Wednesday, 27 July 2016

कहानी -प्रथा

प्रथा 
-बलराज सिंह सिद्धू 

इस कहानी के पात्रों की कर्मभूमि यूँ तो इस संसार में कहीं भी हो सकती है। किसी भी देश का कोई भी शहर या गांव। मगर यहाँ मैं सुविधा के लिए एशिया महाद्वीप के देश भारत के एक महानगर मुम्बई का प्रयोग कर लेता हूँ। जहाँ तक मैं जानता हूँ, यह कहानी अभी तक कहीं भी घटित नहीं हुई। लेकिन इतना मेरा निश्चय है कि काफ़ी वर्षों बाद घटेगी अवश्य। यह भी हो सकता है, थोड़े से समय के बाद ही घट जाए या हो सकता है, घटनी प्रारंभ भी हो गई हो।

ख़ैर, आओ हम आपको मुम्बई ले चलें। महाराष्ट्र प्रांत का यह शहर कभी चार्ल्स द्वितीय को दहेज में मिला था। भारत की सबसे बड़ी बंदरगाह होने के कारण उसने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के हवाले कर दिया था। इस शहर को बोम्बे, बम्बई और बॉलीवुड नाम भी भी पुकारा जाता है और यह भारत में फिल्मों के निर्माण का मुख्य केन्द्र है।

मुम्बई शहर में एक ताज़ा जवान हो रही कमसिन-सी लड़की होगी। उसका नाम प्रथा होगा। उसका कद न तो लम्बा होगा और न ही बहुत अधिक बौना। बस, समझ लो दरम्याना-सा होगा। परंतु देखने में वह नाटी ही लगेगी। वैसे उसको नाटी दर्शाना मेरी ज़रूरत भी है, क्योंकि गिट्ठी स्त्रियाँ अधिक कामुक होती हैं। एक कहावत है - बड़े के मुकाबले छोटा हथियार फानी, औरत कामी और मर्द गुणी-ज्ञानी होता है।

रंग भी उसका कुछ सांवला-सा ही होगा। पर नयन-नक्श की बनावट खूबसूरत होगी। जिस कारण देखने में वह खूब हसीन लगेगी। सांवली-सलौनी, सुंदर और नवयौवना होने के कारण उसका कोई प्रेमी भी अवश्य होगा, जो उसकी तरह ही आकर्षक, बांका और छैल-छबीला नौजवान होगा। बेशक प्रथा के माता-पिता दोनों नौकरी करते होंगे, मगर फिर भी वह होंगे गरीब। क्योंकि एक तो उनका वेतन कम होगा, ऊपर से परिवार बड़ा होगा। गरीब होने के कारण वह किसी घटिया-सी बस्ती में किराये की खोली में रह रहे होंगे। रोज़ाना का जीवन उनका तंगी-तुर्शियों के साथ दो हाथ करते ही बीतेगा। जिस कारण उनके हृदय में सुख-सुविधा के साधनों और ऐश्वर्य भरपूर जि़न्दगी जीने की लालसा भी होगी।

नित्य प्रेमी से मिलने की खातिर बसों में धक्के खाती प्रथा के दिल में कारों में घूमने और महंगे बंगलों में रहने की चाहत पैदा हो जाएगी। जो दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाएगी।

एक दिन प्रथा अपने प्रेमी की बस-स्टॉप पर खड़ी होकर प्रतीक्षा कर रही होगी। बहुत देर तक इंतज़ार करने के बाद भी जब बस नहीं आएगी तो वह प्रेमी को मिलने का इरादा बदल लेगी। वहाँ से चलकर वह सड़क के दूसरी तरफ जाने के लिए चल देगी, जहाँ उसके अपने घर को जाने वाली बस रुकती होगी। अभी वह रास्ते में ही होगी कि उसको देखकर कुछ लफंगा किस्म के लड़के सीटियाँ बजाएँगे। प्रथा उन छेड़ने वाले लड़कों को देखकर थूकती हुई उनसे अपना चेहरा घुमा लेगी और ‘गुंडे, मवाली, लुच्चे’ आदि गालियाँ अपने मुँह में बकती हुई अपनी अड्डे की ओर दौड़ जाएगी।

अड्डे पर पहुँचकर अभी प्रथा खड़ी ही होगी कि उसके पास आकर एक कार रुकेगी। कार का शीशा आहिस्ता-आहिसता नीचे होगा। कार में एक अधेड़ उम्र की काले-से रंग की बदसूरत और मोटी सी औरत हीरों के हार पहने बैठी होगी।
“जानी, आ बैठ। चलें।” कार वाली औरत प्रथा के पीछे खड़े एक बने-ठने दुबले-पतले और सुंदर से लड़के की ओर देखती हुई कहेगी।

वह लड़का एकदम दौड़कर जाएगा और उस औरत के साथ जाकर कार में बैठ जाएगा। औरत लड़के के मुँह के साथ मुँह जोड़ लेगी। औरत के होंठों से उतर कर लाली लड़के के होंठों से लग जाएगी।

प्रथा उनकी हरकतें देखकर गर्दन झुका लेगी और उन्हें अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाने के लिए झूठ-मूठ खाँसेगी। वह औरत प्रथा को देखकर नाक-मुँह चढ़ायेगी और गुस्से में कार का शीशा बंद करके कार वहाँ से भगाकर ले जाएगी।

प्रथा दूर तक निगाह दौड़ाएगी। उसको अपनी बस कहीं भी नज़र नहीं आएगी। निराशाजनक दृष्टि का रुख अपने पैरों की तरफ करती हुई प्रथा उस लड़के और औरत के बारे में सोचने लग जाएगी। कहाँ वह मोटी-सी बूढ़ी घोड़ी औरत और कहाँ यह भीगी मसों वाला नाजुक-सा युवक। क्या मेल हुआ भला ? प्रथा ऐसी सोच की तानी में उलझी पड़ी होगी कि उसके पास आकर एक और कार रुकेगी। प्रथा इस कार को पहचानती होगी। इस में से उसका बॉस निकलकर प्रथा के पास आ जाएगा और पूछेगा, “घर नहीं गई ? अभी तक यहीं खड़ी है प्रथा ?”

