ाक से दरवाज़ा बंद कर लिया है।
खिड़की में से मुझे बाहर वापस जा रहे अपने दामाद की पीठ दिखाई दे रही है।...
-अनुवाद:सुभाष नीरव

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