“हाँ सर, कमबख्त एक भी बस नहीं आई।”

बॉस अपनी महंगी और लक्जरी कार की ओर संकेत करेगा, “बस का क्या भरोसा ? तू मेरे साथ आ, मैं तुझे तेरे घर तक छोड़ आता हूँ।”

“नहीं सर, शुक्रिया।”

“शुक्रिया तो तू उस समय करना जब मैं तुझे घर पहुँचा दूँगा।”

“जी मेरा मतलब था, आप तकलीफ न करें। मैं खुद चली जाऊँगी। बस, अभी आने ही वाली है।”

“इतनी देर से नहीं आई तो अब कहाँ से आ जाएगी।”
बॉस प्रथा की बांह पकड़कर उसको अपनी कार की ओर खींचेगा। प्रथा पहले तो पराये मर्द के साथ अकेले कार में बैठकर जाने में हिचकिचाएगी, पर फिर बारिश होने के आसार बनते देख कार में बैठ जाएगी।

प्रथा के मान जाने का एक महत्वपूर्ण कारण और भी होगा। वह यह कि बॉस बहुत शरीफ और इज्ज़तदार व्यक्ति कहा जाता होगा। कभी किसी ने उसके बारे में कुछ उल्टा-सीधा नहीं सुना होगा।

प्रथा के बैठते ही कार भीड़-भड़क्के वाली सड़क पर गोली की तरह शूं… करती हुई जाएगी। प्रथा पर प्रभाव डालने के लिए अपने मोबाइल फोन पर किसी के साथ लाखों रुपयों की डील करता हुआ बॉस कार के स्टिरियो में कोई अंग्रेजी गाना लगा देगा।

मौसम तल्ख़ और गुम्मा होगा जो अक्सर बारिश पड़ने से पहले हुआ ही करता है। परंतु प्रथा पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि प्रथा के बॉस की एअर-कंडीशन्ड कार में गरमी का कोई वश नहीं चलेगा। इस समय यदि प्रथा जनता बस में बैठी होती, एक तो वह पसीने से भीग जाती, दूसरा वह इस प्रकार आराम से बैठी न होती। बस में भीड़ होने के कारण उसको अक्सर खड़ी होकर ही सफ़र करना पड़ता होगा।

कार में बैठी प्रथा सोचेगी - कितनी ऐश करते हैं ये दौलतमंद लोग। काश ! उसके पास भी इतना धन हो और वह दुनिया का हर ऐश-ओ-आराम खरीद सके। वह अपने मन में ऐसा ही ऊटपटांग सोच रही होगी कि कार उसकी बस्ती के करीब पहुँच चुकी होगी। जब तक बारिश भी थम चुकी होगी। बस्ती से कुछ पहले ही आखि़री बस-स्टॉप पर जाकर प्रथा पर्स उठाती हुई अपने बॉस से कहेगी, “मुझे यहीं उतार दो सर। यहाँ से नज़दीक ही है मेरा घर। यहाँ से मैं पैदल चली जाऊँगी।”

“चलकर क्यों ? मैं आखि़र तक छोड़ देता हूँ।” बॉस जोश में आकर कहेगा।

प्रथा कुछ झिझकने का दिखावा करेगी। ब्रेक मारता हुआ बॉस पूछेगा, “कोई समस्या ?”

“नहीं, मुझे तो कोई समस्या नहीं। पर आपको मेरे साथ देखकर लोगों को समस्या हो सकती है। अड़ोस-पड़ोस वाले तरह तरह की बातें बनाएँगे।”

बॉस जानबूझकर प्रथा की ऊँची स्कर्ट वाली नंगी जांघ को थपथपाएगा, “छोड़ भी ऐसे अंदेसों को। अब तो सदी भी बदल गई है।”

“सदी ही बदली है सर, लोगों की सोच नहीं।”
प्रथा अपने बॉस की आँखों में आँखे डालने के बाद उससे विपरीत दिशा में अपना मुँह फेर लेगी और अपने दायीं ओर के शीशे से बाहर की ओर देखती रहेगी।

बॉस उसका तात्पर्य समझ जाएगा और उसको जहाँ वह कहेगी, वहाँ उतारने के लिए कार को रोक लेगा। कार के रुकते ही बूँदें बरसनी शुरू हो जाएँगी। वह जगह एकदम सुनसान होगी। आसपास का निरीक्षण करने के बाद बॉस मौके का लाभ उठाना चाहेगा। वह भूखे भेड़िये की तरह प्रथा पर झपट पड़ेगा। प्रथा उसके साथ हाथापोई करती हुई उसको एक-दो थप्पड़ जड़ देगी। बॉस डर जाएगा और शर्मिन्दा होकर प्रथा से माफी मांग लेगा। प्रथा उसको गालियाँ निकालने के बहाने से बरसात के थमने का इंतज़ार करती हुई कुछ देर कार में बैठी रहेगी। बारिश थमने के उपरांत वह बॉस को जुबानी इस्तीफा देकर कार में से निकलकर अपने घर की ओर चल पड़ेगी। रास्ते में जाती हुई वह झोपड़ पट्टी में से गुज़र रही होगी तो किसी खोली में से आती फिल्मी गाने की आवाज़ सुनेगी। कोई बच्चा वो गाना बहुत बढि़या गा रहा होगा। वह इतना सुंदर गा रहा होगा कि वह फिल्म में गाये गीत के गायक को भी मात दे रहा होगा। प्रथा सोचेगी कि अवसर ही नहीं मिलता, वरना कितना टेलेंट बर्बाद हो रहा है इन झुग्गियों में। वह स्वयं भी इस यथार्थ को समझती होगी कि गरीब को तो दो वक्त की रोटी कमाने से ही फुर्सत नहीं मिलती। कला की तरफ वह ध्यान किस तरह दे ? वह खुद भी बड़ी बढि़या अदाकार होगी। उसने स्कूलों, कालेजों में कई नाटक किए होंगे और अनेक इनाम जीत चुकी होगी। अदाकारी के मुकाबले में वजीफा जीतकर उसने बकायदा एक्टिंग का कोर्स भी किया हुआ होगा।

प्रथा थोड़ा आगे जाएगी तो किसी रेहड़ी पर चिपका नई रिलीज हुई फिल्म का पोस्टर देखेगी। वह रुक जाएगी और उस फिल्म की हीरोइन के साथ अपनी तुलना करेगी। निरपेक्ष रहने का यत्न करने के बावजूद वह हीरोइन की ज्यादातर खूबियों और अपनी ज्यादातर खामियाँ खोजेगी। लेखा-जोखा करने के उपरांत प्रथा के पास अधिक अंक निकलेंगे। प्रथा वहाँ से चलती हुई सोचेगी कि यदि कहीं उसको भी एक अवसर मिल जाए अपनी कला को दिखाने का तो हो सकता है, वह भी चोटी की एक्ट्रेस बन जाए और कूड़े से उठकर महलों में जा बसे। तभी, प्रथा का घर आ जाएगा।

उसके कदम चलना रुक जाएँगे, पर सोच नहीं रुकेगी और वह यूँ ही अपनी चाल से चलती रहेगी।

उस रात प्रथा सो नहीं सकेगी। रात में करवटें लेती हुई वह उठेगी और कोई फिल्मी पत्रिका उठाकर उलटने-पलटने लग जाएगी। चिकने कागज पर खूबसूरत एक्टरों के साथ पोज़ बनाकर खिंचवाई एक्ट्रेसों की तस्वीरें देखकर प्रथा का मन भी ललचाने लग जाएगा। फिल्मी सितारों की ग्लेमर्ज़ जि़न्दगी से प्रभावित होकर वह भी फिल्मी दुनिया में जाने का मन बनाएगी।

प्रथा अपनी कल्पना के माध्यम से अपने हाथों में पकड़ी हुई उस फिल्मी पत्रिका में अपनी मुलाकात और तस्वीर छपी हुई देखेगी। ख़यालों ही ख़यालों में वह अपने आप को स्टारडम के सिंहासन पर बिराजमान हुआ पाएगी। उसको अपने आलीशान बंगले के आगे धनाढ्य निर्माताओं की कतार, धड़ाधड़ हिट हो रही फिल्मों और फोन कॉल्स की झड़ी लगी दिखेगी। ऐसे सपने देखते ही प्रथा की रात बीत जाएगी।

सुबह होने पर दूध बेचने आए ग्वाले द्वारा कुंडा खटकाने के साथ प्रथा का ध्यान उखड़ जाएगा। प्रथा अपनी जगह किसी दूसरी हीरोइन की सूरत देखकर मायूस हो जाएगी।

सुबह-सवेरे तैयार होते ही वह नौकरी की बजाय फिल्म की शूटिंग देखने के बहाने किसी फिल्म स्टुडियो में जाएगी। वहाँ किसी नए चलचित्र के फिल्मांकन में व्यस्त किसी निर्देशक या निर्माता से अपने लिए काम मांगेगी। प्रत्युत्तर में वह प्रथा को डांट-फटकार कर भगा देगा। फिर प्रथा किसी दूसरे स्टुडियो की ओर जाएगी। वहाँ भी उसके संग ऐसा ही होगा। कुछ दिन प्रथा दिल तगड़ा करके काम तलाशती रहेगी। एक स्टुडियो से दूसरे में मारी मारी फिरती रहेगी। इक्का-दुक्का फिल्मों में उसको छोटे-मोटे और निहायत ही घटिया किस्म के रोल मिल भी जाएंगे। पर उनमें एक भी ऐसा रोल नहीं होगा जिसमें अपनी कला के जौहर दिखा प्रथा फिल्म इंडस्ट्री में अपनी विलक्षण पहचान स्थापित कर सकती हो या वह रोल उसको आगे और कोई तगड़ा प्रोजेक्ट दिलाने में सहायक सिद्ध हो सकता हो।
इस दौरान उसका राब्ता बहुत सारे उन जूनियर कलाकारों के साथ हो जाएगा जिनसे प्रथा की जानकारी में आएगा कि कभी वे कलाकार भी प्रथा की तरह हीरो-हीरोइन बनने के लिए आए थे। परंतु भाग्य ने साथ न दिया होने के कारण मजबूरन गुज़ारा करने के लिए उन्हें छोटे-मोटे रोल करने पड़ रहे हैं।

दो-तीन महीने की दौड़धूप और परेशान के बाद प्रथा अपनी योजना में कुछ सुधार लाएगी। लल्लू-पंजू से फिल्मकारों की मिन्नत-खुशामद करने की जगह वह बड़े-बड़े निर्माताओं और निर्देशकों का दर खटखटाने के विषय में सोचेगी। ‘धक्के खाकर कुछ बनना ही है तो क्यों न किसी अच्छे व्यक्ति की डांट-फटकार खाऊँ ?’ वह अपने टूटे सैंडल के घिसे हुए तले को परखती हुई अपने आपसे बातें करेगी।

आराम से एक जगह बैठकर वह फिल्म सनअत के इतिहास पर विचार करेगी और एक लम्बी सूची बनाएगी उन निर्माताओं की जिनकी अधिक सुपर-डुपर हिट फिल्में रही हों और जिन्होंने हीरो-हीरोइन को रातोंरात फिल्मों के शिखर पर पहुँचा दिया हो। उसके उपरांत वह उस सूची में संशोधन करती हुई उन नामों को काट देगी जो गुज़र चुके होंगे या जो इस क्षेत्र को अलविदा कह गए होंगे। काट-छांट के बाद सिकुड़ कर छोटी रह गई सूची में से प्रथा दो-तीन उन नामों का चयन करेगी जो अभी भी सक्रिय होंगे और उन नामों में से सबसे बड़े निर्देशक के साथ सम्पर्क करने का यत्न करेगी। यद्यपि वह खाली ही होगा, पर अपना मोबाइल कई रिंग जाने के बाद ही उठाएगा और जली-भुनी आवाज़ में बिना ‘हैलो’ कहे बोलेगा – “कौन है ? क्या काम है ? सीधी मतलब की बात करो, मेरे पास वक्त नहीं है।”

प्रथा सहमती सी आवाज़ में बताना शुरू करेगी, “सर, मैं हीरोइन बनना चाहती हूँ।”

“बनो फिर, रोका किसने है ?” निर्देशक और अधिक खीझ उठेगा।

“मेरे कहने का अर्थ था यदि आप अपनी किसी फिल्म में ब्रेक दे दें...।”

“हीरोइन बनने के लिए शक्ल-सूरत सुंदर होनी चाहिए।”

“सुंदर तो मैं हूँ ही।”

“यह बात तो ललिता पवार भी कहा करती थी जिसकी एक हैड लाइट में नुक्स था।”

प्रथा अपने आप को सिर से पैरों तक निहारने के बाद निर्देशक के साथ बात करती हुई अपने मधुर स्वर में भरपूर सैक्स की चाशनी मिलाकर बोलेगी ताकि निर्देशक उसकी आवाज़ की कशिश से ही उसकी शारीरिक सुंदरता का अंदाजा लगा ले, “पर मैं वाकई खूबसूरत हूँ। सोने की गिन्नियों जैसा रूप दिया है मुझे ईश्वर ने। आप एक बार देखो तो सही, यदि आपकी आँखें न फटी रह जाएं तो कह देना।”

“अच्छा ?” औरतबाज निर्देशक की उसमें दिलचस्पी जाग उठेगी।

लगते हाथ प्रथा अपने लिए राह आसान करने के मनोरथ से पूछेगी, “हाँ, तो मैं ऑडीशन के लिए आऊँ ? ”

“जब मर्ज़ी।”

“फिर भी कोई खास समय जो आपको सूट करता हो। यदि अप्वाइंटमेंट दे देते तो अच्छा था।”

“अरे मेरा सिर मत खाओ। आजकल इनडोर सूटिंग का सीज़न चल रहा है। मैं हरवक्त स्टुडियो में ही होता हूँ। किसी भी रात को आ जाना।”

“रात में ?”

“हाँ, रात में।” कहकर निर्देशक फोन रख देगा।

“रात” प्रथा अपनी मुँह से यह शब्द दोहराती हुई सिर से पांव तक काँप जाएगी। एक बार तो उसको यूँ प्रतीत होगा जैसे वह नीचे फर्श पर पड़ी हुई हो और निर्देशक उसके कपड़े फाड़कर उसके साथ बलात्कार कर रहा हो।

पल भर के लिए तो प्रथा अभिनेत्री बनने का इरादा त्याग देगी। परंतु फिर वह फिल्मी अभिनेत्रियों की ऐशपरस्ती और सुखों से भरपूर जि़न्दगी के बारे में सोचकर अपना विचार पुनः बदल लेगी। कुछ पाने के लिए कुछ गंवाना तो पड़ता ही है। यह कहकर वह फिल्मों में जाने का दृढ़ निश्चय कर लेगी। वह डायरेक्टरी में से खोजकर निर्देशक के स्टुडियों का पता एक कागज पर उतारेगी और बस पकड़कर सीधी वहाँ जा धमकेगी।
बहुत ही विशाल फिल्म स्टुडियो के एक कोने में बड़ा आला किस्म निर्देशक का दफ्तर होगा। दफ्तर के इर्दगिर्द एक लोहे की बाड़ कर रखी होगी और दफ्तर को जाने वाले मार्ग के द्वार पर एक गेट लगा हुआ होगा जिस पर हर वक्त एक गार्ड तैनात होता होगा। गार्ड दफ्तर के अंदर हर ऐरे-गैरे को जाने नहीं देगा और सिर्फ़ उन्हें ही जाने देगा जिन्हें डायरेक्टर ने मिलने की अनुमति दे रखी होगी। ऐसा निर्देशक ने इसलिए किया हुआ होगा ताकि आलतू-फालतू किस्म के लोग आकर उसका कीमती समय नष्ट न करें।

प्रथा कई दिन निर्देशक के दफ्तर में जाने की कोशिश करेगी। लेकिन सेक्रेटरी उसको मिलने नहीं देगा। उसको धक्के मारकर अपमानित करके बाहर से ही भगा दिया करेगा। प्रथा हारेगी नहीं क्योंकि वह इसी निर्देशक के जरिये इंटरड्यूस होना चाहेगी। इसका कारण यह होगा कि वह निर्देशक कभी जवानी में खुद भी एक्टर रहा होगा। अपने समय का सबसे मंहगा और टॉप का हीरो। सुपरस्टार ! बचपन से ही प्रथा उसकी फैन रही होगी। उसकी स्क्रीन पर्सनेल्टी पर मोहित होकर उसको प्यार भी करती रही होगी। उसकी एक एक फिल्म प्रथा ने कई कई बार देख रखी होगी। इसलिए कर्मचारियों की डाँट-फटकार का वह बुरा नहीं मनाएगी और अपने महबूब निर्देशक से मिलने के निरंतर प्रयास करती रहेगी।

एक दिन प्रथा निर्देशक के दफ्तर के अंदर जाने का प्रयास करते हुए सबसे नज़रें बचाकर चुपके चुपके अंदर प्रवेश कर रही होगी और गार्ड उसको पीछे से आकर पकड़ लेगा। वह गार्ड की पहले तो मिन्नतें-खुशामदें करेगी। जब वह नहीं मानेगा तो उसके साथ उलझ जाएगी। गार्ड भी प्रत्युत्तर में तीखा बोलेगा। वहीं उनकी तू तू, मैं मैं बढ़ जाएगी। दोनों ज़ोर ज़ोर से ऊँची आवाज़ में झगड़ रहे होंगे तो उनका शोर सुनकर अपने दफ्तर की खिड़की में से निर्देशक बाहर झांकेगा।

प्रथा का सुलगता कुआंरा यौवन देखकर वह हिल उठेगा। निर्देशक के फिदा होने का कारण यह नहीं होगा कि उसने कभी प्रथा से सुंदर कोई अन्य लड़की नहीं देखी होगी। नहीं, आए दिन उसका वास्ता खूबसूरत से खूबसूरत माडलों और अभिनेत्रियों के साथ पड़ता रहता होगा। परंतु बात यह होगी कि उस दिन निर्देशक को किसी सुन्दर लड़की के साथ सोये हुए कई दिन हो चुके होंगे। वैसे तो हर रात उसका बिस्तर गरम करने के लिए कोई न कोई लड़की आती रही होगी। पर वह सब बासा माल होगा। इसलिए प्रथा जैसा ताज़ा खिला हुआ फूल देखकर निर्देशक की राल टपक पड़ेगी। वह अपने पी.ए. को खिड़की के पास बुलाएगा और उंगली से प्रथा की ओर इशारा करके कहेगा, “वो देख... कौन है ?”

प्रथा और गार्ड को लड़ते-झगड़ते देखकर पी.ए. वापस अपनी कुर्सी की जाता हुआ कहेगा, “साहब, रोल चाहती होगी। छोड़ो, गार्ड खुद इससे निपट लेगा। आओ, हम अपनी शूटिंग्ज़ की तारीखें डिस्कस कर लें।“

निर्देशक टकटकी लगाए प्रथा की ओर निहारता हुआ पी.ए. से कहेगा, “उल्लू के पट्ठे, जो मैं देख रहा हूँ, क्या तुझे वो दिखाई नहीं देता ?”

“नहीं जनाब। क्या ?” पी.ए. दौड़कर वापस आ जाएगा और खिड़की में से मुँह बाहर निकालकर प्रथा की तरफ देखेगा।
“अंधराते के रोगी ! देख...साँप और वो भी उड़ने वाला !” निर्देशक हवा में अपने हाथ लहराकर प्रथा के जिस्म की आउटलाइन खींचकर दिखाएगा।

“ओ...अच्छा अच्छा... पोटी (लड़की) और वो भी जवान ! मैं समझ गया साहिब बहादुर की तबीयत मचल रही है।”
निर्देशक और पी.ए. दोनों के चेहरों पर शरारत खेलेगी।

पी.ए. की खुशी का कारण यह होगा कि अक्सर मांस खाने के बाद निर्देशक की फेंकी हुई हड्डी उसे ही मिला करती होगी।
“क्या हुक्म है मालिक ? बुलाऊँ ?” पी.ए. दफ्तर से बाहर जाने के लिए दरवाजे़ की ओर बढ़़ेगा।

“हाँ, बुलाओ इसको अंदर। दें इसे भी चांस। नर्म और सुंदर शरीर को छुए हुए भी अब तो मुद्दतें हो गईं।”

खाने-पीने का लोभी, कटोरी चाट पी.ए. बाहर आकर प्रथा को बुलाकर अंदर ले जाएगा। प्रथा जब दफ्तर में दाखि़ल होगी तो निर्देशक अपनी चमड़े की कुर्सी पर दरवाजे़ की ओर पीठ करके बैठा होगा। पी.ए. गला साफ़ करने के लिए खंखारेगा और निर्देशक का ध्यान खींचेगा, “सर !”

निर्देशक कुर्सी घुमाकर प्रथा के सम्मुख होता हुआ उससे मुखातिब होगा, “तशरीफ़ रखो मैडम।“

“थैंक यू।” कहकर प्रथा एक कुर्सी पर बैठ जाएगी और उसके बराबर वाली कुर्सी पर पी.ए. बैठ जाएगा।

निर्देशक भोला बनने का दिखावा करता हुआ अपनी चालाकी दिखाएगा, “बताओ, आपकी क्या खिदमत कर सकते हैं ?”
“खिदमत तो हुजूर मैं आपकी करना चाहती हूँ।”

प्रथा एल्बम खोलकर अपनी तस्वीरें निर्देशक को दिखाना चाहेगी।

“अरे, मैं फोटो-वोटो नहीं देखा करता। जब साक्षात आपको ही देख लिया, फिर इन कागज की तस्वीरों की कोई अहमियत नहीं रहती। वैसे भी, इस लाइन में विचरते मुझे वर्षों का अनुभव है। मैं जानता हूँ कि कैमरे के साथ झूठ बोला जा सकता है और दर्शकों के आगे बहुत कुछ ऐसा पेश किया जा सकता जो हकीकत में नहीं होता।”

फोटो एल्बम बन्द करती हुई प्रथा पूना इंस्टीच्यूट से पास किए हुए एक्टिंग कोर्सों के अपने सर्टिफिकेट निर्देशक की ओर सरका देगी। सर्टिफिकेटों को उल्टी तरफ से खंगालकर उड़ती-सी नज़र डालता हुआ निर्देशक प्रथा से पूछेगा, “किस किस्म का काम चाहिए ?”

“जी, मुझे हीरोइन बनना है।”

“बना देंगे। पर उसके बदले आप हमारे लिए क्या कर सकते हो ?”

“कुछ भी।”

“कुछ भी ?“ निर्देशक अपनी भौंहें ऊपर चढ़ाकर रोक लेगा।
प्रथा फौरन अपने दाँतों में जीभ दबा लेगी। वह समझ जाएगी कि वह कुछ गलत बोल गई है। कुछ भी कहने से प्रथा का हर्गिज वो मतलब नहीं होगा जो निर्देशक निकालेगा। प्रथा अपने मुँह से असावधानी से निकली हुई बात को लपकने के मंतव्य से स्पष्ट करेगी, “जी, कुछ भी से मेरी मुराद है कि मैं सब कुछ कर सकती हूँ, पर एक सीमित सीमा तक और एक दायरे में रहकर।”

निर्देशक प्रथा के इशारे को समझ जाएगा और उसको भगाने के मकसद से कहेगा, “हीरोइन बनने के लिए लड़की के पास खूबसूरत फिगर होनी चाहिए।”

प्रथा थोड़ा शरमा कर गर्दन झुका लेगी, “वो कुछ तो मेरे पास है।”

“अगर है तो दिखा फिर। नहीं तो राह पकड़।” निर्देशक बेरुखी के साथ कुर्सी घुमाकर प्रथा की तरफ पीठ कर लेगा।

“जी...जी... मैं अंग-प्रदर्शन नहीं करूँगी।”

प्रथा के फैसले में दृढ़ता देखकर पी.ए. कुर्सी से उठता हुआ अपना संवाद बोलेगा, “फिर तो तुम्हें मामियों, चाचियों के छोटे-छोटे रोल ही मिलेंगे। या फिर ऐरे-गैरे की माँ बनती रहना।”

प्रथा उनका मुँह फेर लेने को अपना अपमान समझेगी। प्रथा को अपने कल्पित सारे सपने चूर चूर होते प्रतीत होंगे और तमाम हसरतों की अर्थी निकलती दिखेगी। आँसुओं के साथ लबालब भरी आँखें लिए मायूस-सी होकर वह अपनी तस्वीरें और सर्टिफिकेट उठाकर बाहर जाने लगेगी। लेकिन दरवाज़ा खोलने से पहले ही कुछ सोचकर लौट आएगी और निर्देशक से कहेगी, “मुझे आपकी हर बात मंजूर है डायरेक्टर साहब। पर मुझे एक बार हीरोइन बना दो। टॉप ग्रेड और हाइलीपेड हीरोइन।”

“उसकी चिंता तुम न करो। मैं जानूं और मेरा काम जाने।“ निर्देशक खुशी में खिल उठेगा। प्रथा अपना सामान मेज़ पर रखकर निर्देशक की गोदी में बैठ जाएगी। निर्देशक पी.ए. को ड्रिंक बनाने का इशारा करेगा और खुद प्रथा के ब्लाउज के ऊपरी बटन खोलने लग जाएगा। तीन बटन खोलने पर ही उसका काम पूरा हो जाएगा और उसको आगे के बटन खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। निर्देशक अपना हाथ प्रथा के ब्लाउज में डालकर अपनी उंगलियों से कसरत करवाना प्रारंभ कर देगा।

इतने में पी.ए. शराब से भरे दो गिलास मेज़ पर रखकर बाहर चला जाएगा।

प्रथा एक गिलास उठाकर निर्देशक के मुँह से लगा देगी और दूसरा गिलास उठाकर निर्देशक प्रथा को घूंट भरवाने लग पड़ेगा। यद्यपि प्रथा ने जि़न्दगी में पहले कभी शराब का सेवन नहीं किया होगा और वह शराब पीना पसंद भी नहीं करती होगी, पर फिर भी न तो वह कोई झिझक दिखाएगी और न ही इन्कार करेगी। बिना एतराज किए वह शराब को जूस या कोक की तरफ सुड़क जाएगी।

कुछ देर निर्देशक उसके अंगों पर अपनी उंगलियाँ नचाएगा। नशे की लोर में प्रथा भी उसको बार बार चूमेगी। फिर निर्देशक अपना मूड बनाकर और प्रथा का मूड बना देखकर उसके नितम्ब थपथपाएगा, “चलो, तुम्हें कैमरा फेस करना सिखाएँ। और तुम्हारी अदाकारी के हुनर को भी परख लेते हैं।”
प्रथा उठकर खड़ी हो जाएगी। निर्देशक उसकी बांह पकड़कर उसको दफ्तर के पीछे बने कमरे की तरफ ले जाएगा, “शुरूआत हम एक बैडरूम सीन से करते हैं।”

निर्देशक प्रथा को लेकर बैड पर चढ़ जाएगा। प्रथा कुछ पूछना या बता देना चाहेगी। लेकिन निर्देशक उसके अधरों पर आप ही उंगली रख देगा और सरगोशी करेगा, “सायलेंस...लाइट्स ऑफ...एक्शन...।”

एक्शन शब्द सुनते ही प्रथा अपने कपड़े उतारकर एक तरफ फेंकती हुई निर्देशक को अपने फन का मुज़ाहरा करके दिखाएगी। निर्देशक भी एक्ट करने में प्रथा का साथ देगा। इस सेज नाटक के क्लाईमेक्स के बाद ‘दि ऐंड’ होने पर दोनों बैड पर लाश की तरह पड़े रहेंगे।

फिर अक्सर (हर रोज़) इसी तरह होता रहा होगा। निर्देशक प्रथा को पहले कोई अंग्रेजी ब्लू फिल्म दिखाएगा करेगा। और फिर प्रथा को उसी प्रकार करने के लिए कहा करेगा। इस प्रकार इन रिहर्सलों का सिलसिला दिनों-हफ्तों और महीनों तक निरंतर चलता रहेगा।

ऐसे ही एक दिन निर्देशक और प्रथा दफ्तर में रंगरलियाँ मना रहे होंगे कि निर्देशक को ऐडवर्ट फिल्में बनाने वाला उसका कोई मित्र मिलने आएगा। वह प्रथा को देखेगा और उस पर फिदा होकर उसको किसी मॉडलिंग प्रोजेक्ट के लिए साइन करना चाहेगा। पर डायरेक्टर प्रथा को उसके साथ काम करने की अनुमति नहीं देगा। विज्ञापनी फिल्मों वाले के चले जाने के बाद प्रथा निर्देशक के साथ खीझेगी कि उसने मॉडलिंग की ऑफर कबूल क्यों नहीं करने दी। निर्देशक प्रेमपूर्वक प्रथा की जुल्फ़ों को सहलाता हुआ दलील देगा, “छोटे मोटे काम करने से इमेज खराब हो जाती है। ये साली मशहूरियाँ भी कोई चीज़ हैं। हम तुम्हें बहुत बड़े स्तर की फिल्म बनाकरकर लॉन्च करेंगे। फुल पब्लिसिटी देंगे। और फिर वैसे भी तुम मॉडलिंग के व्यवसाय के योग्य नहीं थी। मॉडलिंग करने के लिए कद कम से कम छह फुट होना चाहिए। वह साला तुझे इस्तेमाल करने के लिए मुझसे छीनकर ले जाना चाहता था।”

यह उत्तर सुनकर प्रथा की नाराजगी कम होने की बजाय और अधिक बढ़ जाएगी, “आप भी तो मुझे इतने दिनों से इस्तेमाल किए जा रहे हो। अभी तक मेरा स्क्रीन टैस्ट तक नहीं लिया।”
प्रथा की जिद देखकर निर्देशक का पैंतरा बदल जाएगा, “मेरी जान, जल्दी क्यों मचाती है। सब्र रख। सहज पके सो मीठा होय। तुझे उर्दू और हिन्दी की क्लासों में दाखि़ल करवाते हैं। शुद्ध उच्चारण करना सीख जाएगी। डायलॉग डिलीवरी यूँ परफेक्ट...धुआँधार होनी चाहिए। डांस सीख। जिम में जाया कर। ब्यूटी पॉर्लर में चौकी भरकर अपने हुस्न को और तराश। जब तक तेरे वास्ते करते हैं कुछ न कुछ जुगाड़।”

प्रथा इस तरह निर्देशक की बातों से बहल जाएगी। निर्देशक उसका मांस नोंचता रहेगा।

कुछ दिनों के बाद प्रथा निर्देशक से उसको बतौर हीरोइन लेकर कोई नई फिल्म शुरू करने के बारे में ज़ोर डालेगी। निर्देशक उसको टरकाने के लिए कहेगा कि वह पहले कैटवॉक सीखे।

“ठीक है, सिखाओ फिर।”

“ठीक है, सीख फिर।” निर्देशक प्रथा के सिर पर किताब रखकर उसको अपने साथ चलाएगा और प्रथा को हाथ छोड़कर किताब को सिर पर टिकाने के लिए कहेगा। प्रथा सिर पर घड़े रखने की अभ्यस्त होगी क्योंकि घर में पानी जमा करने के लिए उसको अक्सर बस्ती में दूर से म्युनिसिपल्टी के नल से पानी भरकर लाना पड़ता होगा। कमर मटका मटकाकर झटके मार मारकर शान से चलना सीखने में प्रथा उलझी रहेगी।

इस प्रकार प्रथा उसकी बातों पर विश्वास करती रहेगी। प्रथा के साथ सैक्स करने के बाद एक मिनट भी निर्देशक उसके संग नहीं लेटा करेगा। बल्कि खलास होते ही अपने सारे कपड़े पहनकर किसी न किसी फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ने लग जाया करेगा। ऐन उसी वक्त प्रथा को अपना भूला हुआ प्रेमी याद आया करेगा। परंतु वह उसको भुला दिया करेगी। कुछ देर अकेली पड़ी रहने के बाद प्रथा भी अपने कपड़े पहनकर बाल संवारती हुई बैड पर से उठ खड़ी हुआ करेगी। निर्देशक को कागजों में खोया देखकर प्रथा उसके कमरे में बिखरे सामान को उसके उचित स्थान पर रखने लग जाया करेगी या कभी सैल्फों पर पड़ी किताबों को झाड़ने-पौंछने लग पड़ा करेगी। निर्देशक को प्रथा के ऐसे छोटे छेट और घरेलू काम करने अच्छे लगा करेंगे। पर इन कामों को करते हुए प्रथा को अपना टॉप की हीराइन बनने का सपना पूरा होता नहीं दिखाई देगा।

एक दिन क्या होगा कि प्रथा ऐसे ही साफ़-सफाई कर रही होगी और निर्देशक अपनी अगली शूटिंग-सारणी की योजना बना रहा होगा। प्रथा इतने चाव से कमरे की वस्तुओं की झाड़-पौंछ करेगी कि हर शै शीशे की तरह चमक उठेगी। निर्देशक प्रथा का सफाईपंसद होना देखकर कहेगा, “प्रथा बेबी, मुझे तेरी जैसी घरेलू औरत की ही तलाश थी। तू मेरे साथ विवाह करवा ले। बोल बनेगी मेरी बीवी ?”

“सच कहते हो ?”

“बिलकुल सच। मुझे मेरी अगली रिलीज होने वाली फिल्म की कसम।” निर्देशक अपना काम बीच में ही छोड़ कर प्रथा को अपनी बांहों में कस लेगा।

इस प्रकार, प्रथा इस शादी के लिए मान जाएगी। प्रथा के माता-पिता को प्रथा के फैसले पर पहले तो एतराज होगा, क्योंकि प्रथा तो अल्हड़ और अनजान-सी होगी और निर्देशक अधेड़ और जि़न्दगी जिया हुआ होगा। पर फिर प्रथा के माता-पिता प्रथा की खुशी, निर्देशक के रुतबे और पैसे के विषय में विचार करके रजामंद हो जाएँगे। प्रथा की निर्देशक के साथ शादी हो जाएगी। शादी के बारे में प्रथा ने तो कल्पना भी नहीं की होगी कि शादी इतनी धूमधाम से होगी और निर्देशक इतनी बड़ी पार्टी देगा, जिसमें फिल्म उद्योग की लगभग सारी जानी-मानी हस्तियाँ शिरकत करेंगी। पर निर्देशक के हुक्म के अनुसार विवाह की रस्म बड़ी गुप्त ढंग से होगी। जिसमें प्रथा के परिवार और निर्देशक के पी.ए. के अलावा अन्य कोई भी शामिल नहीं हुआ होगा।

प्रथा का मुँह बंद रखने के लिए निर्देशक उसको लेकर किसी बाहरी देश में हनीमून मनाने चला जाएगा। दो तीन सप्ताह बाद जब वे वापस लौटकर आएंगे तो प्रथा बागोबाग हुई पड़ी होगी।

मुर्गियों के दड़बे जैसे छोटे से घर में रहने वाली प्रथा बहुत बड़े बंगले की मालकिन बनी फूली नहीं समाएगी। इसी खुशी और चाव में ही तीन चौथाई साल बीत जाएगा। निर्देशक अपनी किसी बहुत समय से अधूरी पड़ी फिल्म को पूरा करने के लिए दूर-दराज गया होगा। उसके पीछे घर में अकेली रहती प्रथा बोर हो जाएगी। तन्हाई के आलम में ही उसको याद आएगा कि उसने तो हीरोइन बनना था। दो महीने बाद जब निर्देशक अपने टूर से वापस लौटेगा तो प्रथा उसके साथ बात शुरू करेगी, “ऐ जी, कब महुरत करोगे उस फिल्म का ?”

निर्देशक भोलापन प्रकट करेगा, “कौन सी फिल्म ?”

“वही जो तुम मुझे हीरोइन लेकर बनाओगे।”

निर्देशक का ठंडा चेहरा एकदम तपकर लाल हो जाएगा और मुँह से आग बरसाता बोलेगा, “हीरोइन नहीं तो, मैं तुझे कुछ और बना दूँ। बंदी बनकर घर-गृहस्थी संभाल। भले घर की औरतें ये कंजरों वाले काम नहीं किया करतीं।”

“फिर तुम क्यों करते हो ? क्या भले घर के आदमी ये काम किया करते हैं ?” प्रथा निर्देशक का बहसबाजी में डटकर मुकाबला करेगी। निर्देशक खफ़ा होकर खामोश हो जाएगा।

“बोलो ? दो जवाब ? अब तुम्हारी बोलती क्यों बंद हो गई ?” प्रथा उसको उकसाएगी।

निर्देशक पूरे गुस्से में आ जाएगा, “मैं तो साली कुएँ में छलांग लगाऊँगा, तू मेरे पीछे गिरेगी ?”

निर्देशक प्रथा को अच्छी तरह डाँटेगा, फटकारेगा और संभव है कि दो-चार थप्पड़-मुक्के भी जड़ दे। प्रथा रो-बिलख कर शांत होकर बैठ जाएगी। प्रथा को एकाएक निर्देशक बुरा लगने लग जाएगा। पर वह कर कुछ नहीं सकेगी। वह जाल में फंसे पंछी की तरह फड़फड़ाकर रह जाएगी। दिनोंदिन प्रथा और निर्देशक के रिश्ते में पड़ी हुई दरार बढ़ती चली जाएगी। प्रथा की यौन-सम्बन्धों में रुचि मरती चली जाएगी। इस दौरान दिमाग की नस फटने से निर्देशक की मौत हो जाएगी। निर्देशक का क्रियाकर्म करने के लिए किसी बाहरी देश से उसका बेटा (पहले विवाह से जन्मा) भी आ जाएगा, जो अब तक पूरा जवान हो चुका होगा। वह विदेश में रहकर अब तक पढ़ाई कर रहा होगा।
निर्देशक अपनी वसीयत में अपनी सारी सम्पत्ति प्रथा और अपने पुत्र के नाम आधी आधी बाँट जाएगा। पुत्र वापस लौटने की बजाय अपने पिता का कारोबार संभालने लग पड़ेगा और वहीं उसी घर में प्रथा के पास रहने लग जाएगा।

निर्देशक का पुत्र पूरी तरह अपने पिता जैसा होगा। जब कभी भी प्रथा उसकी तरफ देखा करेगी तो उसको निर्देशक की याद आ जाया करेगी। क्योंकि कभी अपनी जवानी में निर्देशक बिलकुल उस जैसा ही दिखाई दिया करता होगा। उसकी इसी तरह की मोहिनी सूरत और कदकाठी देखकर प्रथा अपनी अल्हड़ अवस्था में मुग्ध हो गई होगी। यह उसके टीनेज क्रश का ही नतीजा होगा जो उसको इस स्वर्गवासी निर्देशक की तरफ खींचकर लाया होगा।

विधवा होने के कारण प्रथा को सफेद वस्त्र पहनने पड़ा करेंगे। सफ़ेद साड़ी में उसका सांवला सा रंग उघड़कर और भी अधिक आर्कषक दिखाई दिया करेगा। जब कभी भी निर्देशक का पुत्र प्रथा को देखा करेगा तो उसको अपनी प्रेमिका याद आ जाया करेगी। उसकी भूतपूर्व प्रेमिका भी लगभग प्रथा की उम्र की ही और उस जैसी ही होगी। निर्देशक के पुत्र की आयु भी प्रथा की आयु के आसपास ही होगी। कोई चीज़ कोई जज़्बा उन दोनों को खींचकर करीब लाया करेगा। परंतु फिर उनका माँ-पुत्र का मानसिक रिश्ता उन्हें न सिर्फ़ जुड़ने से ही रोककर रखेगा, बल्कि दूर अपनी अपनी जगहों की तरफ भी धकेल दिया करेगा। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने के यत्न में निर्देशक का पुत्र अधिक समय घर से बाहर ही बिताया करेगा। प्रथा भी घर को संभालने-संवारने में अपने आपको व्यस्त रखेगी।

जब कभी भी प्रथा तन्हा और उदास हो जाया करेगी तो अपनी तस्वीरों वाली एल्बम निकालकर देखने लग जाया करेगी। तस्वीरें देखने के बाद उसको अपनी सुंदरता पर गर्व होने लग जाया करेगा। वह शीशे के सम्मुख खड़ी होकर अपने रूप को निहारेगी और उदास हो जाएगी। उसको लगेगा कि अपने रूप को तो उसने इस्तेमाल करके देखा ही नहीं। अपना हुस्नो शबाब उसको यूँ ही व्यर्थ होता प्रतीत होगा। बुझा-सा चेहरा लेकर वह पुनः तस्वीरों वाली एल्बम के पन्नों को उलटने-पलटने लग जाएगी। पन्ने उलटते-पलटते उसको एल्बम में एक पन्ना खाली दिखाई देगा। असल में वहाँ से फोटो गायब होगी। प्रथा को याद आएगा कि वहाँ तो उसकी सबसे अधिक सेक्सी तस्वीर थी। वह फोटो को तलाशने के यत्न में इधर-उधर हाथ-पैर मारेगी, कमरे की वस्तुओं को उलटेगी-पलटेगी, अल्मारियों, अटैचियों की तलाशी लेगी और ऐसा करती करती सारा घर छान मारेगी। लेकिन उसको वो तस्वीर कहीं भी दिखाई न देगी। उसको लगेगा कि फोटो घर में ही कहीं एल्बम में से निकलकर गिर पड़ी होगी। घर में आया कोई मेहमान उठाकर ले गया होगा या कोई नौकर यह कारस्तानी कर गया होगा। वह भी तो आस-पास नहीं देखा करती होगी। जब मन करे तभी, जहाँ दिल हो वहीं एल्बम खोलकर बैठ जाने की अभ्यस्त हो चुकी होगी। वैसे और वह करेगी भी क्या ? खाली और फुर्सत में होने के कारण उसको अपना दिल किसी न किसी तरफ तो लगाना और बहलाना ही होता होगा न। किसी काम धंधे में अपना ध्यान लगाने के लिए प्रथा नौकरों को घर से निकाल देगी। 

निर्देशक का पुत्र रात में काफ़ी देर से आया करेगा। प्रथा उसको जल्दी आने के लिए कहा करेगी। वह किसी सयाने बच्चे की भाँति जल्दी आने लग पड़ेगा। पर कभी कभी जब वह घर आया करेगा तो उसने शराब पी रखी होगी। प्रथा उसको बाहर शराब पीने से रोकेगी और कहेगी कि वह घर में बैठकर ही पी लिया करे। अगले दिन जब वह घर लौटेगा तो सूफी होगा। प्रथा उसको खुद शराब डालकर देगी और खुद भी उसके साथ ही बैठकर पियेगी। दारू के बाद प्रथा उसको अपने हाथों से तैयार किए हुए पुरान-पौली और वांगी बाट (मराठी भोजन) खिलाएगी। वह प्रथा के बनाये हुए खाने की उंगलियाँ चाटता हुआ तारीफे़ं करेगा। प्रथा उसको इसरार और प्यार के साथ उसकी भूख से अधिक खिला देगी। जब वह खा रहा होगा तो प्रथा उसकी कुर्सी की बांह पर बैठकर मोह से उसके बालों में हाथ फेरेगी। प्रथा को इस तरह करना अच्छा लगेगा और निर्देशक के पुत्र को भी बहुत आनंद आएगा। खाना खाने के बाद वह प्रथा के साथ बर्तन साफ़ करने में हाथ बँटाएगा। रसोई में खड़े होकर बार बार प्रथा निर्देशक के बेटे की ओर देखा करेगी और निर्देशक का बेटा प्रथा को देखा करेगा। जब प्रथा अपनी ओर देख रहे लड़के की आँखों में आँखें डालकर देखा करेगी तो लड़का गर्दन झुका लिया करेगा। जब लड़का अपनी तरफ देखती प्रथा को देखा करेगा तो नज़रें मिलते ही प्रथा अपनी निगाहें झुका लिया करेगी।

प्रथा के मन में निर्देशक के बेटे के लिए मुहब्बत जाग जाएगी और निर्देशक के बेटे के दिल में प्रथा के लिए प्यार मशरूम की तरह उग आएगा। वह एक दूसरे की ओर अपने कदम बढ़ाएँगे। पर फिर उन्हें अपना रिश्ता याद आ जाएगा जिस कारण वे दोनों अपने अपने रुख एक-दूसरे से विपरीप दिशा में मोड़ लिया करेंगे। उन दोनों के मस्तक में एक किस्म की जंग चलती रहेगी।

अपने अपने कमरे में बेचैन और अनिद्रा में पड़े वे काम की प्यास के साथ तड़पेंगे। उनकी तपती जवानियाँ और अधिक तपने लग जाएँगी। निर्देशक के बेटे को बार बार प्रथा का हुस्न उकसाएगा और हर बार रिश्ते की दीवार बीच में आकर उसको रोक लिया करेगी। उधर प्रथा की हालत भी बिलकुल ऐसी ही होगी। उसको भी वासना की आग टिकने नहीं देगी। उसका मन भी उठ उठकर भागने को करेगा। पर फिर वह लूणा के बारे में सोचेगी। भरी जवानी में लूणा को बूढ़ा सलवान ब्याह लाता है और वह आयु के तकाजे के साथ लूणा के काम की भूख पूरी नहीं कर सकने में असमर्थ होता है। लूणा उसके पुत्र पूरन पर यह सोच कर मोहित हो जाती है कि उसने कौन सा उसे अपने पेट से पैदा किया है। पूरन उसका हमउम्र होता है। पूरन उसको अपनी सौतेली माँ जानकर अस्वीकार कर देता है। लूणा पूरन को छल-कपट से सज़ा दिलवा देती है और खुद सदा के लिए इतिहास में गुनाहकारों की सूची में नाम लिखवा लेती है। प्रथा अपने साथ लूणा की तस्बीह देगी। उसको लूणा निर्दोष नज़र आएगी। कैसी प्रथा है यह ? एक बूढ़ा मर्द तो जवान स्त्री को भोग सकता है, पर एक नवयौवना अपनी उम्र के नौजवान को नहीं रख सकती ? फिर वह अपने इश्क पर अपना ध्यान केन्द्रित करेगी। वह जितना अपने आपको टालकर रख सकती होगी, उतना टालेगी। रात आधी से भी अधिक किसी कशमकश में गुजर चुकी होगी। प्रथा के अंदर का वेग ज़ोर मारेगा और वह अपनी सफ़ेद साड़ी उतारती हुई निर्देशक के पुत्र के कमरे की ओर बढ़ेगी। साड़ी उतारकर वह नीचे फर्श पर ही फेंक देगी। निर्देशक के पुत्र के कमरे के दरवाजे़ को खोलने का यत्न करेगी। दरवाज़ा अंदर से बंद होगा। प्रथा दरवाज़ा थपथपाकर उसको जगाएगी। कमरे का दरवाज़ा न खुलने पर वह अपने जूड़े में से पिन निकालेगी। पिन के निकलते ही उसका जूड़ा खुल जाएगा और बाल कंधों पर बिखर जाएँगे। प्रथा पिन की मदद से ताला खोल लेगी। इस प्रकार ताले खोलने उसने अपनी बस्ती के लड़कों से सीखे होंगे। दरवाज़ा पूरा खुल जाएगा। कमरे में मद्धम लाइट जल रही होने के कारण नीम-रौशनी होगी। पहले तो कुछ भी नज़र नहीं आएगा। प्रथा अँधेरे में ही अंदाजे़ से बैड की तरफ ताकती रहेगी। फिर आहिस्ता आहिस्ता उसको दिखने लग जाएगा। प्रथा देखेगी कि कमरे की दीवारें उसी खोई हुई तस्वीर के पोस्टरों से अटी पड़ी होंगी। प्रथा को निर्देशक के पुत्र की आँखें साफ़ नज़र नहीं आएँगी। इसलिए अनुमान लगाना मुश्किल होगा कि वह सो रहा है या जाग रहा है। निर्देशक के पुत्र के ऊपर सिरहाना पड़ा होगा जिसको उसने अपनी बांहों में कस रखा होगा। जैसे कोई मर्द अपनी पत्नी या महबूबा को अपने ऊपर लिटाकर बांहों में कसे होता है। प्रथा उसका दिलकश चेहरा देखेगी। फिर बॉडी बिल्डरों जैसी भुजाएँ। शहतीरों जैसी भारी और मोटी मोटी जांघें। वह अलफ़ नग्न पड़ा होगा। उसका अनढ़का जिस्म देखकर ही कामवासना में डूबी प्रथा हद से ज्यादा उत्तेजित हो जाएगी। प्रथा द्वारा अपने आप को संभाला नहीं जाएगा। वह अपने पेटीकोट को उतारने के लिए उसके नाड़े की गांठ खींचकर खोल लेगी। पेटीकोट इकट्ठा होकर नीचे गिर पड़ेगा।

प्रथा को नग्न देखकर निर्देशक के पुत्र के लहू की गति तेज़ हो जाएगी और अंगों में हरकत पैदा हो जाएगी। उसका काम अंग भूचाली झटका मारकर अंगड़ाई लेगा। जिसके परिणामस्वरूप उसकी कमर के पास से सिरहाना थोड़ा सा ऊपर उठेगा। इससे प्रथा को पता लग जाएगा कि वह जाग रहा है और उसके अंतःकरण में भी उसी तरह का द्वंदयुद्ध चल रहा है। तभी उसने ताला लगाकर दरवाज़ा इसीलिए बंद किया होगा ताकि किसी जज्बे के ज़ोर डालने पर वह दरवाज़ा खोलकर कोई ऐसी वैसी हरकत न कर ले, जिसके लिए उसको बाद में पछताना पड़े। प्रथा भी अक्सर इसी प्रकार अपने आप को कमरे में घुसाकर ताला लगाकर चाबी छिपा लेती होगी ताकि वह बाहर न जा सके।

प्रथा नीचे पैरों में गिरे पड़े अपने पेटीकोट के घेरे में से बाहर पैर रखेगी। फिर कुछ झिझकेगी। कुछ सोचेगी। इतने में प्रथा देखेगी कि लड़के ने सिरहाना अपने ऊपर से उठाकर दूर फेंक दिया है। उसका तना हुआ जिस्म पूरे का पूरा प्रथा की आँखों के आगे परोसा गया होगा। सारी सोचों, सारे संकोचों, सारी शरम-हयाओं को छोड़कर प्रथा आगे बढ़ेगी और बिस्तर पर निर्देशक के पुत्र के साथ जाकर लेट जाएगी। लड़का उसको कसकर सीने से लगा लेगा और यूँ पुरानी प्रथा टूटकर नई प्रथा बन जाएगी।
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